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19 नवम्बर, 2019

यदि आपकी संतान किशोरावस्था में है

— आप अपनी संतान जो किशोरावस्था में है, के साथ कैसे मिलकर रह सकते हैं?

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जब एक छोटा बच्चा अपनी मां से अलग हो जाता है, तो वह जोर से रोता है मानो दुनिया समाप्त हो गया हो, लेकिन जब मां वापस आती है, तो वह फिर से मुस्कुराता है; चाहे उसकी मां कुछ असंभव बात कहती है, वह उसकी सब बातों पर विश्वास करता है। लेकिन, जब बच्चा बड़ा होता है और स्कूल जाता है, तो वह अपनी मां से बढ़कर अपने दोस्तों के साथ रहना पसंद करता है, और अपनी मां से कुछ बातें छिपाना शुरू करता है। उससे बढ़कर, वह बहुत जल्दी चिढ़ जाता है, अपने बाहरी रूप पर ज्यादा ध्यान देता है, और यहां तक कि अपना कमरा भी बंद रखता है। यह सब तब होता है जब वह किशोरावस्था पर पहुंचता है।

किशोरावस्था एक बढ़ते दर्द के समान है जिससे एक बच्चा एक वयस्क बनने की प्रक्रिया में गुजरता है। माता-पिता भी उसके साथ उस दर्द को सहन करते हैं। बच्चा अपने शारीरिक और मानसिक बदलाव को लेकर परेशान महसूस करता है, और उसके माता-पिता अपनी संतान के बेकाबू व्यवहार के लिए चिंतित और व्याकुल हो जाते हैं।

लेकिन, इसका अर्थ यह नहीं कि हर कोई अपनी किशोरावस्था में अचानक से बिना किसी कारण के अपने माता-पिता के विरोध में अक्खड़ ढंग से पेश आता है। चूंकि किशोरावस्था में वे अपने प्रति दूसरों के दृष्टिकोण को लेकर संवेदनशील होते हैं, और उनके पास अपने माता-पिता से मुक्त होने की प्रबल इच्छा होती है, इसलिए वे उस अधिकारपूर्ण रवैये के प्रति, जो उन्हें अधीन होने को कहता है, विरोधी भावना व्यक्त कर सकते हैं। यदि माता-पिता उनके उस व्यवहार को केवल “विद्रोह” समझें, तो माता–पिता और उनके बच्चों के रिश्ते में अलगाव हो सकता है। एक बच्चा चाहे कितना भी ज्यादा अपने माता-पिता को खुद से दूर करना चाहता है, लेकिन वास्तव में उसे अपने माता–पिता की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। इसी कारण से माता-पिता को उसके साथ रहते हुए उसे समर्थन देना चाहिए।

किशोरों के मस्तिष्क निर्माण की प्रक्रिया में हैं: उन्हें अच्छे अनुभव करने दें

किशोरावस्था के दौरान, माध्यमिक यौन विशेषताओं का निर्माण शुरू हो जाता है और मस्तिष्क का पुनगठन किया जाता है। जब वह 12 से 17 की उम्र में पहुंचता है, तो उसके मस्तिष्क के फ्रंटल लोब में न्यूरॉन्स का नाटकीय विकास होता है; ऐसा लगता है कि उसके मस्तिष्क में एक बड़ा निर्माण होता है जिससे उसमें एक वयस्क के मस्तिष्क की तरह सोचने और समझने की क्षमता हो।

दूसरे शब्दों में, किशोर के मस्तिष्क में ऐसा होता है कि एक छोटे से कमरे को तोड़कर वहां तीन कमरों वाला मकान बनाया जाए। इस प्रक्रिया में, उसका फ्रंटल लोब बहुत महत्व रखता है। फ्रंटल लोब आवेग को दबाता है, क्रोध को शान्त करता है, और याददाश्त, विवेकशील विचारों, निर्णयों इत्यादि को नियंत्रित करता है, जबकि अमीगाडलोइड नाभिक डर, गुस्सा और दुख जैसे भावनात्मक प्रतिक्रियाओं का प्रभारी होता है। किशोरावस्था में फ्रंटल लोब के मुकाबले अमीगाडलोइड नाभिक तेजी से प्रतिक्रिया करता है, क्योंकि अमीगाडलोइड नाभिक छोटी उम्र में पहले से ही विकसित हो चुका है जबकि फ्रंटल लोब अभी भी अस्थिर स्थिति में होता है। इसी कारण से बच्चा एक छोटी सी बात के लिए भी विद्रोही या भावात्मकता से पेश आता है।

