प्रचार हमारे तरीके पर नहीं, बल्कि हमारे मन पर निर्भर है

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अगर परमेश्वर की कोई संतान परमेश्वर की इच्छा को महसूस करती है और उसे अमल में लाना चाहती है, तो यह उसकी इच्छा है कि अच्छी तरह से प्रचार करे और अच्छा फल उत्पन्न करे। यीशु ने चेलों को यह सिखाया: “मेरे पिता की महिमा इसी से होती है कि तुम बहुत सा फल लाओ”(यूह 15:8)।

कुछ सदस्य जो हर संभव तरीके से फल उत्पन्न करना चाहते हैं, वे प्रचार के विशेष तरीके को ढूंढ़ने की कोशिश करते हैं। लेकिन, हम अक्सर ऐसे नए सदस्यों को देखते हैं, जो हाल ही में सत्य को ग्रहण करने पर भी और प्रचार करने के लिए अनुभवहीन होने पर भी बहुत फल पैदा करते हैं। इसके द्वारा हम महसूस कर सकते हैं कि प्रचार का कोई निश्चित तरीका नहीं है। अब आइए हम कुछ समय निकालकर इसकी फिर से पुष्टि करें कि हमारे प्रचार करने के तरीके को देखकर नहीं, बल्कि हमारे मन को देखकर, परमेश्वर हमें सुसमाचार के बहुमूल्य फल प्रदान करते हैं।

जब हम पूरा मन लगाकर प्रचार करते हैं, सुसमाचार के फल उत्पन्न होते हैं

“पूरे संसार में यरूशलेम माता की महिमा का प्रचार करने के समारोह” से हमें ऐसा अर्थपूर्ण समय बिताने का मौका मिला जब हम फिर से इस बात की पुष्टि कर सके, कि प्रचार हमारे तरीके पर नहीं, बल्कि हमारी मानसिकता पर निर्भर होता है। उन दिनों हम लगातार खुशियों भरे समाचार सुनते थे कि दुनिया भर में सदस्य बहुतायत से फल उत्पन्न कर रहे हैं, और उनमें ज्यादातर समाचार ऐसे थे कि उन्होंने एक विशेष तरीके से नहीं, परन्तु एक विशेष मानसिकता से प्रचार करके फल उत्पन्न किया।

उन सदस्यों के लिए, जो नौकरी करते हैं, अपने कामों में काफी व्यस्त होने के कारण सुसमाचार का प्रचार करना आसान नहीं है, लेकिन हम अक्सर सुनते हैं कि उन्होंने अपने कार्यस्थल में उत्सुक मन से प्रचार करके बहुत फल उत्पन्न किए। एक बहन ने, जो भविष्यवाणी के साथ कदम से कदम मिलाते हुए स्वर्गीय माता की गवाही देना चाहती थी, अपने बहुत सारे ग्राहकों को बाइबल की सिर्फ एक आयत दिखाकर स्वर्गीय माता का प्रचार किया और उन्हें सिय्योन की ओर ले आई। एक भाई ने अपने कार्यस्थल के ग्राहक प्रतीक्षालय में एक बुक शेल्फ में हमारे चर्च की मासिक पत्रिका रखी थी और उस मासिक पत्रिका के द्वारा एक आत्मा को चर्च के संदेश का परिचय देकर उसकी सिय्योन की ओर अगुवाई की। एक स्थानीय चर्च ने एक विदेशी व्यक्ति को चर्च के कैलेंडर में सिर्फ एक तस्वीर दिखाकर उसकी अगुवाई की; जब वह कैलेंडर में अपने देश में स्थित चर्च ऑफ गॉड के सदस्यों को देख रहा था, तब अचानक उसकी नजर उसके दोस्त पर पड़ी, और उसने अपना मन खोला।

‘क्या हम सचमुच उस तरीके से प्रचार करके फल ला सकते हैं?’ मनुष्य के विचार से ऐसी आशंका उत्पन्न होती है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि उस तरीके से ही सुसमाचार के सुंदर फल उत्पन्न होते हैं। यह इसलिए है क्योंकि प्रचार हमारी बोलने की शक्ति या किसी विशेष तरीके पर निर्भर नहीं होता। भले ही हम बोलने में चतुर न हों या हमारे प्रचार का तरीका बेढंगा हो, फिर भी अगर हमारे पास दूसरे व्यक्ति की आत्मा को बचाने के लिए उत्सुक मन है, तो वह हमारे उत्सुक और ईमानदार मन को पढ़ लेता है और गहराई से प्रेरित होता है।

