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27 दिसम्बर, 2019

भावनात्मक आदतें

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अमेरिका के नॉर्थवेस्टर्न विश्वविद्यालय में सामाजिक मनोवैज्ञानिक फिलिप ब्रिकमेन ने एक प्रयोग किया। जिनकी खुशियां अचानक सौभाग्य प्राप्त करके अमीर होने के कारण एकदम बढ़ गईं, और जिनकी खुशियां अचानक दुर्घटना में शरीर को लकवा होने के कारण एकदम कम हो गईं, ऐसे दोनों प्रकार के लोगों की भावनाओं में होने वाले परिवर्तनों का प्रेक्षण किया गया।

कुछ समय के बाद जब फिर से उन दोनों की खुशियों की माप की गई, तो परिणाम पहले के परिणाम से बिल्कुल अलग था। जैसे–जैसे समय बीत गया, खुशियों की ऊंची मात्रा उस निम्न मात्रा तक कम हो गई. जो सौभाग्य मिलने से पहले होती थी, और खुशियों की निम्न मात्रा उस ऊंची मात्रा को लौट गई, जो दुर्घटना होने से पहले होती थी।

मानव मस्तिष्क को, चाहे वह किसी उत्तेजक कारक से भावनात्मक परिवर्तनों का सामना करता हो, समय बीतने पर अपनी पहली भावनात्मक स्थिति में वापस लौट जाने की आदत है। इसी कारण से, मस्तिष्क जो नकारात्मक भावनाओं में अभ्यस्त होता है, एक दिन में घटी घटनाओं में से उसी चीज के ज्यादा अर्थ निकालता है जो नकारात्मक भावना का कारण बनी, और उसे ज्यादा याद करता है। इसके विपरीत, मस्तिष्क जो सुखद भावनाओं में अभ्यस्त होता है, असुखद चीज से ज्यादा सुखद चीज को अपनाता है और एक दिन में घटी घटनाओं को याद करते समय सबसे पहले खुशी की बात को याद करता है।

नकारात्मक भावना रखने की आदत को त्यागकर, आनन्द और धन्यवाद जैसी अच्छी भावना रखने की आदत डालने के लिए, हमें उसे बार–बार दोहराना चाहिए। इसलिए परमेश्वर ने हमसे यह निवेदन किया,

“सदा आनन्दित रहो। निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो। हर बात में धन्यवाद करो; क्योंकि तुम्हारे लिये मसीह यीशु में परमेश्वर की यही इच्छा है।” 1थिस 5:16–18

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