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फसह और प्रतिज्ञा का चिह्न

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आज दुनिया के तमाम हिस्सों में हो रही विपत्तियों की खबरों के कारण पूरे विश्व में तनाव बढ़ रहा है। बाइबल युद्ध और संघर्ष सहित भूकंप, सुनामी, ज्वालामुखी विस्फोट, असामान्य मौसम की घटनाओं जैसी विपत्तियों की चेतावनी हजारों वर्ष पहले दे चुकी थी। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि ऐसी विपत्तियां इस पवित्र आत्मा के युग में जिसमें हम जी रहे हैं, एक ही बार में उंडेली जा रही हैं।

परमेश्वर ने अपने लोगों को विपत्तियों से रक्षा करने के लिए, इस युग में फसह को पुनर्स्थापित किया है। 3,500 वर्ष पहले, निर्गमन के समय में परमेश्वर ने इस्राएलियों को किसी भी बात से बढ़कर फसह का ज्ञात कराया। यह इसलिए था क्योंकि मिस्र में एक भयंकर विपत्ति आने वाली थी। जब कभी विपत्ति आने वाली थी, परमेश्वर पहले से ही अपने लोगों को फसह मनाकर तैयार रहने देते थे, ताकि वे परमेश्वर के लोग होने का चिह्न पाकर उस विपत्ति से बच सकें।

फसह में उद्धार की प्रतिज्ञा है

यह तब हुआ जब यहोशू ने यरीहो को पराजित करने से पहले वहां दो भेदियों को भेजा था। इन दो भेदियों ने राहाब नामक एक वेश्या के घर में प्रवेश किया, तब यरीहो के सैनिकों ने उनका पीछा किया। परमेश्वर का भय माननेवाली राहाब ने अपने जीवन को जोखिम में डालकर उन्हें छिपा दिया। जब वे सुरक्षित रूप से यहोशू के पास लौटने वाले थे, तब उन्होंने राहाब से प्रतिज्ञा की; उन्होंने राहाब से इस बात की प्रतिज्ञा की कि यदि वह अपने परिवार और रिश्तेदारों को अपने घर में इकट्ठा करके खिड़की में लाल रंग के सूत की डोरी बांध दे, तो इस्राएलियों के यरीहो पर आक्रमण करते समय वे उसके घर में रहनेवालों में से किसी को भी नष्ट नहीं करेंगे। इसके बाद, जब यरीहो को पराजित किया गया, तब वे सारे लोग जो बचने के लिए राहाब का घर आए थे, अपने जीवन को बचा सके(यहो 2:1-21; 6:20-25)।

जिस तरह लाल रंग के सूत की डोरी राहाब और उसके परिवार को बचाने का एक चिह्न बनी, उस तरह फसह भी परमेश्वर के लोगों को विपत्तियों से बचाने के लिए परमेश्वर की प्रतिज्ञा का चिह्न है।

विश्वास ही से उस ने फसह और लहू छिड़कने की विधि मानी, कि पहिलौठों का नाश करनेवाला इस्राएलियों पर हाथ न डाले। इब्र 11:28

जो परमेश्वर की आज्ञाओं को नहीं मानते वे बाइबल से इस आयत का हवाला देकर कि “विश्वास से धर्मी जन जीवित रहेगा(रो 1:17),” ऐसा दावा करते हैं कि फसह महज एक धार्मिक रिवाज है और इसका विश्वास से कुछ लेना-देना नहीं है। लेकिन, परमेश्वर ने विश्वास से फसह और लहू छिड़कने की विधि मानी। फसह महज एक विधि नहीं, लेकिन विश्वास से स्थापित हुई विधि है और परमेश्वर का ऐसा पर्व है जिसे केवल विश्वास रखनेवाले मना सकते हैं।

आइए हम निर्गमन में उस दृश्य पर एक नजर डालें जहां परमेश्वर ने फसह को स्थापित किया था और फसह में समाई हुई प्रतिज्ञा के विषय में जानें।