क्योंकि मसीह ने मुझे बपतिस्मा देने को नहीं, वरन् सुसमाचार सुनाने को भेजा है, और यह भी शब्दों के ज्ञान के अनुसार नहीं, ऐसा न हो कि मसीह का क्रूस व्यर्थ ठहरे। 1कुर 1:17

क्योंकि हम अपने विवेक की इस गवाही पर घमण्ड करते हैं, कि जगत में और विशेष करके तुम्हारे बीच, हमारा चरित्र परमेश्वर के योग्य ऐसी पवित्रता और सच्चाई सहित था, जो शारीरिक ज्ञान से नहीं परन्तु परमेश्वर के अनुग्रह के साथ था। 2कुर 1:12

असल में यह सच नहीं है कि कोई वाक्पटुता में कुशल होने के कारण बहुत फल फलता है और दूसरा वाक्पटुता में अकुशल होने के कारण फल नहीं फलता। हम फल उत्पन्न करने के काबिल हैं या नहीं, यह हमारे बोलने पर निर्भर नहीं होता। हम कितना ज्यादा परमेश्वर से प्रेम करते हैं और उनकी इच्छा का कितना ज्यादा पालन करते हैं, उसके हिसाब से हम फल पैदा कर सकते हैं। जो परमेश्वर के वचनों के अनुसार कार्य करते हैं, वे आशीर्वाद पा सकते हैं(याक 1:25)।

प्रचार परमेश्वर की सामर्थ्य के द्वारा किया जाता है

दुनिया भर में सुसमाचार तेजी से फैल रहा है। सदस्य जो भविष्यवाणी की सिद्धि करने में शामिल होना चाहते हैं, वे लगातार अपनी छुट्टियों के दौरान अल्पकालिक प्रचार यात्रा के लिए विदेश जाते हैं। यदि हम उनके अनुभव सुनें, तो हम स्पष्ट रूप से समझ सकते हैं कि परमेश्वर अपनी संतानों का मन देखकर उन्हें महान आशीष देते हैं।

सब सदस्य एक स्वर में कहते हैं कि जब वे विदेश गए, भाषा और संस्कृति का फर्क, जो विदेशी प्रचार मिशन में बड़ा अवरोध जैसा लगता था, सिर्फ एक छोटी समस्या थी। उन्होंने कहा कि भले ही उन्होंने बिल्कुल टूटी-फूटी भाषा में कहा, फिर भी बहुत से लोगों ने सत्य को ग्रहण किया। चाहे लोगों ने शुरू में उनकी बात नहीं समझी, लेकिन जब उन्होंने हर मुमकिन तरीके से वचन का प्रचार करने की कोशिश की, तब बहुत से लोग उनकी उत्सुकता से प्रेरित होकर ध्यान से परमेश्वर के वचनों को देखने लगे और समझ गए। आखिरकार प्रचार हमारे मन पर निर्भर होता है।

हे भाइयो, जब मैं परमेश्वर का भेद सुनाता हुआ तुम्हारे पास आया, तो शब्दों या ज्ञान की उत्तमता के साथ नहीं आया। क्योंकि मैं ने यह ठान लिया था कि तुम्हारे बीच यीशु मसीह वरन् क्रूस पर चढ़ाए हुए मसीह को छोड़ और किसी बात को न जानूं। मैं निर्बलता और भय के साथ, और बहुत थरथराता हुआ तुम्हारे साथ रहा; ओर मेरे वचन, और मेरे प्रचार में ज्ञान की लुभानेवाली बातें नहीं, परन्तु आत्मा और सामर्थ्य का प्रमाण था, इसलिये कि तुम्हारा विश्वास मनुष्यों के ज्ञान पर नहीं, परन्तु परमेश्वर की सामर्थ्य पर निर्भर हो। 1कुर 2:1-5

