हर धर्म में कुछ भोजन हैं जिन्हें खाना निषिद्ध है। मैंने सीखा है कि ईसाई धर्म में भी कुछ निषिद्ध भोजन हैं। लेकिन हर चर्च में निषिद्ध भोजन अलग–अलग होते हैं। उनमें से कौन सा सही है और बाइबल में भोजन को निषिद्ध करने का मानक क्या है?

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कुछ भोजन हैं जो परमेश्वर ने अपने लोगों को खाने से मना किया है। भोजन से संबंधित नियम सृष्टि के समय से लेकर नए नियम के समय तक मौजूद है, लेकिन हमें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि भोजन के बारे में परमेश्वर ने हर युग में अपने लोगों को अलग–अलग नियम दिए हैं।

आज बहुत से चर्चों के पास भोजन के बारे में अपने–अपने नियम होते हैं और वे अपने नियमों का पालन करने पर जोर देते हैं। उनमें से ज्यादातर कहते हैं कि उनके भोजन के नियम बाइबल पर आधारित हैं, लेकिन वे ऐसा इसलिए दावा करते हैं क्योंकि वे समय पर ध्यान न देने की गलती करते हैं।

पुराने समय में यद्यपि किसी भी प्रकार के भोजन के नियम थे, लेकिन हमें सिर्फ उन प्रेरितों की शिक्षाओं का पालन करने की जरूरत है जिन्हें यीशु से शिक्षा मिली थी। नए नियम के समय में परमेश्वर ने प्रेरितों के द्वारा भोजन के संबंध में एक नियम स्थापित किया। इसलिए आज इस युग में हमें नए नियम के भोजन के नियम का पालन करना चाहिए। जब हम ऐसा करें, तब हम कह सकेंगे कि हम में संपूर्ण विश्वास और आज्ञाकारिता बनी रहती है।

अदन वाटिका के समय से मूसा के समय तक भोजन के नियम

प्रत्येक युग में, यानी अदन वाटिका के समय में, नूह के जलप्रलय के बाद के समय में और मूसा के समय में परमेश्वर ने अलग–अलग भोजन के नियम स्थापित किए।

1. अदन वाटिका में

फिर परमेश्वर ने उनसे कहा, “सुनो, जितने बीजवाले छोटे छोटे पेड़ सारी पृथ्वी के ऊपर हैं और जितने वृक्षों में बीजवाले फल होते हैं, वे सब मैं ने तुम को दिए हैं; वे तुम्हारे भोजन के लिये हैं।” उत 1:29

अदन वाटिका में परमेश्वर ने मनुष्य को सभी बीजवाले पेड़–पौधे और सारे फलदार पेड़ भोजन के लिए दिए। उस समय यह परमेश्वर की इच्छा थी कि मनुष्य साग–सब्जियां खाए।

2. नूह के जलप्रलय के बाद

सब चलनेवाले जन्तु तुम्हारा आहार होंगे; जैसा तुम को हरे हरे छोटे पेड़ दिए थे, वैसा ही अब सब कुछ देता हूं। उत 9:3

जलप्रलय के बाद परमेश्वर ने नूह और उसके वंशजों को सभी पशु खाने के लिए दिए, इसलिए उस समय मांस खाना परमेश्वर की इच्छा का पालन करना था। सब्जियां खाने और मांस खाने में कोई फर्क नहीं था। जलप्रलय के बाद यदि कोई सिर्फ साग–सब्जियां और फल खाने पर जोर देता, तो यह परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन करने जैसा होता था।

3. मूसा के समय में

मूसा के समय में परमेश्वर ने सीनै पर्वत पर वाचा के वचन कहे और साथ ही नए सिरे से भोजन के बारे में नियम दिए।

फिर यहोवा ने मूसा और हारून से कहा, “इस्राएलियों से कहो : जितने पशु पृथ्वी पर हैं उन सभों में से तुम इन जीवधारियों का मांस खा सकते हो। पशुओं में से जितने चिरे या फटे खुर के होते हैं और पागुर करते हैं उन्हें खा सकते हो।” लैव 11:1–3

