WATV.org is provided in English. Would you like to change to English?

​अदृश्य दुनिया और सच्चा विश्वास​

2183 देखे जाने की संख्या

विश्वास उद्धार के लिए आवश्यक है। बाइबल स्पष्ट रूप से उल्लेख करती है कि विश्वास के बिना लोग उद्धार नहीं पा सकते। यह इसलिए क्योंकि केवल विश्वास रखनेवाले लोग हमारे उद्धार के लिए स्थापित हुई परमेश्वर की आज्ञाओं और नियमों का पालन कर सकते हैं।

परमेश्वर ने दृश्य और अदृश्य दुनिया की सृष्टि की। विश्वास की दुनिया भी अदृश्य है, इसलिए सामान्य समय में यह जानने का कोई तरीका नहीं कि हमारा विश्वास बड़ा है या छोटा। तब, हमारा विश्वास कब और कैसे प्रकट किया जाता है, और हमें किस प्रकार का विश्वास रखना चाहिए? आइए हम बाइबल की शिक्षाओं के द्वारा इसकी पुष्टि करें।

अपने आप को परखो कि विश्वास में हो कि नहीं

सभी ने अपने स्कूल के दिनों में, यह जानने के लिए कि कुछ पदार्थ अम्लीय है या क्षारीय, परीक्षण किया होगा। हम बता नहीं सकते कि कुछ घोल अम्लीय है यह क्षारीय। लेकिन, जब उस घोल में लिटमस पेपर रखा जाता है, तो उसका रंग बदल जाता है जिससे हम यह जान सकते हैं कि वह अम्लीय है यह क्षारीय।

विश्वास अदृश्य है। तब, परमेश्वर हमारे विश्वास की जांच कैसे करते हैं? जैसे लिटमस पेपर को घोल में डाला जाता है, हमें भी परीक्षण की स्थिति में रखा जाएगा। ऐसी निश्चित परिस्थिति में, प्रत्येक व्यक्ति के विश्वास की मात्रा या आकार दिखाया जाता है। जो लोग हमेशा यह विश्वास करते हैं कि परमेश्वर हमेशा उनके साथ हैं वे किसी भी परिस्थितियों में नहीं डगमगाते। दूसरी तरफ, अपने आसपास के लोगों का अनुसरण करनेवालों का विश्वास किसी न किसी दिन गायब हो जाएगा।

अपने आप को परखो कि विश्वास में हो कि नहीं। अपने आप को जांचो। क्या तुम अपने विषय में यह नहीं जानते कि यीशु मसीह तुम में है? नहीं तो तुम जांच में निकम्मे निकले हो। पर मेरी आशा है कि तुम जान लोगे कि हम निकम्मे नहीं। हम अपने परमेश्वर से यह प्रार्थना करते हैं कि तुम कोई बुराई न करो… 2कुर 13:5-7

बाइबल हमें अपने आप को हर दिन यह देखने के लिए परखने की सलाह देती है कि हम विश्वास में हैं या नहीं। यदि परमेश्वर हमें निकम्मा ठहराएं क्योंकि हमारे पास विश्वास नहीं है, तो हम उद्धार से अलग किए जाएंगे। हमें हमेशा अपने आप को यह देखने के लिए परखना चाहिए कि हम अपने विश्वास को अमल में लाए हैं, और यह साबित करना चाहिए कि हम में विश्वास है। बाइबल हमें इस तथ्य के लिए जागृत करती है कि जो कुछ भी बिना विश्वास के किया जाता है वह परमेश्वर की दृष्टि में एक पाप है(रो 14:23)।

यदि हमारे यह विश्वास करने पर भी कि हम में परमेश्वर निवास करते हैं, विभिन्न परिस्थितियों में हमारा विश्वास बदलता या गायब हो जाता है, तो यह दिखाता है कि हम में परमेश्वर निवास नहीं करते। चाहे कोई भी परिस्थिति क्यों न हो, हमें हमेशा हमारे साथ बनाई गई परमेश्वर की वाचा के मार्ग के अनुसार चलना चाहिए।

