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भोजन जो हम खा सकते हैं, और भोजन जो हमें नहीं खाना है

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यहूदी धर्म जो मूसा की व्यवस्था का पालन करता है, और ईसाई धर्म जो मसीह की व्यवस्था का पालन करता है, उनके बीच बहुत से अंतर हैं। उनमें से एक है, भोजन के बारे में नियम।

आइए हम अदन वाटिका के समय से शुरू होकर मूसा की व्यवस्था के युग से गुजरकर प्रथम चर्च के युग तक, कालानुक्रम के अनुसार भोजन के नियमों का अध्ययन करें और फिर उस शिक्षा को देखें जिसका हमें इस नए नियम के युग में पालन करना चाहिए।

हर युग में दिया गया भोजन

1. अदन वाटिका में दिया गया भोजन

अदन वाटिका में, परमेश्वर ने मानवजाति को भोजन के लिए बीजवाले सब पौधे और सब फल दिए।

फिर परमेश्वर ने उनसे कहा, “सुनो, जितने बीजवाले छोटे छोटे पेड़ सारी पृथ्वी के ऊपर हैं और जितने वृक्षों में बीजवाले फल होते हैं, वे सब मैं ने तुम को दिए हैं; वे तुम्हारे भोजन के लिये हैं।” उत 1:29

अदन वाटिका में बीजवाले पौधे और फलों को खाने का नियम आदम और हव्वा के अदन से निकाले जाने के बाद भी जारी रहा। अदन से बाहर निकाले जाने के बाद, उन्होंने भूमि पर खेती करके उसकी उपज को खाया।

2. जलप्रलय के बाद दिया गया भोजन

जलप्रलय के बाद, परमेश्वर ने नूह के परिवार को सिर्फ साग–सब्जियों को नहीं लेकिन प्राणियों को भी खाने की अनुमति दी।

सब चलनेवाले जन्तु तुम्हारा आहार होंगे; जैसा तुम को हरे हरे छोटे पेड़ दिए थे, वैसा ही अब सब कुछ देता हूं। उत 9:3

भोजन का नियम जो नूह के समय में दिया गया था, वह मूसा को व्यवस्था दिए जाने तक जारी रहा।

3. व्यवस्था के साथ दिया गया भोजन

मूसा के युग में, परमेश्वर ने दस आज्ञाओं जैसी बहुत सी व्यवस्थाएं दीं जो परमेश्वर के लोगों को माननी थीं। उनमें से एक व्यवस्था भोजन के बारे में थी।

चाहे कोई भी युग हो, परमेश्वर की आज्ञा का पालन करता है या नहीं, यह एक मानक है, जिससे यह पहचाना जा सकता है कि कौन परमेश्वर की प्रजा है और कौन नहीं है।

क्योंकि तू अपने परमेश्वर यहोवा के लिये एक पवित्र समाज है, और यहोवा ने तुझ को पृथ्वी भर के समस्त देशों के लोगों में से अपनी निज सम्पत्ति होने के लिये चुन लिया है। तू कोई घिनौनी वस्तु न खाना। व्य 14:2–3

उन दिनों में परमेश्वर ने खाने योग्य कुछ भोजनों को उस चिन्ह के रूप में चुना था, जिससे अन्यजाति के लोगों और परमेश्वर के पवित्र लोगों यानी इस्राएलियों में भेद किया जा सकता था।

फिर यहोवा ने मूसा और हारून से कहा, “इस्राएलियों से कहो : जितने पशु पृथ्वी पर हैं उन सभों में से तुम इन जीवधारियों का मांस खा सकते हो। पशुओं में से जितने चिरे वा फटे खुर के होते हैं और पागुर करते हैं उन्हें खा सकते हो… जितनों के पंख और चोंयेटे होते हैं उन्हें खा सकते हो। लैव 11:1–23

मूसा के युग में परमेश्वर के लोगों को वो शुद्ध पशु खाने की अनुमति दी गई थी जो चिरे या फटे खुर के होते हैं और पागुर करते हैं। लेकिन उन्हें वो अशुद्ध पशुओं को खाने की अनुमति नहीं थी जो पागुर तो करते हैं लेकिन फटे खुर के नहीं होते, या जो फटे खुर के होते हैं लेकिन पागुर नहीं करते।

नियम जिसने पशुओं को “शुद्ध पशुओं” और “अशुद्ध पशुओं” में विभाजित किया, वह इस्राएलियों के जीवन में बहुत गहराई से जमा हुआ और लंबे समय तक जारी रहकर यीशु के समय तक सौंपा गया।