पुराने नियम के समय में उन पशुओं को शुद्ध माना जाता था जो चिरे या फटे खुर के होते थे और पागुर करते थे। उनके अलावा बाकी सभी पशुओं को अशुद्ध माना जाता था। परमेश्वर ने अपने लोगों को सिर्फ शुद्ध पशु खाने की अनुमति दी।

मूसा के समय से पहले परमेश्वर के लोगों को कोई भी पशु खाने की अनुमति थी, लेकिन मूसा के समय में उन्हें अशुद्ध पशु खाने से मना किया गया। भले ही भोजनों को चुन–चुनकर खाना कष्टकर और असुविधाजनक था, लेकिन उन दिनों यह परमेश्वर की इच्छा थी कि वे पशुओं में से सिर्फ शुद्ध पशुओं को चुनकर खाएं।

परमेश्वर ने सिर्फ शुद्ध पशु इस्राएलियों को खाने के लिए दिए। यह इसलिए था कि परमेश्वर ने उन्हें दूसरी जातियों के लोगों से अलग किया और अपनी निजी प्रजा चुना। दूसरे शब्दों में परमेश्वर ने अपने लोगों को अन्यजातियों के लोगों से अलग करने के लिए भोजन का नियम दिया। पुराने नियम के समय में परमेश्वर के लोगों को मूसा की व्यवस्था के अनुसार सख्ती से भोजन के नियम का पालन करना चाहिए था।

नए नियम के समय में भोजन का नियम

2,000 वर्ष पहले मसीह मनुष्य का रूप धारण करके इस पृथ्वी पर आए और सारी मानवजाति को बचाने के लिए क्रूस पर खुद को बलिदान किया। इससे ऐसा अनुग्रह का युग आ गया जिसमें परमेश्वर का उद्धार यहूदियों के साथ अन्यजातियों के लोगों को भी प्रदान किया गया।

चूंकि मसीह ने पुराने नियम के सभी अशुद्ध भोजनों को शुद्ध किया और भोजन के बारे में नए सिरे से नियम दिए, इसलिए भोजन के नियम के कारण यहूदियों और अन्यजातियों के लोगों के बीच जो अंतर था, वह गायब हो गया।(प्रे 10:9–48)

पवित्र आत्मा को और हम को ठीक जान पड़ा कि इन आवश्यक बातों को छोड़, तुम पर और बोझ न डालें; कि तुम मूरतों पर बलि किए हुओं से और लहू से, और गला घोंटे हुओं के मांस से, और व्यभिचार से दूर रहो। इनसे दूर रहो तो तुम्हारा भला होगा। आगे शुभ। प्रे 15:28–29

उपर्युक्त भोजन का नियम प्रेरितों के युग का है और यह पवित्र आत्मा की उपस्थिति में आयोजित महासभा में घोषित किया गया। यह वह भोजन का नियम है जिसका नए नियम के समय में रहने वाले हम लोगों को पालन करना चाहिए। हमें शुद्ध और अशुद्ध पशुओं के बीच फर्क नहीं करना चाहिए और बस मूरतों पर बलि किए हुओं से और लहू से और गला घोंटे हुओं के मांस से दूर रहना चाहिए।

पवित्र आत्मा की उपस्थिति में यह निर्णय किया गया है, तो कौन इसे बदल सकता है? भले ही उन रीतियों और परम्पराओं को बदलना कठिन है जिनका लंबे समय से सख्ती से पालन किया जा रहा है, लेकिन इस युग में यदि परमेश्वर ने हमें कुछ नया नियम दिया है, तो हमें उसका पूरी तरह से पालन करना चाहिए। इसलिए प्रेरित पौलुस ने जब भी चर्चों को पत्र लिखे, उसने भोजन के विषय में बताया और यह भी कहा कि जो पुराने नियम की व्यवस्था का पालन करेंगे वे मसीह से अलग किए जाएंगे।