परिस्थिति जिसमें विश्वास प्रकट किया जाता है

सर्दी के मौसम में, तालाब जम जाते हैं। इन जमे हुए तालाब के ऊपर पत्थर, लोहे के छोटे-छोटे टुकड़े, लकड़ी के टुकड़े और पत्ते होते हैं। इस हालात में, हम यह नहीं बता सकते कि उनमें से कौन सी वस्तु तैरती है और कौन सी वस्तु पानी में डूब जाती है। लेकिन, वसंत ऋतु आने पर जब बर्फ पिघल जाती है, तब उनकी सहज विशेषताएं प्रकट हो जाती हैं। पत्थर और लोहे के टुकड़े पानी में डूब जाते हैं जबकि पत्ते और लकड़ी के टुकड़े पानी के ऊपर तैरते हैं।

ऐसी परिस्थितियां आने पर अदृश्य दुनिया की चीजें अपनी वास्तविक पहचान को प्रकट करती हैं। इसलिए यीशु ने हमें निम्नलिखित शिक्षा दी।

“इसलिये जो कोई मेरी ये बातें सुनकर उन्हें मानता है, वह उस बुद्धिमान मनुष्य के समान ठहरेगा जिसने अपना घर चट्टान पर बनाया। और मेंह बरसा, और बाढ़ें आईं, और आन्धियां चलीं, और उस घर से टकराईं, फिर भी वह नहीं गिरा, क्योंकि उसकी नींव चट्टान पर डाली गई थी। परन्तु जो कोई मेरी ये बातें सुनता है और उन पर नहीं चलता, वह उस निर्बुद्धि मनुष्य के समान ठहरेगा जिसने अपना घर बालू पर बनाया। और मेंह बरसा, और बाढ़ें आईं, और आन्धियां चलीं, और उस घर से टकराईं और वह गिरकर सत्यानाश हो गया।” मत 7:24-27

सामान्य समय में, बालू पर बना घर और चट्टान पर बना घर दोनों ही अच्छी तरह से निर्मित दिखाई देते हैं। हम अपने विश्वास के घर बनाते हैं, और जब तक बाहरी परिस्थिति पैदा नहीं होती तब तक हम नहीं जानते कि किसके घर ठीक तरह से बने हैं। हालांकि जब मेंह बरसता है, और बाढ़ें आती हैं, और आन्धियां चलती हैं, और हर तरह की अकल्पनीय स्थितियां पैदा होती हैं, तब हमें पता चलता है कि उस विश्वास का घर चट्टान की नींव पर बनाया गया है या यह वह घर है जो नष्ट होगा।

परमेश्वर हमें ऐसी विभिन्न परिस्थितियां देते हैं जहां हमारी सारी अदृश्य चीजें प्रकट की जा सकती हैं। इसलिए परमेश्वर ने हम से यह कहा है कि हम हमेशा यह जानने के लिए अपने आपको परखना चाहिए कि हम विश्वास में हैं या नहीं।

हमेशा यह देखने के लिए खुद की जांच कीजिए कि कौन आपकी मदद कर रहे हैं, कौन आपका मार्गदर्शन कर रहे हैं और क्या आप उस विश्वास में दृढ़ हैं जो पिता और माता द्वारा प्रदान किया गया है। जब तक हम परमेश्वर पर सही विश्वास न रखें तब तक हमारे लिए विश्वास का जीवन जीने का कोई कारण नहीं होगा। हम केवल आराधनाओं में उपस्थित होने और धार्मिक समुदाय में भाग लेने के लिए चर्च नहीं आते। हमारे हर सब्द के दिन में आराधना मनाने और परमेश्वर के वचन का अध्ययन करने का मूल कारण विश्वास रखकर परमेश्वर के वचनों का पालन करना है, ताकि हम स्वर्ग के अनन्त राज्य में प्रवेश कर सकें।

