लीविख’स लॉ ऑफ द मिनमम

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एक ऐसा सिद्धांत है जिसे लीविख’स लॉ ऑफ द मिनमम(Liebig’s Law of minimum) कहा जाता है। इसे एक जर्मन रसायन–शास्त्री, जस्टस वॉन लिबिग के द्वारा पेश किया गया था। इसमें कहा गया है कि पौधों का विकास उस आवश्यक पोषक तत्व पर निर्भर नहीं करता जिसकी मात्रा अधिक होती है, बल्कि उस तत्व पर निर्भर करता है जिसकी मात्रा सबसे कम होती है। यदि लकड़ी के अनेक तख्तों को जोड़कर एक बाल्टी को बनाया जाए और उसमें पानी रखा जाए, तो पानी की मात्रा सबसे छोटे तख्ते पर निर्भर करेगी। इसे लकड़ी की बाल्टी का सिद्धांत कहा जाता है।

चाहे कोई व्यक्ति कितना भी स्वस्थ क्यों न हो, यदि उसके अंगों में से कोई अच्छा नहीं होता, तो उसका जीवनकाल छोटा हो जाता है। चाहे कोई विद्यार्थी कितना भी होशियार क्यों न हो, यदि उसे सभी विषयों में से किसी एक में अच्छे अंक नहीं मिलते, तो उसके सभी अंक नीचे आ जाते हैं।

प्रेम भी ऐसा ही है। बलिदान, नम्रता, दीनता, विचारशीलता, शांति, रिआयत, धीरज, संयम, एकता… यदि हमारे अंदर उनमें से किसी एक गुण का भी अभाव है, तो हम संपूर्ण प्रेम पूरा नहीं कर सकते। हमें इसके बारे में सोचना चाहिए कि संपूर्ण प्रेम के लिए हमारे अंदर किस गुण की कमी है, और उस गुण पर जिसकी हम में कमी है, ध्यान देना चाहिए और उसे भरने की कोशिश करनी चाहिए।