इस समयावधि में, गेम खेलने की लत या स्मार्टफोन का अत्यधिक उपयोग उसके फ्रंटल लोब के विकास में एक बड़ी बाधा बनता है। किशोरों में स्मार्टफोन का उपयोग और गेम की लत एक गंभीर सामाजिक समस्या बन गई है। उन्हें इस वजह से उनकी लत पड़ जाती है, क्योंकि उस आभासी दुनिया के द्वारा वे स्कूल के अपने तनाव से मुक्ति पा सकते हैं, अपनी जिज्ञासा को संतुष्ट कर सकते हैं, और उन विचारों और कार्यों का आनंद ले सकते हैं जिन्हें वे वास्तविकता में नहीं ले सकते।

विडम्बना यह है कि गूगल और याहू जैसी विश्व–प्रसिद्ध आईटी कंपनियों में काम करने वाले माता-पिता अपने बच्चों को ऐसे स्कूलों में भेजते हैं जो उन्हें कंप्यूटर और स्मार्टफोन का उपयोग करने से सख्ती से रोकते हैं। उसके बदले, वे पुस्तकें पढ़ने, प्रक्रृति को महसूस करने, और विभिन्न अनुभव करने के लिए बच्चों की अगुवाई करते हैं। वे बच्चों के 16 साल के होने के बाद डिजिटल शिक्षा प्रदान करना शुरू करते हैं। क्योंकि उन्हें विश्वास है कि जब छात्र पुस्तकें पढ़ने और कसरत करने के आनंद को जानते हैं, केवल तभी वे उन आईटी उपकरणों से आसक्त नहीं होंगे।

महत्वपूर्ण बात यह है कि किशोरों को किस बात से बड़ा संतोष और खुशी मिलती है। उनके आनंद के स्रोत के अनुसार उनके मस्तिष्क बदलते हैं; गेम खेलना, इंटरनेट सर्फिंग करना, हिंसात्मक और उत्तेजक व्यवहार करना, खेलकूद करना, पैदल यात्रा पर जाना, पुस्तकें पढ़ना, कुछ संगीत वाद्य बजाना, या अच्छे काम करना। माता-पिता को अपने बच्चों को किशोरावस्था अच्छे से बिताने और उनका परिपक्व व्यक्तित्व बनाने के लिए उन्हें सकारात्मक खुशी देना चाहिए।

माता-पिता को प्रबंधक से सलाहकार में बदल जाना चाहिए

आइए हम जिदंगी की तुलना खाना बनाने से करें। एक छोटा बच्चा प्राथमिक स्कूल का छात्र होने तक वह खाना खाता है जो अपने माता-पिता पकाते हैं। लेकिन जब वह एक किशोर बन जाता है, तो वह स्वयं खाना पकाना चाहता है। चाहे वह खाना पकाने के तरीकों, उपकरणों और सामग्रियों के बारे में नहीं जानता, फिर भी वह स्वयं ही कुछ पकाना चाहता है। यदि उसके मार्ता-पिता इस डर से उसे रसोई घर में प्रवेश करने से मना करें कि वह अपनी उंगली काट ले या फिर उसकी उंगलियां जल जाएं, तो वह गुप्त रूप से अकेले या अपने मित्र के साथ मिलकर कुछ पकाएगा और सामग्रियों को खराब कर सकेगा।

जब आपकी संतान निश्चित उम्र तक पहुंचती है और स्वयं कुछ पकाना चाहती है, तो आपको प्रबंधक से सलाहकार में बदल जाना चाहिए। निस्संदेह, अपने अनुभवहीन बच्चे पर जिसके पास अभी तक सही निर्णय लेने की क्षमता नहीं है, भरोसा करना या उसे समर्थन देना आसान नहीं है। हालांकि, चाहे आप अच्छी तरह से जानते हैं कि अपनी संतान लंबे और कठिन रास्ता पर चल रही है, फिर भी यह न भूलें कि अपनी संतान को तुरन्त ही उत्तर दे दिए जाने से यह प्रक्रिया कहीं अधिक महत्वपूर्ण है कि वह स्वयं प्रयत्न-त्रुटि प्रक्रिया से गुजरकर उत्तर खोज निकाले।

यदि माता-पिता अपनी संतान की कुछ हद से ज्यादा देखभाल करें और उस पर दबाव डालकर उसे केवल वही काम करने दें जो माता-पिता चाहते हैं, तो माता-पिता और संतान के बीच में एक विरोध संबंध बन जाएगा। उसके विपरित, यदि माता-पिता यह सोचते हुए कि, ‘चाहे मैं कुछ भी कहूं, वह नहीं सुनेगा,’ अपनी संतान का मार्गदर्शन करने पर हार मानें और उसे अकेला छोड़ दें, तो उसका परिणाम उस पर दबाव डालने से भी ज्यादा बुरा होगा। माता-पिता के लिए यह अच्छा है कि वे अपनी संतान को चुनौती देने का मौका दें और धीरज से उसे देखें।

