संसार में लोगों के जीवन में अपने विभिन्न उद्देश्य होते हैं। वे अपने मन में आशा संजोकर भविष्य के लिए योजनाएं बनाते हैं कि वे कब एक घर खरीदेंगे, वे कैसे अपने बच्चों को पढ़ाएंगे, इत्यादि।
वे नौकरी की जगह पर तभी आनन्द महसूस करते हैं जब उनके पास आशा होती है। जब उनके पास एक अच्छा पद पाने की और निकट भविष्य में एक आनन्दमय जीवन जीने की आशा होती है, तो क्या वे अपनी नौकरी की जगह पर शक्ति नहीं पाते और मेहनत से काम नहीं करते?
परमेश्वर के लोगों के पास भी अपने भविष्य के लिए उद्देश्य होने चाहिए। अब, आइए हम उन योजनाओं के बारे में सोचते हुए जो हमने अपने विश्वास के जीवन के भविष्य के लिए बनाई हैं, अपने उद्देश्यों और आशाओं को जांचने का समय लें।
अब कहां जाना है, मंजिल क्या है, यह जाने बिना केवल मार्ग पर चलते रहने से ज्यादा मुश्किल कुछ भी नहीं है। यदि कोई यात्री यह जानता हो कि 100 मीटर के बाद वह अपनी मंजिल पर पहुंच जाएगा, तो वह कम थकान महसूस करेगा। लेकिन यदि उसे यह मालूम न हो कि और कितना आगे जाना है, तो वह थक जाएगा और आसानी से हार जाएगा।
अब, आइए हम इसके बारे में सोचें कि हम एक उद्देश्य सहित विश्वास का जीवन जी रहे हैं या नहीं। परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करते समय और उनका प्रचार करते समय, यदि हमारे हृदय में आनन्द और आत्मा में शक्ति महसूस न हो, तो यह इसका सबूत है कि अब तक हमने अपने विश्वास के जीवन में कुछ महत्वपूर्ण चीजों को नहीं समझा है और यह भी कि परमेश्वर पर हमारा विश्वास अभी भी कुछ हद तक अनिश्चित और धुंधला है।
मान लीजिए कि कोई अनिश्चितता के साथ सब्त और पर्वों में आराधना करता है, अनिश्चितता के साथ परमेश्वर के वचन का अध्ययन करता है, अनिश्चितता के साथ प्रार्थना करता है, अनिश्चितता के साथ सुसमाचार का प्रचार करता है, और अनिश्चितता के साथ ही प्रचार करने विदेश जाने की आशा करता है। चूंकि वह व्यक्ति यह भी नहीं जानता कि उसे यह सब कुछ क्यों करना चाहिए, वह कैसे ऊर्जावान हो सकता है? उसी तरह से, यदि हम भी इस कारण को स्पष्ट रूप से न समझें कि क्यों हमें अपने आपको आत्माओं को बचाने के कार्य में पूरी तरह से समर्पित कर देना चाहिए, और यदि हम उसके लिए कुछ स्पष्ट उद्देश्य न बनाएं, तो स्वर्ग के राज्य के प्रति हमारी उत्सुक आशा गायब हो जाएगी और हम सुसमाचार का प्रचार करने का जोश भी खो देंगे।
यह मतलब नहीं कि मैं पा चुका हूं, या सिद्ध हो चुका हूं; पर उस पदार्थ को पकड़ने के लिये दौड़ा चला जाता हूं, जिसके लिये मसीह यीशु ने मुझे पकड़ा था। हे भाइयो, मेरी भावना यह नहीं कि मैं पकड़ चुका हूं: परन्तु केवल यह एक काम करता हूं कि जो बातें पीछे रह गई हैं उनको भूल कर, आगे की बातों की ओर बढ़ता हुआ, निशाने की ओर दौड़ा चला जाता हूं, ताकि वह इनाम पाऊं जिसके लिये परमेश्वर ने मुझे मसीह यीशु में ऊपर बुलाया है। फिलि 3:12-14