बाइबल बार बार जोर देती है कि प्रचार सांसारिक ज्ञान के द्वारा नहीं किया जाता। सुसमाचार ऐसी चीज नहीं है, जिसे हम अपने ज्ञान या क्षमता से कर सकते हैं। हमारा प्रचार करने का उत्कृष्ट कौशल या तरीका हमें फल उत्पन्न करने में सक्षम नहीं बनाता, पर हमारा उत्सुक मन ही, जो स्वर्ग में एक और आत्मा की अगुवाई करना चाहता है, हमें फल उत्पन्न करने में सक्षम बनाता है।

‘मैं प्रचार नहीं कर सकता, क्योंकि मुझ में कई मायनों में कमियां हैं।’ इस तरह का विचार तभी हमारे मन में आता है जब हम परमेश्वर पर, जो हमें फलों की अनुमति देते हैं, पूरी तरह से निर्भर नहीं रहते। वह “मैं” नहीं है जो फल फलता है, पर वह परमेश्वर की ओर से एक उपहार है। प्रेरित पौलुस ने भी यह महसूस किया और परमेश्वर के अनुग्रह के अनुसार सुसमाचार का प्रचार करने के द्वारा बहुत सारे लोगों की अगुवाई सत्य की ओर की। इसके परिणाम में, वह आज के दिन भी सबसे उत्तम प्रचारक के रूप में पहचाना जाता है।

इसलिए जब हम सुसमाचार का प्रचार करते हैं, हमें अपने ज्ञान की बातों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, पर सिर्फ बाइबल की शिक्षाओं का पालन करना चाहिए। बहुत सी गरीब आत्माएं हैं, जो अकेले छोड़े जाने पर अपने पापों के कारण अनन्त नरक के दण्ड से नहीं बच सकतीं। अगर हम बड़ी उत्सुकता से उन्हें परमेश्वर का प्रेम और शुभ संदेश सुनाएं, तो हम अच्छा फल उत्पन्न कर सकते हैं।

इस समय भी उन आत्माओं को बचाने के लिए, जिन्होंने अभी तक शुभ संदेश नहीं सुना है, दुनिया भर में हमारे सिय्योन के सदस्य उन्हें बड़ी उत्सुकता से सुसमाचार का प्रचार कर रहे हैं और बहुतायत से फल उत्पन्न कर रहे हैं। नबी जो विदेश में भेजे हुए हैं, सदस्य जो दीर्घकालिक और अल्पकालिक प्रचार यात्रा में शामिल हैं, और विदेशी सदस्य जिन्होंने कोरिया में सत्य ग्रहण करने के बाद अपने देश में परिवार जनों की सिय्योन में अगुवाई की है, वे सब अपनी परिस्थितियों में बड़ी उत्सुकता से वचन का प्रचार कर रहे हैं, जिससे बहुत सी आत्माओं की अगुवाई सत्य की ओर हो रही है।

उस प्रत्येक व्यक्ति पर, जिसमें सुसमाचार के लिए उत्साह है, परमेश्वर पवित्र आत्मा का तेल उंडेलते हैं। इसके परिणाम में, दुनिया भर में सुसमाचार के कार्य की ज्वाला तेजी से जल रही है। जब मुर्गी का चूजा अपना अंडा फोड़कर बाहर निकलने की कोशिश करता है, तब जैसे माता मुर्गी अंडे को बाहर से चोंच मारकर अपने बच्चे की बाहर निकलने के लिए मदद करती है, वैसे ही परमेश्वर हमारी छोटी आज्ञाकारिता और उत्साह को देखकर हमारी मदद करते हैं और बड़ी आशीष देते हैं, चाहे हम संख्या में अधिक हों या कम, या हमारा प्रचार का तरीका कुशल हो या न हो।

प्रेम जो परमेश्वर के बलिदान के द्वारा हासिल हुआ

अगर मनुष्य जाति का उद्धार सिर्फ कुछ ही शब्दों के द्वारा प्राप्त हो सकता, तो परमेश्वर को इस पृथ्वी पर आकर दुख उठाने और खुद को बलिदान करने और क्रूस का दर्द सहने की कोई जरूरत नहीं होती। क्रूस का दुख उन यीशु का प्रेम और बलिदान था, जिन्होंने पापों के कारण मरणाधीन बनी मानवजाति को बचाने के लिए स्वेच्छा से अपनी जान तक दे दी।