परमेश्वर ने जंगल में इस्राएलियों के विश्वास की परीक्षा ली

परमेश्वर हमें ऐसी परिस्थितियां देते हैं जहां हम अदृश्य दुनिया को देख सकते हैं। इस्राएलियों की 40 वर्षों की जंगल की यात्रा प्रतिनिधि उदाहरण है। इस्राएलियों ने जो 400 वर्षों तक मिस्र में दास के रूप में रहे थे, दस विपत्तियां भेजने वाले परमेश्वर की सामर्थ्य देखी और बड़े अधिकारवाले मिस्र के राजा फिरौन को फसह की सामर्थ्य के सामने घुटने टेकते देखा। इसके अतिरिक्त, उन्होंने परमेश्वर की विस्मयकारी सामर्थ्य का भी अनुभव किया था जिन्होंने लाल समुद्र को विभाजित करके उन्हें सूखी भूमि पर चलकर उस समुद्र को पार करने दिया और उनका पीछे करने वाली मिस्री सेना को पूरी तरह नष्ट किया। उन्होंने स्वयं निर्विवाद सामर्थ्य का अनुभव करने के बाद, परमेश्वर के प्रति विश्वास के साथ जंगल में प्रवेश किया, जिन्होंने युग और इतिहास का संचालन किया।

लेकिन, वह पूरी तरह बंजर भूमि था। जंगल में, न तो उन्हें फिरौन द्वारा उत्पीड़ित किया गया और न ही उन्हें परिश्रम करवानेवालों के निरीक्षण में कठोर परिश्रम करना पड़ा, लेकिन वहां खाने-पीने के लिए कुछ भी नहीं था। जंगल में जहां जीने के लिए आवश्यक खाना और पानी नहीं है, उनका वह खाना खत्म हो गया जो वे अपने साथ लाए थे और उनकी यात्रा काफी लंबी होने लगी। मिस्री से बाहर निकलते समय उन्हें लगा कि कनान तक पहुंचने में उन्हें लगभग एक महीना लगेगा। लेकिन, जैसे उन्होंने अलग परिस्थितियों का सामना किया, उनके विचार और रवैए पूरी तरह बदल गए।

उन्होंने अनेक बार परमेश्वर की सामर्थ्य देखकर विश्वास रखने का दावा किया। लेकिन उस समय से, अपने आसपास के लोगों के कुड़कड़ाने और शिकायत करने पर वे भी एक साथ ऐसा ही करने लगे। अनुकूल परिस्थिति में, ऐसा लगा कि उनमें विश्वास है, लेकिन जंगल के वातावरण में, वे परमेश्वर की शक्ति, अधिकार और प्रतिज्ञाओं को भूलकर अपना विश्वास खो बैठे।

हमें इस्राएलियों की 40 वर्षों की जंगल की यात्रा से इन सबकों का स्मरण रखना चाहिए। उनकी 40 वर्षों की जंगल की यात्रा केवल 3,500 वर्ष पहले घटी ऐतिहासिक घटना नहीं, लेकिन हमें विश्वास का वह मार्ग दिखाने वाला प्रतिरूप और प्रतिबिंब है जिस पर हमें चलना चाहिए। आइए हम बाइबल से अपने विश्वास की तुलना उनके विश्वास के साथ करें कि हम उनसे अलग हैं या नहीं।