विश्वास का जीवन जीने के दौरान प्रेरित पौलुस के पास हमेशा उद्देश्य होते थे। उसने यह स्पष्ट रूप से समझकर कार्य किया था कि क्यों उसे सुसमाचार के प्रचार के कार्य में अपने आपको समर्पित करना चाहिए। इसके परिणामस्वरूप उसने कभी भी अपने विश्वास का जोश और उत्साह नहीं खोया।
हमारे विश्वास के जीवन का भी एक निश्चित कारण और उद्देश्य है। हम सब कौन हैं? हम इस पृथ्वी पर किस कारण से आए हैं? क्यों हमें सब्त का दिन, फसह का पर्व और दूसरे सभी पर्व मनाने चाहिए? क्यों हमें आराधनाओं में परमेश्वर के राज्य और उनके धर्म के लिए प्रार्थनाएं करनी चाहिए? क्यों हमें परमेश्वर के वचन सुनने चाहिए और सुसमाचार के कार्यों की चिन्ता में रहना चाहिए? अब, हमें इन सब बातों को एक-एक करके समझना चाहिए।
सबसे पहले आइए हम बाइबल से यह जानें कि हम कौन हैं, हम कहां से आए हैं और हम कहां के हैं।
2,000 साल पहले यीशु इस पृथ्वी पर आए और यह कहते हुए सुसमाचार का प्रचार करना शुरू किया कि, “मन फिराओ क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आया है”(मत 4:17) इन शब्दों के द्वारा, यीशु ने अपने लोगों को परमेश्वर के राज्य की बातें याद दिलाईं। चाहे इस समय हमारा शरीर इस पृथ्वी पर रहता है, लेकिन हमारी आत्मा को उस परमेश्वर के राज्य में जाना चाहिए जहां से वह आई है।
पर हमारा स्वदेश स्वर्ग पर है; और हम एक उद्धारकर्ता प्रभु यीशु मसीह के वहां से आने की बाट जोह रहे हैं। वह अपनी शक्ति के उस प्रभाव के अनुसार जिसके द्वारा वह सब वस्तुओं को अपने वश में कर सकता है, हमारी दीन-हीन देह का रूप बदलकर, अपनी महिमा की देह के अनुकूल बना देगा। फिलि 3:20-21
यदि हमारी नागरिकता स्वर्ग की है, तो इसमें कोई संदेह नहीं है कि हम परमेश्वर के लोग हैं। आइए हम बाइबल से एक बार फिर इस बात की पुष्टि करें कि हम परमेश्वर के लोग हैं जिनकी नागरिकता स्वर्ग की है।
“फिर यहोवा की यह भी वाणी है, सुन, ऐसे दिन आनेवाले हैं जब मैं इस्राएल और यहूदा के घरानों से नई वाचा बांधूंगा… परन्तु जो वाचा मैं उन दिनों के बाद इस्राएल के घराने से बांधूंगा, वह यह है: मैं अपनी व्यवस्था उनके मन में समवाऊंगा, और उसे उनके हृदय पर लिखूंगा; और मैं उनका परमेश्वर ठहरूंगा, और वे मेरी प्रजा ठहरेंगे, यहोवा की यह वाणी है। तब उन्हें फिर एक दूसरे से यह न कहना पड़ेगा कि यहोवा को जानो, क्योंकि, यहोवा की यह वाणी है, छोटे से लेकर बड़े तक, सब के सब मेरा ज्ञान रखेंगे; क्योंकि मैं उनका अधर्म क्षमा करूंगा, और उनका पाप फिर स्मरण न करूंगा।” यिर्म 31:31-34
जब परमेश्वर ने नई वाचा को हमारे लिए एक नई व्यवस्था के रूप में स्थापित किया, तो उन्होंने कहा कि, “मैं तुम्हारा परमेश्वर हूं, और तुम मेरी प्रजा हो।” परमेश्वर ने हमें स्पष्ट रूप से कहा है कि, “तुम जो नई वाचा का पालन करते हो! तुम्हारी नागरिकता स्वर्ग की है।” इसलिए हम परमेश्वर के लोग हैं, और हमारी नागरिकता स्वर्ग की है।