स्वर्गीय पिता और माता जो पवित्र आत्मा के युग में उद्धारकर्ता के रूप में आए, वे भी कंटीले मार्ग पर चले और हर एक आत्मा को ढूंढ़ा। चूंकि एलोहीम परमेश्वर ने अपनी संतानों को जीवन देने के लिए उत्सुक मन के साथ नई वाचा के सत्य को सिखाया, इसलिए आज सुसमाचार के कार्य ने ऐसी उल्लेखनीय वृद्धि को हासिल किया।

अगर हम परमेश्वर के मन को, चाहे थोड़ा सा हो, समझें और जिस प्रकार उन्होंने किया, उसी प्रकार प्रेम और बलिदान के साथ सुसमाचार का कार्य करें, तो हम अच्छे परिणामों को हासिल कर सकते हैं। उन सदस्यों के जीवन के हर पहलू को देखिए, जो अभी बहुतायत से फल फल रहे हैं। उनमें से कुछ सदस्य इस संकल्प के साथ भोर को प्रार्थना करके दिन की शुरुआत करते हैं, कि वे उन एलोहीम परमेश्वर के उदाहरण का पालन करेंगे जो भोर को उठकर हमारे लिए प्रार्थना करते हैं। दूसरे सदस्य हर दिन यह सोचते हुए अपने संकल्प को और अधिक दृढ़ करते हैं, ‘स्वर्गीय पिता और माता ने स्वर्ग का महिमामय सिंहासन छोड़ा और नीचे इस पृथ्वी पर, जो उनके लिए नई और अपरिचित भूमि है, उतर आए, और उन्होंने अपने बनाए हुए जीवों से तिरस्कार और अपमान को सहन करते हुए भी अपने आपको सुसमाचार के लिए पूरी तरह से समर्पित किया। अभी मैं एक आत्मा बचाने के लिए कितना ज्यादा प्रयास और बलिदान कर रहा हूं?’

सिय्योन में बहुत से विश्वविद्यालय के छात्रों ने अपनी छुट्टियों के दौरान विदेशी प्रचार यात्रा में भाग लिया। दुनिया भर में बिखरे हुए अपने खोए हुए स्वर्गीय परिवार के सदस्यों को ढूंढ़ने के दृढ़ संकल्प के साथ, जब उन्होंने विदेश में सुसमाचार का प्रचार किया, उन्होंने फल फलने का आनन्द चखा; वे किसी और चीज से ज्यादा इस चीज को महसूस करके प्रभावित हुए कि स्वर्गीय पिता और माता ने एक-एक करके अपनी संतान ढूंढ़ते समय कितना व्याकुल महसूस किया होगा। उन्होंने उन पिता और माता के उत्सुक मन के साथ सत्य का प्रचार किया जो अपनी संतानों को ढूंढ़ने के लिए बहुत बेचैन हैं, इसलिए प्रचार यात्रा के दौरान उनके लिए हर दिन अनमोल और बहुमूल्य समय था। उन्होंने यह भी महसूस किया कि परमेश्वर ने उन्हें फल प्रदान किए, इसलिए नहीं कि वे बोलने में माहिर थे या अच्छी तरह विदेशी भाषा बोल सकते थे, बल्कि इसलिए कि वे सब एक मन बने। जैसे उन्होंने वह महसूस किया, वे और अधिक एकजुट हो गए। इतने कम समय में वे कैसे बहुत फल फल सके और सुसमाचार के प्रति अपने रवैये को कैसे नया बना सके? क्योंकि उनके पास सुसमाचार के उस पथ पर चलने की मानसिकता थी, जिस पर परमेश्वर चले थे।

परमेश्वर के वंश

हम परमेश्वर की संतान हैं। परमेश्वर की संतान, जो परमेश्वर के स्वरूप में सृजी गई थीं, वे सिर्फ अपनी आत्मा की सुरक्षा का ख्याल रखते हुए आसानी से विश्वास का जीवन नहीं जीतीं। जब वे उन आत्माओं को देखती हैं जो उद्धार के शुभ संदेश की उपेक्षा करती हैं, तो वे हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठ सकतीं, क्योंकि यिर्मयाह नबी की तरह वे उन पर बहुत तरस खाती हैं और चिंता करती हैं। उनके लिए सुसमाचार का प्रचार नहीं करना असहनीय है, क्योंकि वे परमेश्वर के स्वरूप के सदृश्य हैं।