एक किशोर खुद को छोटा बच्चा नहीं बल्कि वयस्क के समान समझा जाना चाहता है। लेकिन, साथ ही वह अपने माता-पिता के द्वारा सुरक्षित रहना भी चाहता है। वह बाहरी रूप से अपने माता-पिता के अनुशासन को पसंद नहीं करता, लेकिन अंदर से, वह उनसे कुछ उम्मीद करता है और उन पर निर्भर रहता है। तब माता-पिता उसके ऐसे उभयभावी रवैये से परेशान हो सकते हैं। फिर भी, चाहे वे अपनी संतान के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए रखना कितना मुश्किल क्यों न हो, माता-पिता को उसके लिए प्रयास करना चाहिए। जब उसके के साथ सहानुभूति का संबंध है, तो बच्चा यह जानकर कि अपने माता-पिता के पास ज्यादा बुद्धि और अनुभव हैं, उनकी सलाह को सुनेगा।

अपनी किशोर संतान के साथ कैसे बातचीत करें

1. आपकी संतान आदर पाना चाहती है

एक शैक्षणिक प्रकाशन कंपनी के सर्वेक्षण में जो 426 माध्यमिक स्कूल के छात्रों के साथ किया गया था, 43.8‰ छात्रों ने उत्तर दिया कि किशोरावस्था पर जीत पाने के लिए उन्हें परिवारवालों और मित्रों से देखभाल और आदर चाहिए। जब आपकी संतान किशोरावस्था में आती है, तो आपको उसके साथ एक छोटे बच्चे के समान व्यवहार नहीं करना चाहिए। आपको उसकी भावनाएं, विचार, और व्यक्तित्व का आदर करना चाहिए। यदि आप उसके साथ केवल एक छोटे बच्चे के समान व्यवहार करना जारी रखें और उसे उसी मार्ग पर चलने के लिए मजबूर करें जो आप चाहते हैं, तो वह और ज्यादा विद्रोही बनेगा। इसका अर्थ यह नहीं कि आपको अपनी संतान के साथ मित्र के समान व्यवहार करना चाहिए। आपको अपने माता-पिता के पद और गरिमा को बनाए रखते हुए अपनी भावनाओं और विचारों को व्यक्त करना चाहिए लेकिन एकपक्षीय आदेश न देना चाहिए।

2. अपनी संतान की खूबियों को पहचान लें

किशोरावस्था के दौरान, बच्चे दिल से बहुत संवेदनशील होते हैं। इसलिए कभी-कभी वे दूसरों के द्वारा कही गई छोटी सी बात के लिए भी अति प्रतिक्रिया करते हैं या जब कोई उनकी गलतियों को बताता है तो उन्हें ठेस पहुंचती है। इस परिस्थिति से निपटने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि उनकी गलतियों को धीरे से बताएं और उनकी खूबियों की प्रशंसा जोर से और अक्सर करें।

जब आप अपनी संतान की प्रशंसा करें, तो वह बिना किसी प्रतिरोध के अपनी परेशानियों के बारे में आपसे बात करेगी। यदि आप कुछ अनपेक्षित बात को पकड़कर विस्तार से प्रशंसा करें, तो वह बहुत प्रभावी होगी। अपनी संतान की किसी ऐसी एक बात पर ध्यान रखें जो दूसरे नजरअंदाज करते हैं, और उसके लिए उसकी प्रशंसा करें। वह और भी खुशी से आपकी प्रशंसा को ग्रहण करेगा।

3. अपनी संतान के साथ ईमानदार संवाद करें

ज्यादातर बच्चे जो अपने माता-पिता से संवाद करना नहीं चाहते, कहते हैं कि वे उनसे इस कारण से बात करना नहीं चाहते, क्योंकि वे जानते हैं कि आखिर में अपने माता-पिता उन पर बड़बड़ाएंगे। यदि आप अपनी संतान के साथ अक्सर बातचीत नहीं करते, तो यह बहुत संभावना है कि आप उसकी गलतियों को निकालेंगे। यह इसलिए क्योंकि जब आपको मौका मिलता है, तब आप उससे वह कहने की कोशिश करते हैं जो आप उसे कहना चाहते थे।

यह अच्छा होगा कि अक्सर आप दयालु ढंग से अपनी संतान से यह पूछें कि उसे क्या चाहिए और आप उसके लिए क्या कुछ करना चाहते हैं। आपको उसके साथ ईमानदार संवाद करते हुए समस्या हल करना चाहिए। यह जरूरी नहीं कि आप हमेशा किसी भारी विषयों को लेकर एक गंभीर संवाद करें। जहां तक हो सके वहां तक अपनी संतान के साथ हर रोज घटी बातों के बारे में दिलचस्प और मित्रतापूर्ण संवाद करें। सबसे जरूरी बात यह है कि उस बात पर ध्यान देना जो वह क्या कहने की कोशिश कर रहा है।

