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स्वर्ग का मार्ग शांतिपूर्ण और सरल होने का कारण

कीर्तिपुर, नेपाल से सारु बास्कोटा

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एक दिन सुसमाचार का प्रचार करने के दौरान, मुझे अपने बचपन की सहेली की याद आई। मैं वाकई उसे उद्धार के सुसमाचार का प्रचार करना चाहती थी, मगर मुझे याद नहीं आ रहा था कि उसके घर कैसे जाना है। मैंने ईमानदारी से पिता और माता से प्रार्थना की कि वे मुझे उससे मिलने की अनुमति दें। आखिरकार, परमेश्वर की मदद का शुक्र है, मुझे याद आया कि मैं अपनी मां के साथ उसके घर गई थी। दरअसल, जब मैं छोटी थी तो मेरी मां ही मुझे उसके घर ले जाया करती थी; वह मेरी मां के दोस्त की बेटी थी।

कई दिनों बाद, मैं अपनी मां के साथ उसे मिलने गई। जब मैं बगीचे के पास पहुंची, तो मुझे धीरे-धीरे याद आई कि मैं उसके साथ नंगे पैर चारों ओर उछलकूद करके खेलती थी। एक-दूसरे के साथ अच्छा खासा समय बिताने के बाद, हमने फिर से मिलने का वादा किया। घर लौटने के रास्ते पर, एक सवाल मेरे मन में उठा।

‘मुझे अच्छी तरह अपनी सहेली का घर और वह जगह याद आई जहां मैं उसके साथ खेलती थी, लेकिन उसके घर जाने का रास्ता क्यों याद नहीं आया?’

तो मैंने अपनी मां से पूछा और उसने मुस्कुराते हुए इसका जवाब दिया,

“जब तुम छोटी थी, जहां कहीं भी मैं जाती थी, तुम्हें अपनी पीठ पर उठा लेती थी। तुम्हारी सहेली के घर पैदल जाने में एक से दो घंटे का समय लगता था, तो थोड़ी देर चलने के बाद तुम थक जाती थी, और इसलिए मैं तुम्हें अपनी पीठ पर उठा लेती और तुम सो जाती थी। जब हम उसके घर पर पहुंच जाते थे, तुम अपनी नींद से जाग जाती और अपनी सहेली के साथ खेलने लगती थी। मुझे लगता है इस वजह है तुम्हें केवल उसका घर और वह जगह याद है जहां तुम खेला करती थी।”

मुझे अपनी मां के प्रति खेद हुआ। जब आज की तरह कोई सुविधाजनक सार्वजनिक परिवहन उस समय उपलब्ध नहीं था, वह अपनी पीठ पर मुझे उठा लेती और मेरी सहेली के घर आने जाने के लिए एक लंबी दूरी पैदल चलती थी। उसके लिए यह कितना थकाऊ रहा होगा! लेकिन इसके बारे में वह मुस्कुराते हुए बात करती रही मानो यह कोई बड़ी बात नहीं हो।

घर पर मेरी मां की कही बातों को याद करते हुए, मुझे एलोहीम परमेश्वर के प्रेम का एहसास हुआ और मैं भावनाओं से भर गई। स्वर्गीय पिता और माता के साथ स्वर्गीय देश में प्रतिदिन खुशियां उमड़ती हुई होंगी। लेकिन मेरे वहां किए पापों के कारण, मैं स्वर्ग वापस जाने के मार्ग को भूलते हुए इस पृथ्वी पर जी रही थी। परमेश्वर शरीर धारण करके स्वयं आए और उन्होंने मुझे वह मार्ग दिखाया। जिस तरह मेरी मां अपनी पीठ पर मुझे उठाकर एक लंबी दूरी चलकर थक गई थी, फिर भी अपनी थकावट को व्यक्त किए बिना मुस्कुराते हुए मुझे से बात करती रही, उसी तरह स्वर्गीय माता मुझे सांत्वना देती और उज्ज्वल मुस्कान के साथ कहती हैं, “हौसला रखो!” और भले ही वह अपनी सन्तानों के कारण पीड़ा और बलिदान के मार्ग पर चल रही हैं, वह अपने दर्द को छिपाती हैं। तब स्वर्गीय माता को कितना दुःख हुआ होगा जब मैंने स्वर्ग में और इस पृथ्वी पर उनके मन का विचार न करते हुए प्रेम भरे वचनों से मुंह फेर लिया था। यह विचार करते हुए मैंने अपना सिर झुका लिया कि मेरे कारण स्वर्गीय माता को अत्यधिक दर्द उठाना पड़ा है।

जिस तरह बचपन में मैं अपनी मां की पीठ पर शांति से अपनी मंजिल पर पहुंच सकी, वैसे ही स्वर्गीय माता पापियों के बदले पापों का बोझ उठाकर हमारे आगे कांटों भरे मार्ग पर चल रही हैं, ताकि स्वर्ग जाने का हमारा मार्ग सरल हो सके। जब हम परमेश्वर के वचनों का पालन करते हैं और माता के साथ चलते हैं, तो हम अपने घर, स्वर्ग में सुरक्षित रूप से पहुंच सकेंगे। इस बात को अपने हृदय पर उत्कीर्ण करते हुए, जहां कहीं भी पिता और माता मेरा नेतृत्व करेंगे, मैं उनका पालन करूंगी।