तुम जो व्यवस्था के द्वारा धर्मी ठहरना चाहते हो, मसीह से अलग और अनुग्रह से गिर गए हो। गल 5:4

परन्तु उन अन्यजातियों के विषय में जिन्होंने विश्वास किया है, हम ने यह निर्णय करके लिख भेजा है कि वे मूर्तियों के सामने बलि किए हुए मांस से, और लहू से और गला घोंटे हुओं के मांस से, और व्यभिचार से बचे रहें। प्रे 21:25

मूर्तियों पर चढ़ाए गए भोजन के बारे में

इस युग में जैसे पवित्र आत्मा निर्देश देता है, वैसे ही यदि हम लहू से, गला घोंटे हुओं के मांस से और मूर्तियों पर चढ़ाए गए भोजन से दूर रहें और भोजन के नियम का पालन करें, तब हम आशीषित हो सकते हैं। “मूर्तियों पर चढ़ाया गया भोजन” वह भोजन है जिसका उपयोग दूसरे देवताओं की उपासना करने के लिए किया जाता है। बाइबल इस भोजन से परे रहने पर विशेष जोर देती है।

इस कारण, हे मेरे प्रियो, मूर्तिपूजा से बचे रहो। मैं बुद्धिमान जानकर तुम से कहता हूं: जो मैं कहता हूं, उसे तुम परखो। वह धन्यवाद का कटोरा, जिस पर हम धन्यवाद करते हैं; क्या मसीह के लहू की सहभागिता नहीं? वह रोटी जिसे हम तोड़ते हैं, क्या मसीह की देह की सहभागिता नहीं? इसलिये कि एक ही रोटी है तो हम भी जो बहुत हैं, एक देह हैं: क्योंकि हम सब उसी एक रोटी में भागी होते हैं। जो शरीर के भाव से इस्राएली हैं, उनको देखो: क्या बलिदानों के खानेवाले वेदी के सहभागी नहीं? फिर मैं क्या कहता हूं? क्या यह कि मूर्ति पर चढ़ाया गया बलिदान कुछ है, या मूर्ति कुछ है? नहीं, वरन् यह कि अन्यजाति जो बलिदान करते हैं; वे परमेश्वर के लिये नहीं परन्तु दुष्टात्माओं के लिये बलिदान करते हैं और मैं नहीं चाहता कि तुम दुष्टात्माओं के सहभागी हो। तुम प्रभु के कटोरे, और दुष्टात्माओं के कटोरे दानों में से नहीं पी सकते। तुम प्रभु की मेज और दुष्टात्माओं की मेज दानों के साझी नहीं हो सकते। 1कुर 10:14–21

बहुत से लोग जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, अवश्य जानते हैं कि उन्हें मूर्तिपूजा नहीं करनी चाहिए। मूर्ति पर चढ़ाई गई बलि की वस्तुओं को खाना दुष्टात्मा की वेदी का साझेदार बनना है और यह एक मूर्तिपूजा है।

फसह की रोटी और दाखमधु में, जो मसीह के मांस और लहू को दर्शाते हैं, भाग लेने वाले लोग परमेश्वर के साथ एक देह बनते हैं और फिर दूसरे लोगों से अलग किए जाते हैं और परमेश्वर की संतान बनते हैं। भले ही हम पवित्र परमेश्वर की संतान हैं, यदि हम मूर्तियों पर चढ़ाया गया भोजन खाएं, तो हम खुद को अशुद्ध करेंगे और परमेश्वर से अनायास ही दूर हो जाएंगे।

अत: मूर्तियों के सामने बलि की हुई वस्तुओं के खाने के विषय में – हम जानते हैं कि मूर्ति जगत में कोई वस्तु नहीं, और एक को छोड़ और कोई परमेश्वर नहीं… पर सब को यह ज्ञान नहीं, परन्तु कुछ तो अब तक मूर्ति को कुछ समझने के कारण मूर्तियों के सामने बलि की हुई वस्तु को कुछ वस्तु समझकर खाते हैं, और उनका विवेक निर्बल होने के कारण अशुद्ध हो जाता है। 1कुर 8:4–7