“जो जो आज्ञा मैं आज तुझे सुनाता हूं उन सभों पर चलने की चौकसी करना, इसलिये कि तुम जीवित रहो और बढ़ते रहो, और जिस देश के विषय में यहोवा ने तुम्हारे पूर्वजों से शपथ खाई है उसमें जाकर उसके अधिकारी हो जाओ। और स्मरण रख कि तेरा परमेश्वर यहोवा उन चालीस वर्षों में तुझे सारे जंगल के मार्ग में से इसलिये ले आया है, कि वह तुझे नम्र बनाए, और तेरी परीक्षा करके यह जान ले कि तेरे मन में क्या क्या है, और कि तू उसकी आज्ञाओं का पालन करेगा या नहीं। उसने तुझ को नम्र बनाया, और भूखा भी होने दिया, फिर वह मन्ना, जिसे न तू और न तेरे पुरखा ही जानते थे, वही तुझ को खिलाया; इसलिये कि वह तुझ को सिखाए कि मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं जीवित रहता, परन्तु जो जो वचन यहोवा के मुंह से निकलते हैं उन ही से वह जीवित रहता है। इन चालीस वर्षों में तेरे वस्त्र पुराने न हुए, और तेरे तन से भी नहीं गिरे, और न तेरे पांव फूले। फिर अपने मन में यह तो विचार कर, कि जैसा कोई अपने बेटे को ताड़ना देता है वैसे ही तेरा परमेश्वर यहोवा तुझ को ताड़ना देता है। इसलिये अपने परमेश्वर यहोवा की आज्ञाओं का पालन करते हुए उसके मार्गों पर चलना, और उसका भय मानते रहना। क्योंकि तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे एक उत्तम देश में लिये जा रहा है… और तू पेट भर खाएगा, और उस उत्तम देश के कारण जो तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे देगा उसे धन्य मानेगा।” व्य 8:1-10

व्यवस्थाविवरण अध्याय 8 के वचन केवल इस्राएलियों को नहीं दिए गए हैं। जैसे परमेश्वर ने कहा, “जो मैं तुम से कहता हूं, वही सब से कहता हूं”(मर 13:37), वह इस्राएलियों के मामले से दुनिया भर के सभी लोगों को अपनी इच्छा जानने देते हैं।

इस्राएलियों की 40 वर्षों की जंगल की यात्रा के दौरान, परमेश्वर ने विभिन्न परिस्थितियों में उनकी जांच की। उन्होंने उन्हें भूखा रहने दिया, उनका अन्य जातियों के विरुद्ध युद्ध कराया, और उन्हें मूर्तिपूजा करने के प्रलोभन में पड़ने दिया। यह इसलिए था क्योंकि वह उनकी परीक्षा लेकर और उनके विश्वास को परखकर अंत में उन्हें दूध और मधु की धाराएं बहने वाले कनान देश में ले जाना चाहते थे।

लेकिन, जब कभी इस्राएली कठिन परिस्थिति में होते थे वे कुड़कुड़ाने लगते थे, उन्होंने केवल अनुकूल परिस्थितियों में परमेश्वर की प्रशंसा की। परमेश्वर केवल उनकी कही हुई बातें सुन रहे थे। परमेश्वर ने पुष्टि की कि उनके मन में क्या है अर्थात् परमेश्वर के प्रति उनकी मानसिकता कैसी है।

जब उन्होंने बाहरी वातावरण का सामना किया, तो यह तुरंत प्रकट हुआ कि उनके विश्वास का घर बालू पर बना था या चट्टान पर। परमेश्वर ने उन्हें विश्वास रखनेवालों के रूप में स्वीकार नहीं किया। इसलिए बाइबल कहती है कि वे अविश्वास के कारण कनान में प्रवेश न कर सके(इब्र 3:7-19)।

यहोशू और कालेब का विश्वास जो किसी भी परिस्थिति में नहीं डगमगाए

केवल विश्वास रखनेवाले लोग कनान में प्रवेश करने के योग्य हैं। निर्गमन के बाद, मूसा ने परमेश्वर की आज्ञा का पालन करके कनान का भेद लेने के लिए बारह भेदियों को भेजा। वे इस्राएल के प्रत्येक गोत्र के अगुवे थे। जब वे देश का भेद लेने के बाद वापस आए तो उनमें से दस परिस्थिति के तर्क के जाल में फंस गए। उन्होंने यह कहकर कनान की निन्दा की कि उनके नगर गढ़वाले हैं और वहां के लोग बड़े डील-डौल के हैं, इसलिए वे उन लोगों के साथ मुकाबला नहीं कर सकेंगे। परमेश्वर ने उनके विश्वास को परखने के लिए ऐसी स्थिति बनाई थी, लेकिन जब इस्राएलियों ने भेदियों से नकारात्मक समाचार सुनी तो वे अपना विश्वास खो देकर निराशा में डूब गए और मूसा और परमेश्वर की विरुद्ध शिकायत करने लगे।

