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परमेश्वर के करीब जाकर

सियोल, कोरिया से ली प्यंग ह्वा

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जब मैं माध्यमिक स्कूल की पहली कक्षा में था, मैंने सिय्योन में गहराई से बाइबल सीखा। वास्तव में, जब मैं छोटा था, मैंने अपने परिवार के साथ चर्च जाना शुरू कर दिया था, लेकिन वह पहली बार था कि मैंने गंभीरता से परमेश्वर के वचनों का अध्ययन किया।

मुझे हमेशा इस बात पर गर्व था कि भले ही मैं उम्र में छोटा हूं, मैं कुछ हद तक बाइबल जानता हूं। लेकिन, बाइबल की भविष्यवाणियों और उनकी पूर्णता ने जो मैंने उस दिन देखा था, मुझे ऐसा महसूस कराया जैसे मैंने कभी भी बाइबल नहीं पढ़ा हो। बाइबल उन सबूतों से भरी थी जिनसे मैं इनकार नहीं कर सका, और परमेश्वर वास्तव में मौजूद थे।

मैं बहुत खुश था कि मुझे बाइबल और परमेश्वर पर पूरी तरह से विश्वास हुआ, इसलिए मैंने परमेश्वर को धन्यवाद का पत्र लिखा।

‘परमेश्वर, धन्यवाद! आज मुझे कई चीजों का एहसूस हुआ। कृपया, अब से मुझे हर समय आपका पालन करने और आप पर निर्भर करने दीजिए।’

तब से, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना करने की आदत बनाई। प्रत्येक दिन के अंत में परमेश्वर को चढ़ाने की प्रार्थना, परमेश्वर को चढ़ाने का एक पत्र था, और यह एक डायरी थी जो मुझे खुद के भीतर झांककर देखते हुए पश्चाताप करने देता था। मैं परमेश्वर को अपनी परेशानियों के बारे में बिना हिचकिचाहट के खुलकर बता सका जिसके बारे में मैं अपने दोस्तों या माता-पिता को नहीं बता सकता था। मुझे ऐसा लगा कि परमेश्वर जो पहले बहुत दूर लग रहे थे, मेरे करीब आए हैं।

एक दिन, मैंने अपने दोस्तों को चर्च में आमंत्रित किया, जिनके पास हमारे चर्च के बारे में गलतफहमी थी। उस दिन भी, यह उम्मीद करते हुए कि वे अपनी गलतफहमी दूर करके सत्य का एहसास करें, मैंने उत्सुकता से परमेश्वर से प्रार्थना की। परमेश्वर ने कई दिनों बाद मेरी प्रार्थना का उत्तर दिया। मेरे दो दोस्तों ने, जिन्होंने हमारे चर्च का दौरा किया, अन्य दोस्तों को वचन जो उन्होंने चर्च में सुना था, अच्छे से समझा दिया। उनके कारण, मेरे अन्य दोस्तों ने कहा, “मैं भी एक बार तुम्हारे चर्च में आऊंगा।” और वे चर्च में आए और उन्होंने पुष्टि की कि चर्च ऑफ गॉड एक सच्चा चर्च है जो बाइबल की शिक्षाओं का पालन करता है। उनमें से एक ने सत्य को महसूस किया और नए जीवन की आशीष प्राप्त की। मैं सच में परमेश्वर के प्रति आभारी था।

एक युवा वयस्क बनने के बाद भी मैंने प्रार्थना के द्वारा परमेश्वर के साथ चलना जारी रखा। मुझे जिसके पास सुसमाचार का नबी बनने का सपना था, परमेश्वर के करीब जाने और मेरे विश्वास के दृष्टिकोण को विस्तृत करने का अवसर दिया गया था। वह फिलीपींस में शॉर्ट टर्म मिशन था। मैं अपने स्वर्गीय परिवार के सदस्यों के साथ जिनके पास एक ही लक्ष्य था, उम्मीदों से भरे मन से फिलीपींस में पहुंचा। जब मैं क्वेज़ोन सिटी में पहुंचा, तो अत्यधिक गर्मी मेरा स्वागत कर रही थी। धूप इतना तेज थी कि यदि मैं छतरी का उपयोग न करूं, तो चलना और आंखें खोलना भी मुश्किल था। यह कुछ दिनों के लिए तो सहनीय था, लेकिन दो हफ्तों के बाद, मेरी शारीरिक ताकत खत्म हो गई, इसलिए मैंने अपनी मानसिक शक्ति के द्वारा हर दिन सहन किया था।