लोगों का शारीरिक जीवन चाहे कितना भी कष्टदायक हो, फिर भी वे अपनी नागरिकता को आसानी से नहीं छोड़ते। आत्मिक रूप से, हमारी स्वर्ग की नागरिकता बहुमूल्य और अतुलनीय है। फिर भी, कुछ लोग ऐसी बहुमूल्य नागरिकता को आसानी से छोड़ देते हैं। वे कितने मूर्ख हैं! सत्य को ग्रहण करने के बाद, उनके हृदयों में आनन्द की अनुभूति होती है, और वे परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करना शुरू करते हैं। हालांकि, वे आसानी से प्रलोभन में गिर जाते हैं और छोटी-छोटी बातों से उनका विश्वास हिल जाता है। इसका कारण है कि उन्होंने अपनी आत्मिक पहचान को मजबूत नहीं किया है। चूंकि वे महिमामय स्वर्ग के राज्य को नहीं समझते, वे आसानी से स्वर्गीय नागरिक के रूप में अपने ऊंचे पद को भूल जाते हैं और अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति लापरवाह बन जाते हैं।
अब, हमें अपनी आत्मिक पहचान ढूंढ़नी चाहिए। हमें अपनी स्वर्गीय नागरिकता का मूल्य समझना चाहिए जो हम सदाकाल तक भोगेंगे, और स्वर्गीय नागरिकों के रूप में अपने कर्तव्यों को पूरा करना चाहिए।
जापानी शासन के दौरान, बहुत से कोरियाई देशभक्तों ने अपने देश की आजादी के लिए संघर्ष किया था। चाहे वे सब भूखे, प्यासे और नंगे रहे और ठंड से ठिठुरे, वे सब एक ही उद्देश्य, यानी अपने देश की आजादी की ओर आगे बढ़े।
अन्य देशों में भटकते हुए, उन्होंने कष्ट, अत्याचार और पीड़ाओं को सहन किया। उन्होंने यह सब कुछ सहन किया और अपने पूरे हृदय से आजादी की लड़ाई के लिए समर्पित रहें। उन्होंने इस बात पर विश्वास करते हुए बहुत मेहनत की कि जिस दिन उनका देश आजादी पा लेगा, उन्हें उनके सभी कठोर दुखों और पीड़ाओं का बदला पूरी तरह से मिलेगा।
फिलहाल हम भी आत्मिक रूप से वैसी ही परिस्थिति में हैं। हमारे शत्रु शैतान ने परमेश्वर के सभी नियत समयों और व्यवस्थाओं को बदल दिया है(दान 7:25); उसने परमेश्वर के नियत पर्वों के नगर और परमेश्वर के सुसमाचार के राज्य, यानी सिय्योन पर आक्रमण किया और उसे उजाड़ दिया। बहुत लम्बे समय से वह परमेश्वर के लोगों को बंदी बनाकर इस संसार का शासक रहा।
शैतान हमारे राज्यक्षेत्र को अपना बताकर उस पर कब्जा कर रहा है। क्या यह हमारे लिए उचित होगा कि हम बिना शैतान के विरुद्ध लड़े उदासीनता से उसे हमारे आत्मिक देश को उजाड़ते हुए देखते रहें? यदि हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें और शैतान की ताकतों को धीरे धीरे परमेश्वर के सुसमाचार के राज्य को उजाड़ते हुए चुपचाप देखते रहें, तो क्या हम कह सकते हैं कि परमेश्वर का राज्य हमारा निजदेश है और हम परमेश्वर के लोग हैं?
