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संतानोचित कर्तव्य प्रेम से शुरू होता है

बूढ़े माता-पिता की देखभाल करने पर संघर्ष एक सामाजिक समस्या बन रहा है। भले ही समय बदलता रहता है, संतानोचित कर्तव्य हमारा नैतिक नियम है।

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यहां तक कि छोटे बच्चों को भी पता है कि उन्हें अपने माता-पिता के प्रति अपना संतानोचित कर्तव्य करना चाहिए। हालांकि, वयस्कों के लिए भी इसकी 100% तामील करना आसान नहीं है, चाहे वे ऐसे पद पर खड़े हैं जहां वे अपने बच्चों को इसके बारे में सिखाते हैं। ऐसा कहा जाता है कि एक बार आपके पास बच्चे होने पर आप समझ सकते हैं कि आपके माता-पिता ने आपके लिए कितनी कड़ी मेहनत की है और उन्होंने आपको कितना प्रेम दिया है, लेकिन कुछ जानने और उसे अभ्यास में लाने के बीच एक बड़ा अंतर है। ऐसे बहाने बनाते हुए अधिकांश लोग अपने संतानोचित कर्तव्य को भूला देता है कि वे अपने माता-पिता की तुलना में अपने बच्चों की अधिक देखभाल करने के लिए मजबूर हैं, या वे काम करने में व्यस्त हैं, या वे दूर रहते हैं, या उनके अन्य भाई-बहन उनके माता-पिता की अच्छी देखभाल कर रहे हैं।

लेकिन माता-पिताओं के लिए, अपने बच्चे ही सब कुछ हैं। उनका प्रेम निस्वार्थ होता है। वे अपने बच्चों से कोई चीज पाने की चाह नहीं रखते, बल्कि वे लगातार उन्हें देते हैं और उन्हें अधिक न दे सकने के कारण दुखी रहते हैं। हालांकि, हम उन लोगों के बारे में बहुत सी खबरें सुनते हैं जो अपने माता-पिता के प्रेम को पूरी तरह से ठुकरा देते हैं और अपने माता-पिता के खिलाफ अनैतिक अपराध करते हैं। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि क्यों लोग कहते हैं, “यदि आप कम से कम सिर्फ संतानोचित कर्तव्य करने का नाटक करते हैं तो यह काफी अच्छा होगा।”

कंगारू जैसे लोगों की संख्या बढ़ती है, जबकि अपने माता-पिता को समर्थन देने वाले लोगों की संख्या कम हो जाती है

आठ महीने के होने तक कंगारू के बच्चे अपनी माताओं की पेट की थैली में बड़े होते हैं। अन्य जानवरों की तुलना में, वे काफी लंबे समय तक अपनी माताओं पर निर्भर रहते हैं। ऐसे कुछ लोग हैं जो कंगारू की तरह हैं। भले ही वे वयस्क हो गए हैं, वे अपने माता-पिता से जेब खर्च प्राप्त करते हैं या स्वतंत्र होने की उम्र गुजरने के बाद भी वे आर्थिक रूप से अपने माता-पिता पर निर्भर रहते हैं। ऐसे माता-पिता, अभी भी अपने बच्चों की देखभाल कर रहे हैं भले ही वे अपने बच्चों से सहारा प्राप्त करते हुए एक आरामदायक जीवन जीने की उम्र तक पहुंच गए हैं। कोरिया, जापान, और यहां तक कि अमेरिका में भी जहां अधिकांश बच्चे हाईस्कूल से ग्रेजुएट होने के बाद स्वतंत्र होकर जीते हैं ऐसे लोगों की संख्या बढ़ रही है।

इसके विपरीत, अपने बुजुर्ग माता-पिता को समर्थन देने वाले वयस्क बच्चों की संख्या घट रही है। 2013 में, जॉब कोरिया नामक एक कंपनी ने 461 लोगों का सर्वेक्षण किया जो 20 और 30 आयु के नौकरी करने वाले लोग थे। सर्वेक्षण उनके माता-पिता को समर्थन देने की उनकी योजना के बारे में था। उनमें से 33.2 % लोगों ने जवाब दिया कि वे आर्थिक रूप से अपने माता-पिता को समर्थन देने की योजना नहीं बना रहे थे। पहला कारण यह था कि उनके पास खुद के बच्चे और परिवार की देखभाल करने के लिए भी पर्याप्त पैसे नहीं थे; दूसरा कारण यह था कि उनके माता-पिताओं ने पहले से ही अपने लिए बचत खाते में पैसा जमा कर रखा है; और अन्य कारण यह थे कि माता-पिता और बच्चों के बीच भी आर्थिक मामलों को लाना नहीं चाहिए और उन्हें भी सेवानिवृत्ति के बाद अपने जीवन के लिए तैयारी करनी पड़ती है।