तुम्हारा मेम्ना निर्दोष और एक वर्ष का नर हो, और उसे चाहे भेड़ों में से लेना चाहे बकरियों में से। और इस महीने के चौदहवें दिन तक उसे रख छोड़ना, और उस दिन गोधूलि के समय इस्राएल की सारी मण्डली के लोग उसे बलि करें। तब वे उसके लहू में से कुछ लेकर जिन घरों में मेम्ने को खाएंगे उनके द्वार के दोनों अलंगों और चौखट के सिरे पर लगाएं… और उसके खाने की यह विधि है : कमर बांधे, पांव में जूती पहिने, और हाथ में लाठी लिए हुए उसे फुर्ती से खाना; वह तो यहोवा का पर्व होगा। क्योंकि उस रात को मैं मिस्र देश के बीच में होकर जाऊंगा, और मिस्र देश के क्या मनुष्य क्या पशु, सब के पहिलौठों को मारूंगा; और मिस्र के सारे देवताओं को भी मैं दण्ड दूंगा; मैं यहोवा हूं। और जिन घरों में तुम रहोगे उन पर वह लहू(फसह के मेम्ने का लहू) तुम्हारे लिए चिह्न ठहरेगा; अर्थात् मैं उस लहू को देखकर तुम को छोड़ जाऊंगा, और जब मैं मिस्र देश के लोगों को मारूंगा, तब वह विपत्ति तुम पर न पड़ेगी और तुम नष्ट न होगे। और वह दिन तुम को स्मरण दिलानेवाला ठहरेगा, और तुम उसको यहोवा के लिये पर्व करके मानना; वह दिन तुम्हारी पीढ़ियों में सदा की विधि जानकर पर्व माना जाए। निर्ग 12:5-14

वह परमेश्वर थे जिन्होंने फसह को स्थापित करके अपने लोगों को इसे मनाने को कहा था। इसलिए, लोग जो परमेश्वर का भय मानकर उन पर विश्वास रखते थे, उन्होंने उनके वचन का पालन करके फसह मनाया। परिणामस्वरूप, वे विपत्तियों से बचाए जाकर दासत्व की भूमि मिस्र से छुड़ाए गए। लेकिन, अविश्वासी मिस्री जिन्होंने फसह नहीं मनाया, विपत्तियों से नहीं बच पाए और उनके पूरे पहलौठे मार डाले गए; एक भी ऐसा घर नहीं था जहां किसी की मौत न हुई हो(निर्ग 12:29-51)।

विपत्तियों को लेकर परमेश्वर की चेतावनी

क्या फसह केवल निर्गमन के समय में ही परमेश्वर के लोगों को विपत्तियों से बचाने के लिए प्रभावशाली था और निर्गमन के बाद इसका प्रभाव मिट गया? बिल्कुल नहीं। फसह परमेश्वर की वाचा है, जिसे हमें पीढ़ी दर पीढ़ी वरन् जगत के अंत तक सदा की विधि जानकर मानना चाहिए। बाइबल में, परमेश्वर के लोगों के फसह मनाकर विपत्तियों से बच निकलने का इतिहास लिखा गया है(2इत 30:1-27; 2रा 19:32-35 संदर्भ)।

पुराने नियम के समय में, इस्राएलियों ने परमेश्वर के लोगों के चिह्न के रूप में फसह के मेम्ने के लहू को अपने घरों के द्वार के दोनों अलंगों और चौखट के सिरे पर लगाया। अब, परमेश्वर ने हममें फसह का मेम्ना यानी यीशु का मांस और लहू होने दिया है ताकि विपत्तियां हम प्रत्येक को छोड़कर गुजर जाएं। फसह में परमेश्वर की प्रतिज्ञा है: “वह विपत्ति तुम पर न पड़ेगी और तुम नष्ट न होगे।” यह प्रतिज्ञा ऐसे युग में जब विपत्तियां बाढ़ के समान बढ़ आती हैं, और अधिक प्रभावशाली है।

