WATV.org is provided in English. Would you like to change to English?

16 जुलाई, 2020

प्रकृति के सामने मनुष्य

FacebookTwitterEmailLineKakaoSMS

हिमालय को ‘दुनिया की छत’ कहा जाता है। मई 1953 में, न्यूजीलैंड के पर्वतारोही एडमंड हिलेरी ने पहली बार माउंट एवरेस्ट पर जिसकी ऊंचाई समुद्र तल से 8,848 मीटर है, पैरों के निशान छोड़े। उसके बाद 60 साल बीत चुके हैं, फिर भी हिमालय को अभी भी ईश्वर का क्षेत्र कहा जाता है क्योंकि इसके शिखर तक पहुंचने के लिए वह बहुत ऊबड़-खाबड़ है।

खड़ी बर्फ की चट्टान, अप्रत्याशित हिमस्खलन, सुरंग बम की तरह छिपे हिमदरार(ग्लेशियरों की सतह पर पड़ी गहरी दरारें) और ऊंचाई की बीमारी जैसे खतरों के अलावा, समुद्र तल से 8,000 मीटर ऊपर ‘डेथ जोन(Death Zone)’ भी है, जहां कम वायुदाब के कारण ऑक्सीजन तृतीयांश तक घट जाता है, तापमान शून्य से 30 से 50 डिग्री नीचे तक गिर जाता है, और शरीर के सभी खुले हिस्से शीतदंश से पीड़ित हो जाते हैं। चरम पीड़ा के कारण बहुत से पर्वतारोही पर्वत से नीचे नहीं आ पाते और वे अभी भी हिमालय की गोद में सो रहे हैं। पर्वतारोही “विजय” शब्द का उपयोग नहीं करते क्योंकि उन्हें महसूस हुआ है कि मनुष्य प्रकृति के सामने कुछ भी नहीं हैं।

“मनुष्य कैसे पर्वत या प्रकृति पर विजय प्राप्त कर सकता है? हम इसलिए पर्वत पर नहीं चढ़ते क्योंकि हमने इस पर विजय प्राप्त कर ली है, लेकिन इसलिए क्योंकि हम खुद को प्रकृति के अनुकूल बनाते हैं और पर्वत हमें स्वीकार करता है।” – अम हांग गिल, कोरियाई पर्वतारोही जो हिमालय के 16 चोटियों पर चढ़ने में सफल हुआ जो समुद्री स्तर से लगभग 8,000 मीटर ऊपर है)

FacebookTwitterEmailLineKakaoSMS