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माता का प्रेम जो केवल अपनी संतानों की चिंता करती है

फिलाडेल्फिया, पीए, अमेरिका से मैक्सवेल रोथस्टीन

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एक दिन, मैं अपने दादाजी के साथ दोपहर का भोजन कर रहा था, और हम रिश्तों में सबसे महत्वपूर्ण चीज पर चर्चा कर रहे थे। मैंने संचार का उल्लेख किया जिसे मैंने महत्वपूर्ण माना, और तब उन्होंने एक पुरानी कहानी सुनाई।

मेरे पिता का जन्म होने से पहले, मेरे दादा-दादी का एक और बेटा था। वह दिमागी तौर पर मृत जन्मा था, और डॉक्टर ने मेरे दादाजी से कहा कि वह अधिक से अधिक केवल एक दिन या एक सप्ताह तक ही जीएगा। मेरे दादाजी की सबसे बड़ी चिंता यह थी कि अपने बेटे को इस तरह मरते हुए देखकर मेरी दादी का दिल कितना ज्यादा टूटेगा और वह चाहते थे कि मेरी दादी उस दर्द से बचे। इसलिए उन्होंने बिना किसी परामर्श के नवजात शिशु को दूर के किसी संस्थान में भेजने का निर्णय लिया। बाद में, वह मेरी दादी को उनसे दूरी बनाए रखते हुए देख सकते थे। उन्होंने सोचा कि उनके अपने बेटे को दूर भेज देने की बात पर वह उनसे नाराज थी, लेकिन फिर भी वह नहीं चाहते थे कि मेरी दादी अपने बेटे को मरते हुए देखे।

लेकिन जिस संस्थान में बेटा रखा गया था वह बंद हो गया, और बेटे को उनके घर से छह मिनट की दूरी पर स्थित संस्थान पर स्थानांतरित किया गया। यह सोचकर कि वह एक संयोग नहीं हो सकता, मेरे दादाजी अकेले उसे देखने जाने लगे। मेरे दादाजी के उसकी देखभाल करने के बावजूद भी, बेटा मुश्किल से डटे रह रहा था।

एक दिन, मेरे दादाजी घर आए और प्रवेशद्वार खोला। मेरी दादी प्रवेशद्वार पर खड़ी थी और उसने कहा, “मैं अपने बेटे को देखने जाऊंगी, और आप मुझे नहीं रोक सकते और न ही रोकना है।” उस ही क्षण, मेरी दादी घर से तुरंत बाहर निकली और उस संस्थान की ओर चली गई। मेरे दादाजी ने दौड़कर उसका पीछा किया।

उस समय के बाद, वे अपने बेटे की देखभाल करने हर दिन वहां गए। चाहे उनका बेटा अपने आप कुछ नहीं कर सकता था, अपने बेटे के साथ होना मेरी दादी के जीवन में सबसे बड़ी खुशी थी। मेरे दादा ने कहा कि वह उस समय से पहले कभी भी उतनी खुश और हर्षित नहीं थी। चमत्कारिक ढंग से, मेरी दादी के प्रेम के द्वारा जो हमेशा अपने बेटे के करीब रहकर उसकी देखभाल करती थी, बेटा अठारह वर्ष तक जी सका।

कहानी के बाद, मेरे दादाजी ने मुझसे कहा, “रिश्तों में संचार बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन आपकी दादी और मैं अपने बेटे के माध्यम से और बेटे के प्रति हमारे प्रेम से एक हो गए।”

इस कहानी ने मुझे हमारी स्वर्गीय माता के महान प्रेम और हमारे स्वर्गीय पिता के मन का एहसास कराया। स्वर्गीय पिता स्वर्गीय माता से इतना प्रेम करते हैं कि वह केवल अपनी संतान ही नहीं बल्कि उनकी खुशी और सुख की भी परवाह करते हैं। स्वर्गीय माता को किसी भी दर्द का एहसास न करने देने के लिए वह स्वयं को बलिदान करने के लिए इच्छुक थे। लेकिन हमारी स्वर्गीय माता अपनी संतानों के बिना जी नहीं सकतीं; वह हमारे प्रति प्रेम और चिंताओं से परिपूर्ण हैं। कोई भी हमारे प्रति स्वर्गीय माता के प्रेम को नहीं रोक सकता। माता इसकी परवाह नहीं करती कि हम विकलांग, धीमे या अभाव है या नहीं। उनकी सबसे बड़ी खुशी केवल हमारे साथ रहना है। वह हमारे साथ रहने और हमें बचाने इस पृथ्वी पर आई हैं। उनके प्रेम से हममें जीवन है, उनके बलिदान से हम चंगे हुए हैं।

हमारे जीवन में हमारे पिता और माता सबसे महत्वपूर्ण हैं। एलोहीम परमेश्वर के प्रेम का एहसास करते हुए, आज मैं एक संकल्प लेना चाहता हूं: मैं माता के साथ घर जहां पिता हैं, वापस जाने के लिए हर प्रयास करूंगा। उस दिन की आशा करते हुए जब हम स्वर्ग में हमारे पिता और माता के साथ अंनत खुशी और हंसी से परिपूर्ण हो जाएंगे, मैं भाइयों और बहनों के साथ एकता में कार्य करूंगा और इस पृथ्वी पर हमारा मिशन पूरा करूंगा।