4. ईसाइयों को दिया गया नियम

जैसे परमेश्वर ने अदन वाटिका के समय से हर युग में भोजन के विषय में उचित नियम दिया था, ठीक वैसे ही प्रेरितों के युग में भी परमेश्वर ने भोजन के विषय में नई वाचा की एक आज्ञा दी, जिसे ईसाइयों को मानना चाहिए।

पवित्र आत्मा को और हम को ठीक जान पड़ा कि इन आवश्यक बातों को छोड़, तुम पर और बोझ न डालें; कि तुम मूरतों पर बलि किए हुओं से और लहू से, और गला घोंटे हुओं के मांस से, और व्यभिचार से दूर रहो। इनसे दूर रहो तो तुम्हारा भला होगा। आगे शुभ। प्रे 15:28–29

इस तरह, प्रेरितों के युग में मूरतों पर बलि किए हुए भोजन, लहू और गला घोंटे हुओं के मांस को छोड़कर सब भोजन खाने के लिए दिया गया।

युग भोजन जो खा सकते हैं निषिद्ध भोजन बाइबल के वचन
अदन वाटिका में साग–सब्जियां और फल उत 1:29
जलप्रलय के बाद साग–सब्जियां और प्राणी उत 9:3
मूसा की व्यवस्था के समय से शुद्ध पशु(उदा. पशु जो पागुर करते हैं और फटे खुर के हैं।) अशुद्ध पशु(उदा. पशु जो पागुर नहीं करते या फटे खुर के नहीं हैं।) लैव 11
मसीह के बाद निषिद्ध भोजन के अलावा सभी भोजन मूरतों पर बलि किया हुआ भोजन, लहू और गला घोंटे हुओं का मांस प्रे 15:28–29

शुद्ध पशु और अशुद्ध पशु

वह भोजन का नियम जिसका 1,500 वर्ष के लंबे समय से पालन किया गया था, क्यों प्रेरितों के युग में बदल गया? इसे समझने के लिए हमें सबसे पहले पुराने नियम के युग में शुद्ध और अशुद्ध पशुओं के नियम के बारे में पूरी जानकारी होनी चाहिए। मूसा के युग से शुद्ध और अशुद्ध पशु एक मानक था जो अन्यजाति के लोगों और यहूदियों में भेद करने का काम करता था। वास्तव में अन्यजाति के लोगों को इसलिए अशुद्ध वर्णित किया जाता था क्योंकि वे अशुद्ध भोजन खाते थे। भोजन के कारण यहूदी अन्यजातियों के साथ बिल्कुल संबंध नहीं रखते थे।

हम पतरस की एक उपकथा के द्वारा इसकी पुष्टि कर सकते हैं।

कुरनेलियुस जो इतालियानी नामक पलटन का सूबेदार था, परमेश्वर का एक ईमानदार विश्वासी था और बहुत से अच्छे काम करता था। एक दिन उसने एक दर्शन देखा कि परमेश्वर का स्वर्गदूत उससे याफा में पतरस से मिलने को कहता है। तब उसने अपने सेवकों को याफा में भेजा।

उस बीच पतरस याफा में था और बेसुध हो गया, और उसने भी दर्शन देखा कि आकाश खुल गया और एक पात्र बड़ी चादर के समान चारों कोनों से लटकता हुआ पृथ्वी की ओर उतर रहा है, जिसमें पृथ्वी के सब प्रकार के चौपाए और वनपशु और रेंगनेवाले जन्तु और आकाश के पक्षी थे। उसे एक स्वर सुनाई दिया, “हे पतरस उठ, मार और खा।” परन्तु पतरस ने कहा, “प्रभु निश्चित रूप से नहीं, क्योंकि मैंने कभी कोई अपवित्र या अशुद्ध वस्तु नहीं खाई है।” फिर दूसरी बार उसे वह स्वर सुनाई दिया, “जो कुछ परमेश्वर ने शुद्ध ठहराया है, उसे तू अशुद्ध मत कह।” तीन बार ऐसा ही हुआ। फिर वह पात्र आकाश में वापस उठा लिया गया।

शुरू में पतरस ने उस दर्शन के अर्थ को नहीं समझा। ठीक उसी वक्त वे लोग जो कुरनेलियुस की ओर से भेजे गए थे, पतरस से मिलने आए। फिर अगले दिन पतरस और याफा के निवासी कुछ अन्य भाई उनके साथ कैसरिया में कुरनेलियुस के पास गए। बहुत से लोगों को इकट्ठा देखकर पतरस ने इस प्रकार कहा,