क्या ऐसे कोई माता-पिता हैं जो अपने बच्चों को गलत रास्ते पर जाते हुए देखकर भी उन्हें सही रास्ते पर लाने की कोशिश नहीं करेंगे, भले ही उन्हें मालूम है कि अकेले छोड़े जाने पर उनके बच्चों के साथ क्या होगा? इसी तरह से स्वर्गीय पिता और माता, यानी हमारे आत्मिक माता-पिता भी हमारे बारे में ऐसा ही महसूस करते हैं। हमें इसके बारे में सोचना चाहिए कि क्यों अति पवित्र परमेश्वर अपने बहुमूल्य शरीर के बिगड़ जाने तक सताए जाने पर भी चुपचाप कंटीले मार्ग पर चलते रहे।

वह सताया गया, तौभी वह सहता रहा और अपना मुंह न खोला; जिस प्रकार भेड़ वध होने के समय और भेड़ी ऊन कतरने के समय चुपचाप शान्त रहती है, वैसे ही उसने भी अपना मुंह न खोला। अत्याचार करके और दोष लगाकर वे उसे ले गए; उस समय के लोगों में से किसने इस पर ध्यान दिया कि वह जीवतों के बीच में से उठा लिया गया? मेरे ही लोगों के अपराधों के कारण उस पर मार पड़ी। उसकी कब्र भी दुष्टों के संग ठहराई गई, और मृत्यु के समय वह धनवान का संगी हुआ, यद्यपि उसने किसी प्रकार का उपद्रव न किया था और उसके मुंह से कभी छल की बात नहीं निकली थी। तौभी यहोवा को यही भाया कि उसे कुचले; उसी ने उसको रोगी कर दिया; जब वह अपना प्राण दोषबलि करे, तब वह अपना वंश देखने पाएगा, वह बहुत दिन जीवित रहेगा; उसके हाथ से यहोवा की इच्छा पूरी हो जाएगी। यश 53:7-10

अपनी संतानों को बचाने के लिए, परमेश्वर ने हमारे बदले हमारे पापों को उठाया और तिरस्कार और क्रूस के दर्द को सहा। बाइबल कहती है कि जब परमेश्वर अपने बलिदान के द्वारा अपना प्राण दोषबलि करेंगे, तब वह अपना वंश देखने पाएंगे। “अपना वंश” किसे दर्शाता है?

हम परमेश्वर को “पिता” और “माता” इसलिए कहते हैं क्योंकि हम उनके वंश हैं, जिन्हें उनके बलिदान के द्वारा जन्म मिला है और जिन्होंने उनसे जीवन प्राप्त किया है। संतान निश्चय अपने माता-पिता से मिलती-जुलती हैं। अगर हम सचमुच परमेश्वर की संतान हैं, तो हमारा मन उन परमेश्वर के मन से मिलना-जुलना चाहिए, जो मानव जाति से प्रेम करते हैं।

अगर परमेश्वर ने हमारी उन आत्माओं को अकेले छोड़ा होता, जो अनंत विनाश की ओर दौड़ रही थीं, तो हम कैसे अनंत स्वर्ग के राज्य की बाट जोह सकते और कैसे उज्ज्वल भविष्य का स्वप्न संजोकर रख सकते? परमेश्वर ने हमारे पापों के लिए खुद को बलिदान किया, और भले ही हमने अपने मन के द्वार को बंद किया और वचन सुनने से इनकार किया, फिर भी उन्होंने हमारे हठीले मन को प्रेम के साथ पिघलाकर हमें आत्मिक सिद्धांतों को महसूस करवाया। इसके परिणाम में, हम सिय्योन आकर जीवन पाने में सक्षम बने हैं। परमेश्वर की संतान के रूप में, हमें उन आत्माओं को, जिन्हें अभी तक जीवन के मूलभूत सवालों का जवाब नहीं पता है, एलोहीम परमेश्वर के जीवन के वचन और उनका पवित्र प्रेम सुनाना चाहिए और उनकी अगुवाई परमेश्वर की बांहों में करनी चाहिए।

