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खोए हुए जूते

आन्यांग, कोरिया से ओ जिन हुई

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मेरी दादी हमेशा मुझे अधिक देना चाहती हैं। जब मैं प्राथमिक स्कूल में थी, तो उन्होंने मेरे लिए एक मेज खरीदी थी कि मैं मेहनत से पढ़ाई करूं। उन्होंने मेरे माध्यमिक और हाई स्कूल के दिनों में स्कूल यूनिफार्म के लिए भी पैसे चुकाए थे। जब मैं कॉलेज की छात्रा बन गई और अकेली रहती थी, तब उन्होंने मेरे लिए बहुत से व्यंजन भेजे। वह मुझसे अक्सर पूछती थीं कि मुझे कुछ चाहिए या नहीं।

कुछ साल पहले कोरियाई राष्ट्रीय छुट्टी, चुसोक के दौरान मेरी दादी ने उपहार के रूप में मुझे जूते दिए। उन्होंने मेरी मौसी और मौसेरी बहन से पूछते हुए प्रचलित डिजांइन के जूते खरीदे जो मुझ पर अच्छे लग रहे हैं। जब मैं छुट्टी के बाद अपनी जगह को लौट गई, तो मेरे उसे रोकने के बावजूद भी वह मुझे विदा करने के लिए बस टर्मिनल तक मेरे साथ आईं। मैं मन में उनके प्रेम को लेकर बस पर चढ़ी, लेकिन मुझे बिना किसी कारण के खालीपन का एहसास हुआ। फिर मैंने देखा कि मेरी दादी के खरीदे हुए जूते जिन्हें मैंने कुछ देर पहले पकड़े थे, खो गए थे।

मैं अपनी दादी को सच्ची नहीं बता सकी, इसलिए मैंने मेरी मौसी को फोन करके बताया कि क्या हुआ था। मौसी ने हैरान होकर कहा कि वह टर्मिनल जाकर जूतों को ढूंढ़ेगी। सुनिश्चित करने के लिए, मैंने टर्मिनल ऑफिस से संपर्क किया लेकिन मुझे केवल यह उत्तर मिला, “कोई जूते पाए नहीं गए हैं।” मैं उस बस पर कुछ भी नहीं कर सकी जो पहले से ही निकल चुकी थी, इसलिए मैं चिंतित होकर बस अपने पैर पटकने लगी।

लगभग दो घंटे बाद, मेरी मौसेरी बहन ने मुझे फोन किया।

“दीदी, क्या तुम टेक्सट मैसेज नहीं देखती? दादी को तुरंत फोन करके धन्यवाद कहो।”

उसके रूखे शब्दों से, मैंने उलझन में पड़कर टेक्सट मैसेज देखा। मौसेरी बहन ने मुझे उस शॉपिंग बैग की तस्वीर भेजी जिसमें मेरे जूते रखे हुए थे। मैं विश्वास नहीं कर सकी कि जूते कैसे वापस खोजे गए। मुझे यह पता चला कि जैसे ही दादी को खबर मिली वह टर्मिनल वापस गईं और उन्हें टर्मिनल की उस दुकान में जूते मिले जहां से उन्होंने मेरे लिए नाश्ता खरीदा था।

मेरी लापरवाही के कारण उन्हें एक और बार परेशान करने से खेदित होकर मेरा गला भर आया। मैंने उन्हें तुरंत फोन किया और माफी मांगकर धन्यवाद कहा। दादी ने कहा, “मैं इन्हें पार्सल के माध्यम से भेज दूंगी। और उन जूतों को अच्छी तरह पहनना।” मेरी दादी का प्रेम ही सबसे बड़ा उपहार है जो मैंने अब तक उनसे प्राप्त किया है।

केवल शर्म आने के कारण मैंने उनके प्रति अपना आभार ठीक से व्यक्त नहीं किया है; शायद मुझे प्राप्त करने की आदत हो गई और मैंने इसे स्वाभाविक रूप से ग्रहण किया। लेकिन, भले ही अब मैं उनसे बहुत दूर रहती हूं, मैं किसी और की तुलना में एक करीबी पोती बनना चाहती हूं। चाहे ऐसा करना उनके उपहारों का आधा भाग भी चुकाने के लिए पर्याप्त नहीं होगा, पर मैं उनके प्रति अधिक आभार और प्रेम व्यक्त करूंगी।