परमेश्वर के राज्य के लोगों के रूप में, हमें परमेश्वर के राज्य की बातों के विषय में ज्यादा चिंतित होना चाहिए। यदि इस पृथ्वी पर कोई देश किसी दूसरे देश के द्वारा उजाड़ा जाता हो, तो उस देश के सब लोग क्रोधित हो जाते हैं। तो जब हम शैतान को हमारे आत्मिक देश, यानी सुसमाचार के राज्य को उजाड़ते हुए देखते हैं, तो हमें कितना ज्यादा क्रोधित होना चाहिए! चाहे हम आत्मिक दुनिया की चीजों को नहीं देख सकते, फिर भी हमें कड़ी चौकसी बरतनी चाहिए।
यदि हम चौकस न रहें, तो पृथ्वी पर परमेश्वर के द्वारा स्थापित किया गया सुसमाचार का राज्य धीरे धीरे शैतान के द्वारा उजाड़ दिया जाएगा। दुष्ट शैतान साजिश रचकर परमेश्वर के राज्य पर आक्रमण करने की कोशिश कर रहा है। फिर भी यदि हमारा विश्वास छोटी-छोटी परेशानियों और अत्याचारों से हिलाया जाता है, तो हमें ऐसा कहने में शर्म आएगी कि परमेश्वर का राज्य हमारा स्वदेश है।
शैतान पूरे संसार को भरमाता है। हमें संसार में सच्चा सुसमाचार का बीज बोना चाहिए, ताकि पूरा संसार उद्धार पा सके। जब तक हम अपनी पहचान स्थापित नहीं करते और अपने विश्वास को मजबूत नहीं बनाते, तब तक शैतान हमारे पास आता रहेगा कि हमारी आत्माओं को लूट ले जाए।
प्रेरित पौलुस अपना आत्मिक देश, यानी परमेश्वर के सुसमाचार का राज्य स्थापित करने के कार्य में अपने आपको समर्पित करने के लिए दृढ़ संकल्पी था। चाहे उसने बहुत सी परेशानियों और खतरों का सामना किया, वह पूर्ण रूप से सुसमाचार का प्रचार करने के कार्य में समर्पित रहा। वह सुसमाचार के राज्य, हमारे अनन्त घर को स्थापित करने के लिए था। उस राज्य के लिए, प्रेरित पौलुस ने सभी प्रकार की परेशानियों और अत्याचारों को सहन करते हुए मसीह के क्रूस में सहभागिता की।
हमें अपनी खोई हुई आत्मिक पहचान को पुन: प्राप्त करके स्वर्गीय देशभक्तों की तरह, अपने अनन्त स्वदेश, यानी परमेश्वर के सुसमाचार के राज्य की पुन: स्थापना के लिए अपने आपको समर्पित कर देना चाहिए। हमारे पिता परमेश्वर ने हमारे सामने सभी मार्गों को खोल दिया है; उन्होंने नई वाचा के सत्य को पुन: स्थापित किया है जिसके द्वारा सुसमाचार का राज्य पुन: स्थापित हो सकता है। और हमारी माता उस मार्ग पर जिस पर हमें चलना चाहिए, स्वयं हमारी अगुआई करती हैं। हमारे पिता और माता के उदाहरणों का पालन करते हुए, हमें परमेश्वर के सुसमाचार के राज्य के लिए मेहनत करनी चाहिए, ताकि वह पूरे संसार में पुन: स्थापित हो सके।
सामरिया और पृथ्वी की छोर तक सुसमाचार का प्रचार करना, यही अपने खोए हुए सुसमाचार के राज्य को पुन: स्थापित करने का आंदोलन है। और इसी कारण से प्रेरित पौलुस ने सभी प्रकार की परेशानियों और खतरों के बावजूद मेहनत से प्रचार किया।