“… प्रभु यहोवा यों कहता है : विपत्ति है, एक बड़ी विपत्ति है! देखो, वह आती है। अन्त आ गया है, सब का अन्त आया है; वह तेरे विरुद्ध जागा है। देखो, वह आता है। हे देश के निवासी, तेरे लिये चक्र घूम चुका, समय आ गया, दिन निकट है; पहाड़ों पर आनन्द के शब्द का दिन नहीं, हुल्लड़ ही का होगा। अब थोड़े दिनों में मैं अपनी जलजलाहट तुझ पर भड़काऊंगा, और तुझ पर पूरा कोप उण्डेलूंगा और तेरे चालचलन के अनुसार तुझे दण्ड दूंगा। तेरे सारे घिनौने कामों का फल तुझे भुगताऊंगा। मेरी दयादृष्टि तुझ पर न होगी और न मैं तुझ पर कोमलता करूंगा। मैं तेरी चालचलन का फल तुझे भुगताऊंगा, और तेरे घिनौने पाप तुझ में बने रहेंगे। तब तुम जान लोगे कि मैं यहोवा दण्ड देनेवाला हूं… यहोवा की जलन के दिन उनका सोना चांदी उनको बचा न सकेगी, न उससे उनका जी सन्तुष्ट होगा, न उनके पेट भरेंगे। क्योंकि वह उनके अधर्म के ठोकर का कारण हुआ है।” यहेज 7:2-19

परमेश्वर ने चेतावनी दी कि मानव जाति पर बड़ी विपत्तियां आएंगी। जिस तरह बाइबल भविष्यवाणी करती है, हाल ही में, ऐसी बड़ी विपत्तियां बार-बार हो रही हैं जिन्हें हमने कभी नहीं देखा या सुना था। अभूतपूर्व बड़े भूकंपों और असामान्य जलवायु परिवर्तन का अनुभव करते हुए लोग कहते हैं, “यह सौ वर्षों में सबसे बदतर विपत्ति है” या “यह हजार सालों में एक बार होने वाली विपत्ति है।” यह दिखाता है कि आज की विपत्तियां “बड़ी विपत्तियां” हैं जिन्हें हमने कभी नहीं देखा या सुना था।

“… विपत्ति पर विपत्ति आएगी और उड़ती हुई चर्चा पर चर्चा सुनाई पड़ेगी; और लोग भविष्यद्वक्ता से दर्शन की बात पूछेंगे, परन्तु याजक के पास से व्यवस्था, और पुरनिये के पास से सम्मति देने की शक्ति जाती रहेगी। राजा तो शोक करेगा, और रईस उदासीरूपी वस्त्र पहिनेंगे, और देश के लोगों के हाथ ढीले पड़ेंगे। मैं उनके चलन के अनुसार उनसे बर्ताव करूंगा, और उनकी कमाई के समान उनको दण्ड दूंगा; तब वे जान लेंगे कि मैं यहोवा हूं।” यहेज 7:25-27

विपत्ति के सामने, अधिकारी शोक करते हैं और उदासीरूपी वस्त्र पहनते हैं, और याजक भी कुछ भी नहीं कर सकते; उनकी धन-सम्पत्ति किसी काम की नहीं और जो कुछ उन्होंने तैयार किया है वह सब व्यर्थ है। आनेवाली सारी विपत्तियों से हमें बच निकलने के लिए परमेश्वर की प्रतिज्ञा की जरूरत है।

प्रतिज्ञा का चिह्न, फसह जिसके द्वारा विपत्ति हमें छोड़कर गुजर जाती है

फसह परमेश्वर और हमारे बीच स्थापित उद्धार का चिह्न है। जिस तरह परमेश्वर ने राहाब को उसके घर में चिह्न लगाने देकर उसका जीवन बचाया, परमेश्वर ने हमारे माथे पर उद्धार का चिह्न लगाया है।