… तुम जानते हो कि अन्यजाति की संगति करना या उसके यहां जाना यहूदी के लिये अधर्म है, परन्तु परमेश्वर ने मुझे बताया है कि किसी मनुष्य को अपवित्र या अशुद्ध न कहूं। इसी लिये मैं जब बुलाया गया तो बिना कुछ कहे चला आया… प्रे 10:28–29

जब पतरस ने दर्शन में सभी प्रकार के पशुओं को चादर में लिपटे हुए देखा, तब वह उन्हें खाना नहीं चाहता था क्योंकि उसमें शुद्ध पशुओं के साथ ही अशुद्ध पशु भी थे।

उस समय आकाश से यह वचन सुनाई दिया, “जो कुछ परमेश्वर ने शुद्ध ठहराया है, उसे तू अशुद्ध मत कह।” पतरस ने “यहूदियों और अन्यजातियों” के बीच के संबंध के रूप में इस वचन की व्याख्या की। उसने महसूस किया कि परमेश्वर ने पहले से ही शारीरिक यहूदियों और अन्यजातियों के बीच के अंतर को मिटा दिया था, और उसे समझ में आया कि उस समय से परमेश्वर का सुसमाचार अन्यजातियों को भी प्रचार किया जाना चाहिए।

उसने गवाही दी कि भले ही वह जानता है कि शारीरिक रूप से एक यहूदी(शुद्ध पशु) का एक अन्यजाति(अशुद्ध पशु) से मिलना मूसा की व्यवस्था का उल्लंघन है, लेकिन चूंकि परमेश्वर ने अशुद्ध अन्यजातियों को शुद्ध किया है, इसलिए वह बिना कुछ कहे अन्यजातियों से मिलने आया।

यहूदी और अन्यजाति

परमेश्वर ने कहा, “हे पतरस उठ, मार और खा।” उनके यह कहने का मतलब है कि, “जाति में भेद किए बिना संसार की सभी जातियों को सुसमाचार का प्रचार करो।” और परमेश्वर ने चादर में लिपटे सभी प्रकार के पशुओं को आकाश में उठा लिया, जिससे यह दिखाया गया कि सभी लोग चाहे वे अन्यजाति हों या यहूदी, अगर सुसमाचार को ग्रहण करें तो स्वर्ग जा सकेंगे।

चूंकि यहूदियों और अन्यजातियों में कोई अंतर नहीं रहा, इसलिए शुद्ध और अशुद्ध पशुओं में भी, जो उनकी छाया थे, कोई अंतर नहीं रहा। इस तरह परमेश्वर ने अन्यजातियों को शुद्ध किया, जिसके द्वारा अन्यजातियों के रूप में दर्शाए गए अशुद्ध पशुओं को भी शुद्ध किया गया।

इस कारण स्मरण करो कि तुम जो शारीरिक रीति से अन्यजाति हो… तुम लोग उस समय मसीह से अलग, और इस्राएल की प्रजा के पद से अलग किए हुए, और प्रतिज्ञा की वाचाओं के भागी न थे, और आशाहीन और जगत में ईश्वररहित थे। पर अब मसीह यीशु में तुम जो पहले दूर थे, मसीह के लहू के द्वारा निकट हो गए हो। क्योंकि वही हमारा मेल है जिसने दोनों को एक कर लिया और अलग करनेवाली दीवार को जो बीच में थी ढा दिया… इसलिये तुम अब विदेशी और मुसाफिर नहीं रहे, परन्तु पवित्र लोगों के संगी स्वदेशी और परमेश्वर के घराने के हो गए। इफ 2:11–19

भोजन की व्यवस्था जो मूसा के समय से जारी थी, मसीह की व्यवस्था में बदल गई और इससे उसका मिशन समाप्त किया गया।

क्योंकि वे केवल खाने पीने की वस्तुओं और भांति–भांति की स्नान–विधि के आधार पर शारीरिक नियम हैं, जो सुधार के समय तक के लिये नियुक्त किए गए हैं। परन्तु जब मसीह आनेवाली अच्छी अच्छी वस्तुओं का महायाजक होकर आया… इब्र 9:10–11