… अधिक परिश्रम करने में; बार बार कैद होने में; कोड़े खाने में; बार बार मृत्यु के जोखिमों में। पांच बार मैं ने यहूदियों के हाथ से उन्तालीस उन्तालीस कोड़े खाए। तीन बार मैं ने बेंतें खाईं; एक बार मुझ पर पथराव किया गया; तीन बार जहाज, जिन पर मैं चढ़ा था, टूट गए; एक रात-दिन मैं ने समुद्र में काटा। मैं बार बार यात्राओं में; नदियों के जोखिमों में; डाकुओं के जोखिमों में; अपने जातिवालों से जोखिमों में; अन्यजातियों से जोखिमों में; नगरों के जोखिमों में; जंगल के जोखिमों में; समुद्र के जोखिमों में; झूठे भाइयों के बीच जोखिमों में रहा। परिश्रम और कष्ट में; बार बार जागते रहने में; भूख-प्यास में; बार बार उपवास करने में; जाड़े में; उघाड़े रहने में; और अन्य बातों को छोड़कर जिनका वर्णन मैं नहीं करता, सब कलीसियाओं की चिन्ता प्रतिदिन मुझे दबाती है… 2कुर 11:22-30
पौलुस अपनी आत्मिक पहचान को जान गया था और उसने एक निश्चित उद्देश्य, यानी परमेश्वर के राज्य के लिए सुसमाचार का प्रचार किया। चाहे उसने बहुत से दुखों और अत्याचारों का सामना किया, फिर भी वह कभी नहीं हिचकिचाया और आत्माओं को बचाने का कार्य बन्द नहीं किया। जब कभी भी उसने प्रथम चर्च को पत्र लिखे, उसने इसी बात पर जोर दिया कि वह परमेश्वर के सुसमाचार का राज्य है जिसके लिए वे सब अत्याचारों को और दुखों को सहन कर रहे हैं, और इसके परिणामस्वरूप वे परमेश्वर के राज्य के योग्य ठहराए जाएंगे।
हे भाइयो, तुम्हारे विषय में हमें हर समय परमेश्वर का धन्यवाद करना चाहिए, और यह उचित भी है, इसलिये कि तुम्हारा विश्वास बहुत बढ़ता जाता है, और तुम सब का प्रेम आपस में बहुत ही बढ़ता जाता है। यहां तक कि हम आप परमेश्वर की कलीसिया में तुम्हारे विषय में घमण्ड करते हैं कि जितने उपद्रव और क्लेश तुम सहते हो, उन सब में तुम्हारा धीरज और विश्वास प्रगट होता है। यह परमेश्वर के सच्चे न्याय का स्पष्ट प्रमाण है कि तुम परमेश्वर के राज्य के योग्य ठहरो, जिसके लिये तुम दु:ख भी उठाते हो। 2थिस 1:3-5
हम परमेश्वर की विधियों और व्यवस्था का पालन करते हैं, क्योंकि हम परमेश्वर के लोग हैं। परमेश्वर के लोग होने के नाते यह भी हमारा कर्तव्य है कि हम सुसमाचार का प्रचार करते हुए परमेश्वर के सुसमाचार के राज्य को पुन: स्थापित करें।
उन लोगों की देशभक्ति जिन्होंने अपने देश की आजादी के लिए संघर्ष किया था, आज भी उनके वंशजों के हृदयों को द्रवित करती है। उसी तरह से, आइए हम भी प्रेरित पौलुस, पतरस, याकूब और यूहन्ना जैसे प्रथम चर्च के संतों के जीवन को याद करें, जिन्होंने अपने एक निश्चित उद्देश्य यानी सुसमाचार के राज्य के लिए अपनी पूरी सामर्थ्य के साथ कार्य किया। अब यह बिना हिचकिचाए जाग उठने का और उस सुसमाचार के राज्य को पुन: स्थापित करने का समय है, जो हमारे शत्रु शैतान के द्वारा बहुत लंबे समय से उजाड़ा और नष्ट किया गया है। इसलिए बाइबल कहती है कि, “उठ, प्रकाशमान हो; क्योंकि तेरा प्रकाश आ गया है, और यहोवा का तेज तेरे ऊपर उदय हुआ है”(यश 60:1)।