और यहोवा ने उससे कहा, “इस यरूशलेम नगर के भीतर इधर उधर जाकर जितने मनुष्य उन सब घृणित कामों के कारण जो उसमें किए जाते हैं, सांसें भरते और दु:ख के मारे चिल्लाते हैं, उनके माथों पर चिह्न लगा दे।” तब उसने मेरे सुनते हुए दूसरों से कहा, “नगर में उनके पीछे पीछे चलकर मारते जाओ; किसी पर दया न करना और न कोमलता से काम करना। बूढ़े, युवा, कुंवारी, बालबच्चे, स्त्रियां, सब को मारकर नष्ट करो, परन्तु जिस किसी मनुष्य के माथे पर वह चिह्न हो, उसके निकट न जाना। मेरे पवित्रस्थान ही से आरम्भ करो।” अत: उन्होंने उन पुरनियों से आरम्भ किया जो भवन के सामने थे। यहेज 9:4-6

परमेश्वर ने कहा कि जिस किसी मनुष्य के माथे पर वह चिह्न हो उसे नष्ट न करो। जिनके माथे पर चिह्न है वे ऐसे लोग हैं जिनकी रक्षा की जानी चाहिए। निर्गमन के समय में, विपत्तियों से इस्राएलियों की रक्षा करने के लिए परमेश्वर ने उन्हें फसह मनाने का आदेश दिया ताकि नष्ट करने वाले स्वर्गदूत उनके ऊपर से गुजरें। आज भी, परमेश्वर अपने लोगों के माथे पर जिनकी रक्षा की जानी चाहिए, प्रतिज्ञा का चिह्न लगा देते हैं ताकि वे विपत्तियों से बच सकें। प्रेरित यूहन्ना ने भी पतमुस टापू में वही दर्शन देखा जो नबी यहेजकेल ने देखा था।

इसके बाद मैं ने पृथ्वी के चारों कोनों पर चार स्वर्गदूत खड़े देखे। वे पृथ्वी की चारों हवाओं को थामे हुए थे ताकि पृथ्वी या समुद्र या किसी पेड़ पर हवा न चले। फिर मैं ने एक और स्वर्गदूत को जीवते परमेश्वर की मुहर लिये हुए पूरब से ऊपर की ओर आते देखा; उसने उन चारों स्वर्गदूतों से जिन्हें पृथ्वी और समुद्र की हानि करने का अधिकार दिया गया था, ऊंचे शब्द से पुकारकर कहा, “जब तक हम अपने परमेश्वर के दासों के माथे पर मुहर न लगा दें, तब तक पृथ्वी और समुद्र और पेड़ों को हानि न पहुंचाना।” प्रक 7:1-3

“इसके बाद” का अर्थ प्रकाशितवाक्य अध्याय 6 में वर्णित इस घटना के बाद है: “आकाश के तारे पृथ्वी पर ऐसे गिर पड़े जैसे बड़ी आंधी से हिलकर अंजीर के पेड़ में से कच्चे फल झड़ते हैं।” यहां आकाश के तारे और अंजीर का पेड़ इस्राएल को संकेत करते हैं। और हवा का अर्थ युद्ध है। एक बड़े युद्ध के दौरान इस्राएल वैसे बुरी तरह से पीड़ित हुए जैसे कि बड़ी आंधी से हिलकर अंजीर के पेड़ में से कच्चे फल झड़ते हैं। वह द्वितीय विश्व युद्ध था जिसके दौरान जर्मन नाजी के द्वारा 60 लाख यहूदियों की हत्या की गई। इसलिए, “इसके बाद” का अर्थ है “द्वितीय विश्व युद्ध के बाद(प्रक 6:12-17)।”

तब, परमेश्वर की मुहर क्या है जो “इसके बाद” परमेश्वर के लोगों के माथों पर लगाई जाती है? परमेश्वर अपने लोगों को विपत्तियों से बचाने के लिए उनके माथों पर अपनी मुहर लगा देते हैं। यही फसह है जिसकी परमेश्वर ने निर्गमन के समय में उद्धार के चिह्न के रूप में प्रतिज्ञा की। फसह को पवित्रता से मनाकर नई वाचा में रहने वाले सारे लोग ऐसे लोग हैं जिन्होंने परमेश्वर का चिह्न पाया है। जैसे यहोशू ने इस्राएल की पूरी सेना को राहाब और उसके परिवार की रक्षा करने का आदेश दिया था, वैसे ही परमेश्वर नष्ट करने वाले स्वर्गदूतों को अपने लोगों को जो फसह मनाते हैं, कोई भी हानि न पहुंचाने की आज्ञा देते हैं।