केवल यहोशू और कालेब ने ही लोगों को शांत करने की कोशिश करते हुए कहा, “उनका देवता उनके ऊपर से हट गया है, लेकिन हमारे सर्वशक्तिमान परमेश्वर हमारे साथ हैं। वे हमारी रोटी ठहरेंगे।” बीस वर्ष के या उससे अधिक आयु के लोगों में से जिन्होंने मिस्र से निकलते समय परमेश्वर की सामर्थ्य और चमत्कार देखे थे, यहोशू और कालेब को छोड़ किसी को भी कनान में प्रवेश करने की अनुमति नहीं मिली।

फिर यहोवा ने मूसा और हारून से कहा, “यह बुरी मण्डली मुझ पर बुड़बुड़ाती रहती है, उसको मैं कब तक सहता रहूं? इस्राएली जो मुझ पर बुड़बुड़ाते रहते हैं, उनका यह बुड़बुड़ाना मैं ने सुना है। इसलिये उनसे कह कि यहोवा की यह वाणी है कि मेरे जीवन की शपथ जो बातें तुम ने मेरे सुनते कही हैं, नि:सन्देह मैं उसी के अनुसार तुम्हारे साथ व्यवहार करूंगा। तुम्हारे शव इसी जंगल में पड़े रहेंगे; और तुम सब में से बीस वर्ष के या उससे अधिक आयु के जितने गिने गए थे, और मुझ पर बुड़बुड़ाते थे, उनमें से यपुन्ने के पुत्र कालिब और नून के पुत्र यहोशू को छोड़ कोई भी उस देश में न जाने पाएगा, जिसके विषय मैं ने शपथ खाई है कि तुम को उसमें बसाऊंगा। गिन 14:26-30

परिस्थिति के तर्क की जाल में पड़ना परमेश्वर को गंवाना है। लेकिन यहोशू और कालेब ने परमेश्वर को कभी नहीं गंवाया, इसके बदले वे हमेशा उनके साथ चले। उन्हें विश्वास था कि परमेश्वर जिन्होंने पूरा ब्रह्मांड और उसमें सब कुछ बनाया रेत के कण के समान छोटी पृथ्वी की बातों को अवश्य पूरा करेंगे। चूंकि उन्होंने परमेश्वर पर संपूर्ण विश्वास रखा, इसलिए उन्होंने परमेश्वर की वह प्रतिज्ञा पाई जिससे वे कनान में प्रवेश कर सके।

आज, हम विश्वास के जंगल में चल रहे हैं, और परमेश्वर यह देखने के लिए हमारी जांच करते हैं कि क्या हम दूध और मधु की धाराएं बहने वाले आत्मिक कनान में प्रवेश करने के योग्य हैं या नहीं। जिन परिस्थितियों में परमेश्वर हमें नम्र बनाते और हमारी परीक्षा लेते हैं, हमारा विश्वास प्रकट किया जाता है कि उनके विश्वास का घर बालू पर बना था या चट्टान पर। और अंत में परमेश्वर हमें उस शानदार दुनिया की ओर ले जाते हैं जहां जाने पर हम खुद ब खुद परमेश्वर की प्रशंसा करेंगे। आइए हम सिय्योन के लोगों के रूप में इस्राएलियों की जंगल की यात्रा के सबक को कभी न भूलें और परमेश्वर का पालन करें जो शांति से हमसे प्रेम करते हैं और हमारी अगुवाई करते हैं, ताकि हम अनंत स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकें।