फटा खुर और पागुर करना

जैसा कि लिखा है, “व्यवस्था जिसमें आनेवाली अच्छी वस्तुओं का प्रतिबिम्ब है”(इब्र 10:1), सुसमाचार के युग में भी शुद्ध और अशुद्ध पशुओं की वास्तविकता है। बाइबल में पशु मानवजाति को दर्शाते हैं। भविष्यवाणी के तौर पर, शुद्ध पशु जो फटे खुर के हैं और पागुर करते हैं, उन लोगों को दर्शाते हैं जो बचाए जाएंगे, और अशुद्ध पशु जो इस शर्त को पूरा नहीं करते, उन लोगों को दर्शाते हैं जो बचाए नहीं जाएंगे।

सच्चा चर्च जो मसीह पर विश्वास करता है, उसे अपने पास फटा खुर रखना चाहिए और पागुर करना चाहिए। पागुर करने का मतलब है, परमेश्वर की आज्ञाओं को मानना, और फटा खुर रखने का मतलब है, यीशु पर विश्वास रखना। दूसरे शब्दों में सच्चे ईसाइयों को परमेश्वर की आज्ञाएं माननी चाहिए और मसीह पर संपूर्ण विश्वास रखना चाहिए।

फिर मैं ने दृष्टि की, और देखो, वह मेम्ना सिय्योन पहाड़ पर खड़ा है, और उसके साथ एक लाख चौवालीस हजार जन हैं… “जो कोई उस पशु और उसकी मूर्ति की पूजा करे, और अपने माथे या अपने हाथ पर उसकी छाप ले… जो उस पशु और उसकी मूर्ति की पूजा करते हैं, और जो उसके नाम ही छाप लेते हैं, उनको रात दिन चैन न मिलेगा।” पवित्र लोगों का धीरज इसी में है, जो परमेश्वर की आज्ञाओं को मानते और यीशु पर विश्वास रखते हैं। प्रक 14:1–12

1,44,000 जो बचाए जाएंगे, परमेश्वर की आज्ञाओं को मानते और यीशु पर विश्वास रखते हैं; वे दो शर्तों को पूरा करते हैं। लेकिन लोग जो पशु(शैतान का समूह) और उसकी मूर्ति की पूजा करते हैं, दो शर्तों में से सिर्फ एक पूरा करते हैं या कुछ भी पूरा नहीं करते(प्रक 13:4; 12:9)। वे परमेश्वर की दृष्टि में अशुद्ध कार्य करते हैं। दूसरे शब्दों में वे पशु की पूजा करते हैं और पशु के द्वारा बनाई गई आज्ञाओं को मानकर उसकी छाप प्राप्त करते हैं, इसलिए वे अनन्त दण्ड से पीड़ित होंगे।

लोग जो मूसा की व्यवस्था पर हठ करते हुए मसीह की व्यवस्था को तुच्छ मानते हैं

पतरस सहित प्रेरितों ने यरूशलेम में महासभा आयोजित की और वहां उन्होंने सिर्फ यहूदियों को ही नहीं, लेकिन अन्यजातियों को भी सुसमाचार का प्रचार करने के मामले पर चर्चा की और मसीह के आदेश की घोषणा की।

पवित्र आत्मा को और हम को ठीक जान पड़ा कि इन आवश्यक बातों को छोड़, तुम पर और बोझ न डालें; कि तुम मूरतों पर बलि किए हुओं से और लहू से, और गला घोंटे हुओं के मांस से, और व्यभिचार से दूर रहो… प्रे 15:28–29

यरूशलेम में आयोजित महासभा में पवित्र आत्मा उपस्थित था और प्रमाणित किया गया कि यह आदेश मसीह की आज्ञा है। तो कौन इसका पालन नहीं करेगा? फिर भी अब भी ऐसे लोग हैं जो अदन वाटिका में दिए नियम का पालन करके शाकाहार पर जोर देते हैं, या कुछ लोग दावा करते हैं कि हमें मूसा की व्यवस्था के अनुसार शुद्ध और अशुद्ध पशुओं के बीच अंतर करना चाहिए। लेकिन चाहे कोई भी युग हो, यदि लोग उस व्यवस्था का पालन नहीं करेंगे जो परमेश्वर उस युग में देते हैं, तो वे बचाए नहीं जा सकते।

प्रेरितों के युग में भी कुछ ऐसे लोग थे जो पवित्र आत्मा की शिक्षाओं के विरुद्ध चलकर दावा करते थे कि उन्हें मूसा की व्यवस्था के अनुसार कुछ भोजनों से दूर रहना चाहिए। जब उन्होंने सब्त का दिन मनाया, तब उन्होंने मसीह की व्यवस्था के बदले मूसा की व्यवस्था के अनुसार उसे मनाने का आग्रह किया और मेमनों का बलिदान करके फसह मनाने पर जोर दिया।