परमेश्वर का मुहर लगाने का कार्य पूर्व से शुरू होकर पूरी दुनिया में फैलता है

परमेश्वर का मुहर लगाने का कार्य पूर्व से शुरू होता है। यह तथ्य कि मुहर लगाने का कार्य सूर्योदय का स्थान, पूर्व से शुरू होता है, दिखाता है कि वहां कुछ आपातिक घटना घटित होगी।

सुनो, यहोवा पृथ्वी को निर्जन और सुनसान करने पर है, वह उसको उलटकर उसके रहनेवालों को तितर बितर करेगा… पृथ्वी शून्य और उजाड़ हो जाएगी; क्योंकि यहोवा ही ने यह कहा है। पृथ्वी विलाप करेगी और मुर्झाएगी, जगत कुम्हलाएगा और मुर्झा जाएगा; पृथ्वी के महान् लोग भी कुम्हला जाएंगे। पृथ्वी अपने रहनेवालों के कारण अशुद्ध हो गई है, क्योंकि उन्होंने व्यवस्था का उल्लंघन किया और विधि को पलट डाला, और सनातन वाचा को तोड़ दिया है। इस कारण पृथ्वी को शाप ग्रसेगा और उस में रहनेवाले दोषी ठहरेंगे; और इसी कारण पृथ्वी के निवासी भस्म होंगे और थोड़े ही मनुष्य रह जाएंगे। यश 24:1-6

क्योंकि पृथ्वी पर देश देश के लोगों में ऐसा होगा जैसा कि जैतून के झाड़ने के समय, या दाख तोड़ने के बाद कोई कोई फल रह जाते हैं। वे लोग गला खोलकर जयजयकार करेंगे, और यहोवा के माहात्म्य को देखकर समुद्र से ललकारेंगे। इस कारण पूर्व में यहोवा की महिमा करो, और समुद्र के द्वीपों में इस्राएल के परमेश्वर यहोवा के नाम का गुणानुवाद करो। पृथ्वी की छोर से हमें ऐसे गीत की ध्वनि सुन पड़ती है, कि धर्मी की महिमा और बड़ाई हो… यश 24:13-16

पृथ्वी के शून्य और उजाड़ हो जाने से पहले, पूर्व में पृथ्वी की छोर से परमेश्वर के अपने लोगों के माथों पर मुहर लगाने का कार्य शुरू होगा। पूर्व में पृथ्वी की छोर कोरिया है जो पतमुस टापू के साथ जहां यूहन्ना ने दर्शन देखा था, एक समान अक्षांश पर स्थित है। इसलिए, कोरिया में नई वाचा के फसह का सत्य पुनर्स्थापित हुआ है और अब पूरी दुनिया में सारे लोगों पर परमेश्वर की मुहर लगाई जा रही है।

अब, सिय्योन के सदस्य पूरी दुनिया में जाकर नए नाम के साथ आए मसीह, नई यरूशलेम स्वर्गीय माता और नई वाचा के फसह का प्रचार कर रहे हैं। यह परमेश्वर के लोगों पर परमेश्वर की मुहर लगाने का कार्य है। जो कोई धन्यवाद के साथ परमेश्वर की प्रतिज्ञा को प्राप्त करता है वह उद्धार पाएगा, और जो कोई इसे प्राप्त नहीं करता वह दोषी ठहराया जाएगा(मर 16:15-16 संदर्भ)।