परमेश्वर की संतान जो पूरी तरह परमेश्वर से मिलती-जुलती हैं

यदि हम स्वर्गीय पिता और माता की संतान हैं जो उनसे मिलती-जुलती हैं, तो हमें उस मार्ग पर चलना चाहिए, जिस पर परमेश्वर चले थे, और उनका कार्य करना चाहिए। एक आत्मा बचाने के लिए, परमेश्वर ने प्रार्थना से हर दिन की शुरुआत की और यह कहते हुए हर दिन प्रचार किया, कि इसी कारण से वह नीचे पृथ्वी पर आए।

भोर को दिन निकलने से बहुत पहले, वह(यीशु) उठकर निकला, और एक जंगली स्थान में गया और वहां प्रार्थना करने लगा। तब शमौन और उसके साथी उसकी खोज में गए। जब वह मिला, तो उससे कहा, “सब लोग तुझे ढूंढ़ रहे हैं।” उसने उनसे कहा, “आओ; हम और कहीं आसपास की बस्तियों में जाएं, कि मैं वहां भी प्रचार करूं, क्योंकि मैं इसी लिये निकला हूं।” मर 1:35-38

परमेश्वर चाहते हैं कि हम सिर्फ अपनी ही आत्मा की देखभाल न करें, परन्तु अपने आसपास की उन आत्माओं को भी बचाएं, जिनकी दूसरे लोग परवाह नहीं करते, ताकि हम सभी एक साथ अनन्त स्वर्ग के राज्य में वापस जा सकें। आइए हम अच्छी तरह से परमेश्वर की इस इच्छा का पालन करके, पूरे संसार के सभी लोगों पर परमेश्वर के उद्धार की उज्ज्वल ज्योति को और अधिक चमकाएं।

भले ही सुसमाचार का परिणाम तुरंत न मिले, हमें निराश होने की जरूरत नहीं है। चूंकि बाइबल कहती है, “उचित समय पर हम फसल काटेंगे,” अगर हम यत्न से पीड़ा और बलिदान के मार्ग पर चलेंगे, जिस पर पिता और माता चले थे, तो परमेश्वर अवश्य हमें एक दिन बहुतायत से सुसमाचार के फल फलने की अनुमति देंगे। आइए हम यह सोचें कि परमेश्वर ने किस प्रकार के मन से मानव जाति को बचाने के लिए सुसमाचार का कार्य किया, और आइए हम स्वभाव और आचरण में पिता और माता के सदृश्य बनें।

यद्यपि एक बच्चा शायद अपने माता-पिता के जैसा बिल्कुल नहीं दिखता हो, यह काफी दिलचस्प है कि वह अनजाने में ऐसी ही कुछ आदतों को दिखाता है जो उसके माता-पिता की आदतों के सदृश्य होती हैं। आत्मिक रूप से भी इसी तरह है; हम अवश्य कुछ बातों में स्वर्गीय पिता और माता के सदृश्य हैं। हमें हर मुमकिन तरीके से परमेश्वर के सदृश्य होने की ज्यादा से ज्यादा कोशिश करनी चाहिए, ताकि हम परमेश्वर की महिमा को प्रदर्शित कर सकें। खासकर, बलिदान और आत्मसमर्पण में परमेश्वर के सदृश्य बनकर, आइए हम आत्माओं को बचाने में आगे रहें।

मुझे यकीन है कि अगर हम इस विश्वास के साथ सुसमाचार का कार्य करें कि एक आत्मा को बचाना संसार को बचाना है, तो सुसमाचार का बाकी कार्य परमेश्वर के अनुग्रह के द्वारा बहुत ही जल्द पूरा होगा। पहले हमें अपने आसपास की आत्माओं को पूरा मन लगाकर प्रचार करना चाहिए, ताकि वे परमेश्वर का वचन सुन सकें। मैं आशा करता हूं कि सिय्योन के सभी भाई और बहनें ऐसे सुंदर मन के साथ जो परमेश्वर को प्रभावित करने के लिए काफी है, सुसमाचार का प्रचार करके बहुत अच्छे फल फलें।