विश्वास बिना परमेश्वर को प्रसन्न करना अनहोना है

जब तक हम अनन्त स्वर्गीय घर वापस नहीं जाते, तब तक हर प्रकार की परिस्थितियों में हमारे विश्वास को परखा जाएगा। जब कभी ऐसा होता है, आइए हम ठीक यहोशू और कालेब के समान परमेश्वर के बारे में सोचें। 40 वर्षों की जंगल की यात्रा को पीछे मुड़कर देखने से हम जान सकते हैं कि हम किस प्रकार का विश्वास रखने से स्वर्गीय कनान में प्रवेश कर सकते हैं।

अब विश्वास आशा की हुई वस्तुओं का निश्चय, और अनदेखी वस्तुओं का प्रमाण है। क्योंकि इसी के विषय में प्राचीनों की अच्छी गवाही दी गई। विश्वास ही से हम जान जाते हैं कि सारी सृष्टि की रचना परमेश्वर के वचन के द्वारा हुई है। पर यह नहीं कि जो कुछ देखने में आता है, वह देखी हुई वस्तुओं से बना हो। विश्वास ही से हाबिल ने कैन से उत्तम बलिदान परमेश्वर के लिये चढ़ाया, और उसी के द्वारा उसके धर्मी होने की गवाही भी दी गई, क्योंकि परमेश्वर ने उसकी भेंटों के विषय में गवाही दी; और उसी के द्वारा वह मरने पर भी अब तक बातें करता है। विश्वास ही से हनोक उठा लिया गया कि मृत्यु को न देखे, और उसका पता नहीं मिला क्योंकि परमेश्वर ने उसे उठा लिया था, और उसके उठाए जाने से पहले उसकी यह गवाही दी गई थी कि उसने परमेश्वर को प्रसन्न किया है। और विश्वास बिना उसे प्रसन्न करना अनहोना है; क्योंकि परमेश्वर के पास आनेवाले को विश्वास करना चाहिए कि वह है, और अपने खोजनेवालों को प्रतिफल देता है। इब्र 11:1-6

बाइबल कहती है कि विश्वास बिना परमेश्वर को प्रसन्न करना अनहोना है। जब यीशु ने अपने पास आए हुए अंधों और रोगियों को चंगा किया, वह यह कहते हुए उनके विश्वास से प्रसन्न हुए, “तेरे विश्वास ने तुझे चंगा कर दिया है”(मत 9:20-30)।

क्या होगा यदि हम हर दिन परमेश्वर के वचन का अध्ययन करते, उत्सुकता से प्रार्थना करते और उनके नियमों पर चलते हुए भी परिस्थिति के तर्क की जाल में फंसकर परमेश्वर के बारे में सबकुछ भूल जाते हैं? परमेश्वर बहुत व्याकुल हो जाएंगे, है न? हमें अपनी वर्तमान स्थिति के कारण अपने स्वर्गीय घर को नहीं खोना चाहिए और न ही इसे अनदेखा करना चाहिए। किसी भी परिस्थिति में, हमें इस बात पर दृढ़ता से विश्वास करते हुए कि परमेश्वर हमेशा हमारे साथ रहते और हमारी मदद करते हैं, स्वर्ग की ओर आगे बढ़ना चाहिए।

3,500 वर्ष पहले, परमेश्वर ने मिस्र पर विपत्तियां भेजीं और वहां रह रहे इस्राएलियों के पास से उन विपत्तियों को पार होने दिया। परमेश्वर जो सिय्योन स्थापित करके वहां हमारे साथ निवास करते हैं, हमारे पिता और माता हैं, और वे स्वर्ग के राज्य की ओर हमारा मार्गदर्शन करते हैं। मैं ईमानदारी से आप सभी परमेश्वर की संतानों से निवेदन करता हूं कि इस विश्वास को अंत तक बनाए रखें और उन सभी लोगों को परमेश्वर की सच्चा चैन और शांति पहुंचाएं जो विभिन्न परिस्थितियां आने पर भय से कांप रहे हैं।