कोरिया विकास संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार, 1998 में 89.9% कोरियाई लोगों ने सोचा कि परिवार को अपने बुजुर्ग माता-पिता को सहारा देना चाहिए, लेकिन 2014 में यह दर 31.7% तक गिर गई; और 1998 में 8.1% कोरियाई लोगों ने सोचा कि उनके बुजुर्ग माता-पिताओं को खुद अपनी जीविका चलाने की जिम्मेदारी उठानी चाहिए; लेकिन 2014 में यह दर 16.6% तक बढ़ गई। अधिक से अधिक लोग इस विचार से सहमत हैं कि समाज को उनके माता-पिताओं को सहारा देने की आवश्यकता है।

हम ‘100 वर्षीय आयु के युग’ में जी रहे हैं, और ऐसा कहा जाता है कि जीवन पचास वर्ष की उम्र में शुरू होता है। हालांकि, बुजुर्ग माता-पिता अपने बुढ़ापे में वयस्क बच्चों पर अब और निर्भर नहीं रह सकते। बच्चों के इस वादे पर विश्वास करते हुए कि वे उनकी देखभाल करेंगे, कुछ माता-पिता अपनी सारी संपत्ति अपने बच्चों को दे देते हैं, लेकिन वह वादा निभाया नहीं जाता और वे अपने बच्चों को फिर कभी नहीं देख सकते। और माता-पिता की देखभाल करने की बात पर अक्सर भाई-बहनें लड़ते रहते हैं। चूंकि ऐसी चीजें होती हैं, बहुत से वरिष्ठ नागरिक कहते हैं कि अपने बच्चों पर बोझ बनने के बजाय अकेले रहना बेहतर है, और इसी के कारण कई बुजुर्ग लोग अकेले मर जाते हैं।

संतानोचित कर्तव्य के लिए कुछ बड़ी बात की जरूरत नहीं है

जैसा कि कहा जाता है, “अधिक संतानों की एक मां का दिन कभी भी शांतिपूर्ण नहीं होता,” माता-पिता जिनके पास बहुत सारे बच्चे हैं, वे कभी भी चिंता करना बंद नहीं कर सकते। इसका मतलब यह नहीं है कि जिन माता-पिताओं के पास एक बच्चा है उन्हें कोई चिंता नहीं है। अपने बच्चों के लिए माता-पिता की चिंता गर्भावस्था के क्षण से ही शुरू होती है; माता-पिता चिंता करते हैं कि क्या गर्भ में शिशु स्वस्थ रूप से बढ़ रहा है। जब बच्चे का जन्म होता है, तब वे चिंता करते हैं कि क्या उसके साथ सब कुछ ठीक है। जब बच्चा स्कूल जाता है, तो वे चिंता करते हैं कि क्या वह अपने दोस्तों के साथ मिलजुलकर रह रहा है और क्या वह अपने शिक्षक की बात सुन रहा है। जब बच्चे की किशोरावस्था शुरू होती है, तो वे चिंता करते हैं कि कहीं वह गलत मार्ग पर भटक न जाए। जब बच्चे का स्कूल से ग्रेजुएट होता है, तो वे चिंता करते हैं कि क्या वह अच्छी नौकरी प्राप्त कर सकता है। जब बच्चे की शादी करने की उम्र हो जाती है, वे चिंता करते हैं कि क्या उसे एक अच्छा जीवनसाथी मिल सकता है। जब बच्चे की शादी हो जाती है, तो वे चिंता करते हैं कि क्या उसे शादीशुदा जिंदगी में कोई समस्या तो नहीं है। माता-पिता लगातार अपने बच्चों के बारे में चिंता करते हैं, और जब वे बूढ़े हो जाते हैं, वे इस बात की चिंता करते हैं कि उनके बच्चे शायद उन्हें छोड़ देंगे, जिस तरह बच्चों को अपना शरीर देने के बाद घोंघे के सिर्फ खाली खोल ही रह जाते हैं।

माता-पिता अक्सर अपने बच्चों से झूठ बोलते हैं: “मुझे पता है कि तुम व्यस्त हो, तो तुम्हें आने की जरूरत नहीं है।” या “यहां सब कुछ ठीक है। इसलिए मेरी चिंता मत करो,” या “मुझे कुछ नहीं चाहिए।” वे इस बात को छिपाते हैं कि वे अपने बच्चों को कितना देखना चाहते हैं, उनके शरीर में कितना दर्द होता है, और उन्हें कितनी तकलीफ होती है। लेकिन, बच्चे माता-पिता के सफेद झूठ पर विश्वास कर लेते हैं। वे नहीं जानते कि माता-पिता वास्तव में क्या कहना चाहते हैं, “मुझे तुम्हारी याद आती है। कृपया हमसे मिलने आओ,” “मेरे पूरे शरीर में दर्द होता है, इसलिए मेरा मन भी दुखी है,” और “मेरे पास पर्याप्त पैसे नहीं है, इसलिए मुझे अपने खर्च पर ध्यान देना पड़ता है।” इस बात को जाने बिना, बच्चे गलत समझते हैं कि यदि वे अपने माता-पिता को अपना सफल जीवन दिखाएं तो वे अपने संतानोचित कर्तव्य को पूरा कर सकते हैं।