सुसमाचार के राज्य के खोए राज्यक्षेत्र को फिर से लौटाने के लिए, हमें केवल अपने ही देश में प्रचार नहीं करना चाहिए, लेकिन एशिया, अफ्रीका, यूरोप, ओशिनिया, दक्षिण अमेरिका और उत्तर अमेरिका के देशों में भी करना चाहिए। जब परमेश्वर के सुसमाचार का राज्य पूरे संसार में स्थापित हो जाएगा, तब सुसमाचार का वह कार्य जिसे परमेश्वर ने इस पृथ्वी पर सिद्ध करने की योजना बनाई है, पूरा हो जाएगा।
पुराने नियम की पुस्तक हबक्कूक में लिखे गए नीचे के वचन हमें राह दिखाने वाले और हमारा मार्गदर्शन करने वाले परमेश्वर का, और उस राज्य की महिमा का वर्णन यथार्थता से करते हैं जिसे परमेश्वर स्वयं पुनः स्थापित करते हैं।
हे यहोवा, मैं तेरी कीर्ति सुनकर डर गया। हे यहोवा, वर्तमान युग में अपने काम को पूरा कर; इसी युग में तू उसको प्रकट कर; क्रोध करते हुए भी दया करना स्मरण कर। ईश्वर तेमान से आया, पवित्र ईश्वर परान पर्वत से आ रहा है। उसका तेज आकाश पर छाया हुआ है, और पृथ्वी उसकी स्तुति से परिपूर्ण हो गई है(सेला)। उसकी ज्योति सूर्य के तुल्य थी, उसके हाथ से किरणें निकल रही थीं; और इनमें उसका सामर्थ्य छिपा हुआ था… पहाड़ तुझे देखकर कांप उठे; आंधी और जलप्रलय निकल गए; गहिरा सागर बोल उठा और अपने हाथों अर्थात् लहरों को ऊपर उठाया। तेरे उड़नेवाले तीरों के चलने की ज्योति से, और तेरे चमकीले भाले की झलक के प्रकाश से सूर्य और चन्द्रमा अपने अपने स्थान पर ठहर गए। तू क्रोध में आकर पृथ्वी पर चल निकला, तू ने जाति जाति को क्रोध से नष्ट किया। तू अपनी प्रजा के उद्धार के लिये निकला, हां, अपने अभिषिक्त के संग होकर उद्धार के लिये निकला। तू ने दुष्ट के घर के सिर को कुचल कर उसे गले से नींव तक नंगा कर दिया… हब 3:2-19
जो हमेशा हमारे साथ रहते हैं और अपनी अद्भुत सामर्थ्य से उद्धार का कार्य पूरा करते हैं, वह हमारे परमेश्वर हैं, और हम उनके लोग हैं।
जब तक हमारा देश, यानी परमेश्वर के सुसमाचार का राज्य पूरे संसार में स्थापित नहीं हो जाता, और सभी लोगों को परमेश्वर की बांहों में नहीं लाया जाता, तब तक हमें विश्वास की दौड़ में अपनी गति को कम नहीं करना चाहिए। शैतान ने बहुत से लोगों को भरमाकर परमेश्वर के सुसमाचार के राज्य को नष्ट कर दिया है। अब, आइए हम जाएं और उसे पुन: स्थापित करें। आइए पूरे संसार को सुसमाचार का राज्य बनाएं ताकि परमेश्वर और भी ज्यादा गौरवान्वित हो सकें।
प्रेरित पौलुस अपने आत्मिक स्वदेश, यानी परमेश्वर के राज्य के लिए, हर प्रकार के खतरों का सामना करते हुए न केवल बांधे जाने के लिए, बल्कि मरने के लिए भी तैयार था(प्रे 21:13)। आइए हम अपने पूर्वजों के बारे में जो लिखा गया है उसे केवल इतिहास का एक भाग न समझते हुए, उनके विश्वास के रवैये को दिलों में संजोएं। हम परमेश्वर के लोग हैं जिनकी नागरिकता स्वर्ग की है। हमें किसी भी परेशानी या मुश्किल में न हिलनेवाले दृढ़ विश्वास के साथ, अपने सभी खोए हुए भाइयों और बहनों को खोजना चाहिए और पृथ्वी पर परमेश्वर के सुसमाचार का राज्य स्थापित करना चाहिए।