परमेश्वर ने हमें उद्धार देने के लिए क्रूस पर अपना लहू बहाया और उन्होंने अपने लोगों के लिए हर युग में नियम दिए। इस युग में भी उन्होंने भोजन का नियम स्थापित किया है और हमारे उद्धार के लिए अपना प्रेम उस नियम में शामिल किया है।

संपूर्ण आज्ञाकारिता के साथ हर युग में दिए परमेश्वर के वचनों का पालन करना

चूंकि इस युग का अपना भोजन का नियम है, इसलिए हमें अतीत के युगों में दिए भोजन के नियमों का पालन करने की जरूरत नहीं है। पुराने युग की चीजों पर डटे रहकर इस युग में दी गई परमेश्वर की आज्ञा को तोड़ना दुष्टात्माओं की शिक्षाओं का पालन करने जैसा है।

परन्तु आत्मा स्पष्टता से कहता है कि आनेवाले समयों में कितने लोग भरमानेवाली आत्माओं, और दुष्टात्माओं की शिक्षाओं पर मन लगाकर विश्वास से बहक जाएंगे। यह उन झूठे मनुष्यों के कपट के कारण होगा, जिनका विवेक मानो जलते हुए लोहे से दागा गया है, जो विवाह करने से रोकेंगे, और भोजन की कुछ वस्तुओं से परे रहने की आज्ञा देंगे, जिन्हें परमेश्वर ने इसलिये सृजा कि विश्वासी और सत्य के पहिचाननेवाले उन्हें धन्यवाद के साथ खाएं। 1तीम 4:1–3

आज नए नियम के समय में दिए गए परमेश्वर के वचनों के अनुसार, हमें सिर्फ इन तीन चीजों को खाने से दूर रहना है – मूर्ति पर चढ़ाया गया भोजन, लहू और गला घोंटे हुओं का मांस। शाकाहार या मांसाहार जैसा कोई सिद्धांत बनाने की जरूरत नहीं है; हमें बस अपनी शरीरावस्था के अनुसार भोजन खाना चाहिए।

यदि कोई इसी कारण शाकाहारी होने पर जोर दे क्योंकि अदन वाटिका में आदम और हव्वा शाकाहारी थे, तो फिर क्या वह यह भी कह सकेगा कि हमें आराधना बिना कुछ कपड़े पहने मनानी चाहिए क्योंकि अदन वाटिका में आदम और हव्वा नंगे थे? और इस समय मूसा के भोजन के नियम को वापस लागू करना इस तर्क से कुछ अलग नहीं है कि आज हमें पुराने नियम की विधियों के अनुसार पशुओं की बलि लहू के साथ चढ़ानी चाहिए।

एक ही भोजन के विषय में परमेश्वर एक बार हमें उसे खाने की अनुमति देते हैं और दूसरी बार हमें उसे खाने से मना करते हैं। जब परमेश्वर हमें कुछ खाने के लिए कहें, तब हमें बस उसे खाना चाहिए, और जब परमेश्वर हमें कुछ न खाने के लिए कहें, तब हमें उसे नहीं खाना चाहिए। ऐसा करना आज्ञाकारिता है।

सभी युगों में परमेश्वर की इच्छा के अनुसार जीवन जीना सही मार्ग और उद्धार के मार्ग पर चलना है। इस युग में दिए वचनों में निहित परमेश्वर के प्रेम को महसूस करके, आइए हम उनमें अपनी किसी भी राय या सिद्धांत को जोड़े बिना पूरी ईमानदारी से उनका पालन करें।

हर धर्म में कुछ भोजन हैं जिन्हें खाना निषिद्ध है। मैंने सीखा है कि ईसाई धर्म में भी कुछ निषिद्ध भोजन हैं। लेकिन हर चर्च में निषिद्ध भोजन अलग–अलग होते हैं। उनमें से कौन सा सही है और बाइबल में भोजन को निषिद्ध करने का मानक क्या है?

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