लेकिन, स्थानीय सदस्यों का जोश गर्मी से भी गर्म था। कुछ सदस्य रात में काम करने के बाद थोड़ा आराम करके प्रचार करते थे। कुछ सदस्य भाइयों और बहनों की देखभाल करने के लिए चिलचिलाती धूप में एक घंटे से अधिक समय चलते थे। उनका विश्वास भट्ठी से भी गर्म था। उन स्वर्गीय परिवार के सदस्यों को देखकर, मैं कुएं में एक मेंढक की तरह लग रहा था जो एक पल के लिए भी गर्मी सहन नहीं कर सका। जब मैंने सोचा कि दुनिया भर में कितने सदस्य होंगे जो इस तरह विश्वास से भरे हैं, तो आत्मिक तनाव खड़ा हो गया और परमेश्वर के प्रति प्रार्थना अपने आप निकल आईं। स्वर्गीय परिवार के सदस्यों को देखकर, मुझे फिर से शक्ति मिली और मैंने ईमानदारी से प्रार्थना की। चूंकि वहां भाषा की बाधा थी और मेरा शरीर भी थका हुआ था, इसलिए केवल परमेश्वर पर भरोसा करने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं था।

चूंकि मैं कठिन और निराशाजनक समय से गुजरा, इसलिए फल फलने की खुशी बहुत बड़ी थी। जब लोग जो सत्य को न जानते हुए भटक रहे थे, नम्र मेम्ने की तरह पश्चाताप करके परमेश्वर की बांहों में आए, तो मैंने अपने जीवन की सबसे बड़ी खुशी को महसूस किया । एक महीने के लिए फिलीपींस में शॉर्ट टर्म मिशन को समाप्त करने के बाद, मैं कोरिया वापस आया और मैंने अगले शॉर्ट टर्म मिशन की योजना बनाई। फिलीपींस में रहते हुए, एक नबी बनने का मेरा सपना और अधिक दृढ़ हो गया, और इसके लिए, मैं सुसमाचार में और अधिक अनुभव करना चाहता था। मेरा दूसरा गंतव्य सैन जोस था, जो क्वेज़ोन सिटी से लगभग छह घंटे की दूरी पर था। वहां भी, मणियों के समान हमारे स्वर्गीय परिवार के सदस्य उत्सुकता से उद्धार के शुभ समाचार का इंतजार कर रहे थे।

एक दिन, मैं विश्वविद्यालय में एक छात्र को परमेश्वर का वचन प्रचार कर रहा था। उस छात्र का भाई उसे कुछ देने के लिए आया था, और मुझे उसे वचन सुनाए बिना छोड़ना बुरा लगा इसलिए मैंने उसे भी वचन का प्रचार किया। मैंने उसे बाइबल के माध्यम से परमेश्वर की आज्ञाओं और मनुष्यों की विधियों के बारे में समझाया। वह आश्चर्यचकित हुआ, और उसने और अधिक बाइबल का अध्ययन करना चाहा। कुछ दिनों बाद, उसने उद्धार की आशीष प्राप्त की।

जैसे-जैसे एक-एक करके नए सदस्यों की संख्या बढ़ती गई, खाना खाते समय भी और सोने से पहले भी वे लगातार मेरे दिमाग में आने लगे। बाइबल के बहुत से वचन थे जो मैं उन्हें बताना चाहता था, लेकिन भाषा की बाधा के कारण, मैं उन्हें पूरी तरह से वचन नहीं बता सका। इससे मैं व्याकुल हो गया और चिंता करने लगा कि शायद वे सत्य को अच्छी तरह से महसूस न करेंगे। इसलिए जब मैंने उन्हें सब्त के दिन में देखा, तो मैं बहुत खुश था। मैंने इस बात को गहराई से महसूस हुआ कि एक आत्मा कितनी अनमोल है।