TIP
बातें जो आप को किशोर वय की संतान से नहीं कहनी चाहिए
“तुम्हें क्या हो गया है?”: आपकी संतान बेहद निराश और क्रोधित होगी।
“तुम हमेशा ऐसा ही करते हो।”: चाहे आपको अपनी संतान का रवैया कितना भी नापसंद क्यों न हो, कभी भी ऐसी सख्त अभिव्यक्ति न करें।
“देखा? जब कभी तुम मेरी बात नहीं सुनते, ऐसा ही होता है!”: इससे आपकी संतान की हिम्मत टूट जाएगी।
“आखिर तुम्हारी समस्या क्या है?”: किशोरावस्था एक तूफान का समय है। इससे एक किशोर उदास, क्रोधित, और लाचार महसूस कर सकता है। ऐसी आलोचना से उसे यह लग सकता है कि उसकी भावनाओं को अनदेखा किया जाता है।
किसी भी प्रकार के शब्द जो आपकी संतान के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचा सकते हैं: गाली देना, बड़बड़ाना, और एकपक्षीय आदेश जो बातचीत बंद कर देता है।

4. अपने प्रेम को व्यक्त करें

किशोर वय की संतान के लिए सबसे बड़ी सहायता यह है कि माता–पिता उसके प्रति स्नेहपूर्ण व्यवहार करें। यह सोचने के बजाय कि अपनी संतान को हृदय से प्रेम करना ही काफी है, यह अच्छा होगा कि आप शब्दों और कार्यों के द्वारा उसके प्रति अपने प्रेम को व्यक्त करें, ताकि वह यह महसूस कर सके कि आप उससे प्रेम करते हैं। गले लगाना, हाथ पकड़ना, और कंधा थपथपाना जैसे शारीरिक स्पर्श के द्वारा उसे भावनात्मक स्थिरता मिलेगी और उसका तनाव दूर होगा। यह कहते हुए अपना प्रेम व्यक्त करने की कोशिश करें, “चाहे दूसरे लोग कुछ भी कहें, तुम मेरे लिए सबसे बहुमूल्य व्यक्ति हो!” “यह ठीक है। तुम अगली बार अच्छा कर सकते हो!” या “तुम नहीं जानते कि तुम्हारे कारण मुझे कितनी खुशी मिलती है!” ताकि वह यह जान सके कि आप हमेशा उसके साथ रहते हैं।

5. आपकी संतान को परिवार के महत्व के बारे में समझने में सहायता करें

जो बच्चा यह जानता है कि अपना परिवार कितना बहुमूल्य है, उसके पास आत्मविश्वास होता है और वह जानता है कि वह अपने मित्रों और शिक्षकों के साथ हो रही समस्याओं को कैसे समझदारी से हल कर सकता है। अपने बच्चे को परिवार के महत्व को समझने में सहायता करने के लिए सबसे पहले आपको एक अच्छा उदाहरण बनना है। यदि आप स्वयं अपने पति या पत्नी के साथ झगड़ते हों, आप में प्रेम की कमी हों, और बच्चों के साथ बिल्कुल संवाद नहीं करते हों, तो अपनी संतान आसानी से परेशानी और संघर्ष में घिर जाएगा। एक सर्वेक्षण के अनुसार, वे बच्चे जिनकी परवरिश हिंसात्मक परिवार में हुई है उनके एक मुजरिम बनने की संभावना पांच गुना ज्यादा है। यदि माता-पिता एक दूसरे का आदर करते हैं, तो उनके बच्चे भी उनका आदर करेंगे। अपने परिवार में सामंजस्य बनाए रखने और अपने पति या पत्नी के साथ मित्रभाव से संवाद करना अपनी संतान को संसार से अच्छे से संवाद करने में सहायता करेगा।

किशोरावस्था एक ऐसी निर्णायक और महत्वपूर्ण अवधि है जब किशोर बच्चे जीवनभर के लिए गुणों का निर्माण करते हैं। अमेरिका का शिक्षा विशेषज्ञ डॉ. माइक रियेरा कहता है कि धीरज, भरोसा, और पारिवारिक संबंध ही माता-पिता की सफलता की कुंजियां हैं जिसके पास किशोर बच्चे हैं। फलों को पकने के लिए चिलचिलाती तेज धूप और प्रचण्ड तूफान को सहना पड़ता है। माता-पिता और उनकी संतान के लिए भी वैसा ही है। यदि माता-पिता अपनी संतान को उसकी किशोरावस्था के दौरान—जो मानव विकास की प्रक्रिया में सबसे संवेदनशील और अस्थिर अवधि है—हमेशा उसके साथ रहकर उसे प्रोत्साहित करें, तो वह किशोरावस्था को किसी बड़ी परेशानियों के बिना पार कर सकता है और एक अच्छा वयस्क बन सकता है।

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