संतानोचित कर्तव्य कोई बड़ी बात की तरह लगता है। लेकिन, वास्तव में, यह बिल्कुल भी मुश्किल नहीं है। आप इस तरह उसे अभ्यास में ला सकते हैं कि जितनी बार संभव हो सके उतनी बार अपने माता-पिता को फोन करना, उन्हें बताना कि आप उनसे प्रेम करते हैं, किसी सामान्य दिन पर उन्हें मिलने के लिए जाकर उनके साथ रात भर रहना, और उनके खुरदरे हाथों को थामना। वे सभी करने के लिए साधारण बातें हैं। जब लोग बूढ़े हो जाते हैं, तो उन्हें आसानी से अकेलापन और बेकार महसूस होने लगता है। इसलिए, बुजुर्ग माता-पिता को केवल आराम करने के लिए कहने के बजाय उन्हें कुछ काम करने का मौका देना बेहतर है। कुछ बच्चे कहते हैं, “मैं चाहता हूं कि मेरे माता-पिता मेरे मामलों में ज्यादा शामिल न हों। वे बहुत ताक-झांक करते हैं।” लेकिन, यह एक गलत विचार है। कभी-कभी, अपने माता-पिता को परेशान करें। उन्हें आपके लिए कुछ पकाने के लिए कहें या आपके खाना का स्वाद चखने के लिए कहें, या अपने पारिवारिक मामले के बारे में उनकी राय पूछें। ऐसा करके उन्हें महसूस कराएं कि वे अभी भी अपने परिवार के लिए कुछ कर सकते हैं।

संतानोचित कर्तव्य संतानोचित प्रेम पर आधारित होना चाहिए

इसके अनुसार कि वह संतानोचित प्रेम पर आधारित है या नहीं, एक ही प्रकार का कार्य भी संतानोचित या माता-पिता के प्रति कर्तव्यहीन माना जा सकता है। यदि आपके मन में संतानोचित प्रेम नहीं है और केवल ऐसा सोचें कि आपके माता-पिता को सहारा देना ही संतानोचित कर्तव्य को पूरा करने का तरीका है, तो इसमें और मवेशियों को पालने में क्या अंतर है?

पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास रहने वाले एक प्रभावशाली चीनी दार्शनिक, जेंगजी ने कहा, “जब कोई बेटा अपने बूढ़े माता-पिता का ख्याल रखता है, तो उसे उनके हृदय, कानों, और आंखों को प्रसंन करना चाहिए, उनकी इच्छा के विरुद्ध नहीं जाना चाहिए, उन्हें बिस्तर पर आरामदायक महसूस कराना चाहिए, और पूरे दिल से बनाया गया भोजन उन्हें परोसना चाहिए। इस कारण से, उसे उन चीजों से प्रेम करना चाहिए जिससे अपने माता-पिता प्रेम करते हैं, और उन चीजों का सम्मान करना चाहिए जिसका अपने माता-पिता सम्मान करते हैं।” एक और प्राचीन चीनी दार्शनिक, झुआंग झोउ ने कहा, “आदर के चलते संतानोचित कर्तव्य करना आसान है, लेकिन प्रेम के चलते संतानोचित कर्तव्य करना मुश्किल है।” माता-पिता के प्रति प्रेम संतानोचित कर्तव्य का मूल है। यदि आप अपने माता-पिता से प्रेम करते हैं, तो आपकी उनमें रुचि बनी रहेगी, और यदि आपकी उनमें रूचि रहेगी, तो आपको पता चलेगा कि उन्हें क्या चाहिए और उन्हें कैसे संतुष्ट किया जाता है। चाहे एक बच्चा कितना ही अपने माता-पिता से प्रेम क्यों न करे, उसका प्रेम उसके माता-पिता के प्रेम के पास भी नहीं पहुंच सकता। इसलिए, बच्चों को अपने माता-पिता को पूरी तरह से प्रेम करना चाहिए।

एक कहावत है, “माता-पिता के गुजर जाने के बाद पछतावा न करें। जब वे जीवित हैं, अपना संतानोचित कर्तव्य पूरा करें। तब स्वर्ग से आप पर आशीष उतर आएगी, और आपके बच्चे आपके लिए संतानोचित कर्तव्य पूरा करेंगे।” लोग जानते हैं कि जब उनके माता-पिता जीवित हैं, उन्हें संतानोचित कर्तव्य पूरा करना चाहिए, लेकिन अपने माता-पिता गुजर जाने के बाद ही वे इसे अपने दिल की गहराई से महसूस करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि जब माता-पिता गुजर जाते हैं तो माता-पिता के प्रति कर्तव्यहीन बेटे भी संतानोचित हो जाते हैं।

ऐसा कौन होगा जो अपने हाथों और पैरों में छाले पड़ने तक हमारा ख्याल रखते हुए तकलीफ उठाते हैं? हम उस प्रेम के बिना कैसे बढ़ सकते थे? अब बहुत देर होने से पहले उस प्रेम का बदला चुकाने का समय है।