फिलीपींस में छह महीनों तक प्रचार करने के बाद वापस लौटते समय, मैंने इस बात पर गंभीरता से विचार किया कि भाषा की बाधा, अलग संस्कृति और खराब वातावरण होने के बावजूद भी कोरिया में सुसमाचार के परिणाम की तुलना में फिलीपींस में सुसमाचार का बेहतर परिणाम क्यों आया। मैंने बस सोचा कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि मैं विदेश में था, और फिलीपींस में परमेश्वर पर विश्वास करने वाले बहुत से लोग थे। लेकिन, यह जवाब नहीं था। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि कोरिया में मेरी मानसिकता और फिलीपींस में मेरी मानसिकता अलग थी। फिलीपींस में, सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक मेरा पूरा दिन आत्मिक चीजों से भरा था। कोरिया में वापस जाने के दिन तक, मैंने एक और आत्मा को जगाने के लिए बाइबल पढ़ा और स्वर्गीय परिवार के सदस्यों की देखभाल करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी।

लेकिन, मैंने कोरिया में ऐसा नहीं किया था। यह सोचकर कि मैं कभी भी प्रचार कर सकता हूं, मैंने अपना समय बर्बाद किया। मुझे अपने आप पर शर्म महसूस हुआ कि भले ही मेरा सपना एक नबी बनना था, मैंने आलसी जीवन जिया।

जैसा कि मैंने फिलीपींस में किया था, यदि मैं समय बर्बाद किए बिना सुसमाचार के कार्य में खुद को समर्पित करूं, तो चाहे मैं विदेश में हो या कोरिया में, मैं बहुत से अच्छे फल पैदा कर सकूंगा। इस नए संकल्प के साथ, मैंने एक नबी बनने का मार्ग तैयार करते हुए सुसमाचार के कार्य पर ध्यान केंद्रित किया। उस बीच परमेश्वर ने मुझे एक भाई की सिय्योन में अगुआई करने की अनुमति दी। जब भाई सड़क पर चल रहा था, उसने सत्य के वचन सुने और हर दिन चर्च में आकर बाइबल का अध्ययन करना जारी रखा। यद्यपि वह सत्य प्राप्त करने के तुरंत बाद चर्च से दूर स्थानांतरित हो गया, फिर भी वह एक आराधना भी छोड़े बिना हर आराधना को मना रहा है। “मैं परमेश्वर का आभारी हूं कि मैं परमेश्वर के अनुग्रह से आपसे मिला था और स्वर्ग की आशा कर सकता हूं।” भाई की इस हार्दिक बात को मैं कभी नहीं भूल सकूंगा।

अब, मैं सेना में भर्ती होने वाला हूं। सैन्य जीवन के द्वारा, मेरा विश्वास गहरा और व्यापक हो जाएगा जैसे मेरी विदेशी मिशन यात्रा के द्वारा हुआ था। सैन्य जीवन में विश्वासयोग्य रहते हुए, लगातार प्रार्थना करने और यत्न से परमेश्वर के वचनों का अध्ययन करने के द्वारा मैं परमेश्वर से दूर न होने के लिए हर संभव प्रयास करूंगा। मैं अच्छे कर्यों के साथ परमेश्वर की महिमा प्रकट करूंगा और स्वर्गीय परिवार के सदस्यों को खोजने में लापरवाही नहीं बरतूंगा।

मैं विश्वास करता हूं कि यदि मैं परमेश्वर पर भरोसा करके परमेश्वर की इच्छा का पालन करूं, तो मैं कठिन परिस्थितियों और वातावरण में भी अपना लक्ष्य पूरा कर सकूंगा। चूंकि परमेश्वर ने लंबे समय तक कई प्रक्रियाओं के द्वारा मुझे विकसित किया है, मैं एक नबी बनने की आशा करता हूं जो सेना में और भविष्य में विश्व सुसमाचार के स्थल में भी अच्छे से मिशन को पूरा करता है।