हमेशा पहली मानसिकता के साथ

1शमूएल 10:17–24

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जब शमूएल न्यायी के रूप में इस्राएल की अगुवाई करता था, इस्राएलियों ने उससे अपने ऊपर शासन करने के लिए एक राजा को नियुक्त करने का आग्रह किया। तब परमेश्वर ने उसे आदेश दिया कि वह इस्राएल के प्रत्येक गोत्र में से हजार–हजार पुरुषों को परमेश्वर के सामने खड़ा करे।

शमूएल परमेश्वर के वचन के अनुसार सभी गोत्रों को निकट लाया और चिट्ठी डाली। बारह गोत्रों में से बिन्यामीन का गोत्र चुना गया, और बिन्यामीन के गोत्र में से मत्री का परिवार चुना गया और उनमें से कीश का पुत्र शाउल चुना गया। लोगों ने शाऊल को इधर–उधर ढूंढ़ा पर वह नहीं मिला।

“क्या शाऊल यहां नहीं आया है?”

लोगों ने जो शाऊल को नहीं ढूंढ़ पाए, परमेश्वर से इस तरह पूछा। तब परमेश्वर ने शाऊल का ठिकाना बता दिया जो शर्म के मारे भेंट सामग्री के पीछे छिप गया था। लोग दौड़कर शाऊल को वहां से ले आए। शाऊल लोगों के बीच खड़ा हुआ। शाऊल इतना लंबा था कि सभी लोग बस उसके कंधे तक आ रहे थे। शमूएल ने सब लोगों से कहा,

“उस व्यक्ति को देखो जिसे यहोवा ने चुना है। लोगों में कोई व्यक्ति शाऊल के समान नहीं है।”

तब सब लोगों ने नारा लगाया, “राजा दीर्घायु हो!”

जब शाऊल को इस्राएल के प्रथम राजा के रूप में घोषित किया गया, उसने लोगों की निगाहों से बचने के लिए अपने आपको छिपाया। भले ही लोगों ने शाऊल की निन्दा करते हुए कहा, “यह व्यक्ति हम लोगों की रक्षा कैसे कर सकता है?” फिर भी शाऊल चुप रहा। जब शमूएल शाऊल से पहली बार मिला, तब शाऊल ने खुद को इस्राएलियों में से सबसे छोटा कहा और राजा के पद के लिए अयोग्य माना (1शम 9:20–21)।

उस समय परमेश्वर ने शाऊल को राजा के रूप में चुना और उसके सिर पर तेल उंडेला। यदि शाऊल ने अंत तक नम्रता से कार्य किया होता, तो वह बाइबल के किरदारों में से अवज्ञाकारी का उदाहरण न बना होता और परमेश्वर के द्वारा एक धर्मी के रूप में स्वीकार किया गया होता। शाऊल के समान न बनने के लिए, हमें अपने मन को टटोलकर देखना चाहिए कि हमारा मन घमण्डी है या नम्र है। जो हमेशा अपने आपको नम्र बनाता है, उसका परमेश्वर अपने कार्य में इस्तेमाल करते हैं।