याकूब का संकट और परमेश्वर का उद्धार

इन सारे तथ्यों पर विचार करते हुए, हम समझ सकते हैं कि फसह हमारे उद्धार के लिए परमेश्वर के द्वारा तैयार किया गया सबसे बड़ा सत्य है। यीशु ने कहा है कि सारी पृथ्वी के सब रहनेवालों पर अंतिम विपत्ति आ पड़ेगी।

“इसलिये सावधान रहो, ऐसा न हो कि तुम्हारे मन खुमार, और मतवालेपन, और इस जीवन की चिन्ताओं से सुस्त हो जाएं, और वह दिन तुम पर फन्दे के समान अचानक आ पड़े। क्योंकि वह सारी पृथ्वी के सब रहनेवालों पर इसी प्रकार आ पड़ेगा। इसलिये जागते रहो और हर समय प्रार्थना करते रहो कि तुम इन सब आनेवाली घटनाओं से बचने और मनुष्य के पुत्र के सामने खड़े होने के योग्य बनो।” लूक 21:34-36

हमें जागते रहकर हर समय प्रार्थना करना और परमेश्वर के कार्य के लिए कड़ी मेहनत करनी चाहिए, ताकि वह दिन हम पर फन्दे के समान आ नहीं पड़े। जब याकूब अपना घर वापस जा रहा था, तब उसने यब्बोक नदी के घाट पर परमेश्वर के दूत से रात भर मल्लयुद्ध किया। अपनी जांघ की नस के चढ़ जाने पर भी उसने हार नहीं मानी। आखिरकार, याकूब परमेश्वर से आशीष पाने के बाद अपना घर वापस गया। इस तरह, हमें भी अपने आत्मिक घर अर्थात् स्वर्ग जाने के मार्ग पर कम से कम एक बार तो कष्ट के दौर से गुजरना पड़ता है। यिर्मयाह की पुस्तक इसे “याकूब के संकट का समय” कहती है।

पूछो तो भला, और देखो, क्या पुरुष को भी कहीं जनने की पीड़ा उठती है? फिर क्या कारण है कि सब पुरुष जच्चा के समान अपनी अपनी कमर अपने हाथों से दबाए हुए दिखाई पड़ते हैं? क्यों सब के मुख पीले पड़ गए हैं? हाय, हाय, वह दिन क्या ही भारी होगा! उसके समान और कोई दिन नहीं; वह याकूब के संकट का समय होगा; परन्तु वह उस से भी छुड़ाया जाएगा। सेनाओं के यहोवा की यह वाणी है… यिर्म 30:6-9

हमें उद्धार के मूल्य को समझना और किसी भी संकट और पीड़ा से उबरने के लिए दृढ़ विश्वास रखना चाहिए। जैसे याकूब परमेश्वर की आशीष में अपना घर वापस गया, वैसे हमें भी किसी भी प्रकार की पीड़ा और संकट आने पर भी अंत तक अपना विश्वास बनाए रखकर और धीरज धरकर परमेश्वर की आशीष में अपने स्वर्गीय घर वापस जाना चाहिए।

फसह के जरिए परमेश्वर ने सिय्योन की संतानों को प्रतिज्ञा का चिह्न दिया है। जैसे परमेश्वर ने अपनी प्रतिज्ञा का चिह्न यानी फसह के जरिए इस्राएलियों को आने वाली विपत्ति के लिए तैयार कराया था, परमेश्वर इस युग में भी फसह के जरिए हमें विपत्तियों से बचने देते हैं। भले ही पूरी दुनिया में विपत्तियां आएं और हमारे निकट हजार और हमारी दाहिनी ओर दस हजार गिरें, परमेश्वर सारी विपत्तियों को हमारे निकट आने से रोकेंगे(भज 91:7-16)। परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की है कि वह हमारे भविष्य को सुरक्षित रखेंगे और हमारी रक्षा करेंगे। आइए हम, अपने मन की गहराई में इस अनुग्रहपूर्ण वचन को उत्कीर्ण करें और परमेश्वर की प्रतिज्ञा में रहते हुए सदा सर्वदा परमेश्वर की महिमा और स्तुति करें।