लेकिन सब्त का दिन जिसे यीशु ने मनाने का उदाहरण दिखाया, वह आत्मा और सच्चाई से परमेश्वर की आराधना करने का दिन था, और फसह का पर्व जिसे यीशु ने मनाने का उदाहरण दिखाया, वह मेमनों का बलिदान करने के बदले उस रोटी और दाखमधु के साथ मनाया जाने वाला पर्व था, जो यीशु के मांस और लहू को दर्शाते हैं। साथ ही यीशु ने शारीरिक खतने के बदले हमें उस बपतिस्मा की विधि सिखाई जो मसीह का खतना है। शुद्ध और अशुद्ध पशुओं को विभाजित करने के नियम के बदले, यीशु ने हमें भोजन के बारे में नई आज्ञा दी, जिसमें हम मूरतों पर बलि किए हुए भोजन, लहू और गला घोंटे हुओं के मांस के अलावा कुछ भी खा सकते हैं।

इस तरह, व्यवस्था जो यीशु की शिक्षा के अनुसार प्रथम चर्च के समय में मानी गई, उसे मसीह की व्यवस्था कहा जाता है। प्रेरित पौलुस ने कहा कि वह (मूसा की) व्यवस्था के अधीन नहीं है, और फिर उसने कहा कि वह मसीह की व्यवस्था के अधीन है।

… जो लोग व्यवस्था के आधीन हैं उनके लिये मैं व्यवस्था के आधीन न होने पर भी व्यवस्था के अधीन बना… व्यवस्थाहीनों के लिये मैं–जो परमेश्वर की व्यवस्था से हीन नहीं परन्तु मसीह की व्यवस्था के आधीन हूं– व्यवस्थाहीन सा बना कि व्यवस्थाहीनों को खींच लाऊं। 1कुर 9:20–21

यदि हम प्रथम चर्च के दिनों की सामाजिक स्थिति पर विचार करें, तो उन दिनों के लोगों के लिए मसीह की व्यवस्था एकदम नई चीज थी। यहूदी धर्म से ईसाई धर्म में धर्म परिवर्तित किए गए लोगों में से ऐसे बहुत से लोग थे जिनके पास यहूदी धर्म की विचारधारा और रीति–रिवाज थे। वे कभी–कभी दावा करते थे कि उन्हें मूसा की व्यवस्था के अनुसार मेमनों का बलिदान करके फसह का पर्व मनाना चाहिए, या मूसा की व्यवस्था के अनुसार उन्हें अशुद्ध पशुओं से दूर रहना चाहिए। इसलिए प्रेरितों को इस प्रकार के लोगों से परमेश्वर की भेड़ों की रक्षा करनी चाहिए थी। इसी कारण प्रेरित पौलुस ने कुलुस्से के चर्च को इस प्रकार पत्र लिखकर भेजा:

और विधियों का वह लेख जो हमारे नाम पर और हमारे विरोध में था मिटा डाला… इसलिये खाने–पीने या पर्व या नए चान्द, या सब्त के विषय में तुम्हारा कोई फैसला न करे। क्योंकि ये सब आनेवाली बातों की छाया हैं, पर मूल वस्तुएं मसीह की हैं। कुल 2:14–17

यीशु ने भोजन का विषय जैसी यहूदियों और अन्यजातियों के बीच की दीवार को ढा दिया(इफ 2:11–19)। फिर भी यदि एक व्यक्ति उस दीवार को जिसे यीशु ने ढा दिया, फिर से खड़ा करे, तो कैसे हम उसे एक ईसाई बुला सकते हैं? “ईसाई” का मतलब वह व्यक्ति है जो पूरे विश्वास से मसीह की शिक्षा का पालन करता है। यीशु के द्वारा गिराई गई दीवार को फिर से खड़ा करना यीशु के बलिदान को व्यर्थ करने और मसीह के विरुद्ध चलने जैसा है। इसी कारण बाइबल भविष्यवाणी करती है कि लोग जो मसीह की शिक्षा के विरुद्ध भोजन की कुछ वस्तुओं से परे रहने की आज्ञा देते हैं, वे दुष्टात्माओं की शिक्षाओं का पालन करने वाले हैं(1तीम 4:1–3)। इसलिए हमें प्रथम चर्च की शिक्षाओं का पालन करना चाहिए जिनकी गवाही पवित्र आत्मा और प्रेरितों ने दी(प्रे 15:28–29)।

भोजन जो हम खा सकते हैं, और भोजन जो हमें नहीं खाना है

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