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एक आत्मा की अगुवाई करने तक

लीमा, पेरू से मारिया क्लेओफे कुचिलिओ गुटिएरेज

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सत्य को ग्रहण करने से पहले, मैंने बहुत बार परमेश्वर पर विश्वास करने की कोशिश की, परन्तु मुझे विश्वास नहीं आया।

मैंने सोचा, ‘एक धार्मिक विश्वास रखना शायद मेरी चीज नहीं होगी। क्या मैं मरने के बाद ही परमेश्वर से मिल सकूंगी?’

मुझमें तरह–तरह के विचारों की बाढ़ आई, और मेरे मन पर निराशा की छाया पड़ी। हर दिन मैं खुद से पूछती थी, “इस जीवन के समाप्त होने पर मेरे साथ क्या होगा? मैं कहां जाऊंगी?” मैं अपना सारा समय और सारी ऊर्जा पढ़ाई में लगाते हुए सोचती थी कि, ‘यही वह है जो मुझे करने की जरूरत है,’ और खुद को सांत्वना देती थी। लेकिन हमेशा मुझ पर खालीपन हावी रहता था, और मैं बिल्कुल भी खुश नहीं होती थी। जब मैं अपने भविष्य की योजना बनाती थी, तब मैं यह सोचने के लिए मजबूर होती थी कि सब कुछ व्यर्थ है। मैं कुछ ऐसी चीज को खोजना चाहती थी जिससे मुझे खुशी मिल सकती थी।

इसी बीच एक दिन मुझे लेक्चर से पहले तीन घंटे आराम करने की फुर्सत मिली। मैं टहलने के लिए बाहर निकली और मैं उधर गई जहां मेरे कदम मुझे ले गए। मैंने कुछ लोगों को बाइबल के वचनों का प्रचार करते हुए देखा। उनमें से एक ने मेरे पास आकर मुझे माता परमेश्वर के बारे में बताया। पहले, मुझे उसमें अधिक दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन सभी वचन जो उन्होंने मुझे दिखाए, आपस में सुसंगत और स्पष्ट थे। मैं बाइबल की पक्की गवाहियों से प्रभावित हो गई। दो घंटों से अधिक समय तक मैंने वचन सुने और नए जीवन की आशीष प्राप्त की। उस समय मुझे कुछ पता नहीं था कि मेरे साथ क्या हो रहा है, परन्तु मैं खुश थी और मैंने कहा, “मुझे लगता है कि अब मुझे जीवन का एक अर्थ मिला है।”

उस दिन के बाद मेरे जीवन की एक नई यात्रा शुरू हुई। पिता और माता को महसूस करने के बाद मैं प्रचार में भाग लेने लगी। लेकिन भले ही लोग बाइबल में लिखे वचनों को स्पष्ट रूप से देखते थे, फिर भी वे उन्हें समझना नहीं चाहते थे और मेरे सभी दोस्त मुझ पर हंसते थे। इस तरह की चीजें जब मेरे साथ लगातार हुईं, तब मैं नाराज हो गई। मैंने उस बहन को जिसने मुझे पहले प्रचार किया था, उन कठिनाइयों के बारे में बताया जिनसे मैं गुजर रही थी। तब उसने कहा कि एक आत्मा की अगुवाई करने तक बहुत से आंसुओं, पसीनों और बलिदान की जरूरत होती है। मैं यह सुनकर अत्यंत प्रभावित हुई कि वह भी उस दौरान मेरी अगुवाई कर सकी थी जब उसे कोई फल नहीं मिला था और इससे वह बहुत बेचैन रही थी। लेकिन उसकी बात सुनते हुए भी मैंने महसूस नहीं किया कि सुसमाचार का सारा चमत्कार परमेश्वर की सामथ्र्य से किया जाता है।

सिय्योन में मैंने बड़ी होने के बावजूद बचकाना व्यवहार किया। मुझे सिय्योन के सदस्यों से अधिक प्रेम और सहायता मिली। जबसे मैं सुसमाचार का कार्य करने का यत्न करने लगी, तबसे मेरा विश्वास भी बढ़ता गया। लेकिन मैं चिंतित थी क्योंकि फल उत्पन्न करना बहुत कठिन था। वे आत्माएं भी जिनकी मैंने बड़ी मुश्किल से अगुवाई की थी, लंबे समय तक सिय्योन में नहीं रहीं।

आखिरकार, सिय्योन का निर्माण मेरे घर के नजदीक किया गया। मुझे नए सिय्योन की अगुवाई करने का मिशन सौंपने के लिए मैं पिता और माता के प्रति आभारी थी। सिय्योन के सभी सदस्यों ने पूरे उत्साह के साथ वचन का प्रचार किया। लेकिन फिर भी हमारे प्रयास और जोश ने अच्छा परिणाम हासिल नहीं किया। हमने एक दूसरे को यह कहकर प्रोत्साहित किया, “आइए हम पिता और माता के द्वारा तैयार की गई आशीषों को सोचते हुए अन्त तक कभी हार न मानें और हौसला रखें!” परन्तु कई महीने बीतने के बाद भी किसी भी आत्मा की उद्धार के मार्ग की ओर अगुवाई नहीं की गई थी।

इस मुश्किल दौर से गुजरते हुए मैं पिता और माता का बलिदान थोड़ा–थोड़ा करके महसूस करने लगी। और मैंने यह भी महसूस किया कि मैं कुछ महत्वपूर्ण चीज को भूल गई हूं। वह प्रेम था। मैंने सोचा था कि परमेश्वर के नियमों का पालन करना और सत्य का प्रचार करना मेरे लिए काफी होगा, लेकिन मैं सुसमाचार के कार्य में सबसे महत्वपूर्ण चीज को भूल गई थी। मुझे केवल फलों की लालसा करने वाले मन के साथ नहीं, बल्कि एक और आत्मा को बचाने के लिए व्याकुल हुई माता के मन के साथ सत्य का प्रचार करना चाहिए।

उसके बाद, बड़ी उत्सुकता से यह आशा करते हुए कि जिन्होंने अब तक सुसमाचार नहीं सुना है, वे जल्दी सत्य सुनकर बचाए जाएंगे, हमने सुसमाचार का प्रचार किया। इसके साथ ही हमने परमेश्वर से प्रार्थना की कि वह हमें परमेश्वर को ढूंढ़ने वाली सुन्दर आत्माओं से मिलवाएं।

इसी बीच एक दिन, हम सिय्योन के पास एक पार्क में एक व्यक्ति से मिले जो अपनी आत्मा की चिंता करते हुए परमेश्वर को ढूंढ़ रही थी। बाइबल में अद्भुत भविष्यवाणियों की पुष्टि करने के बाद, उसने वचन का अध्ययन करने के लिए अगले सब्त के दिन फिर से मिलने का वादा किया।

और धन्यवाद की बात घटित हुई; सब्त के दिन दो आत्माएं जो कई महीनों से वचन का अध्ययन कर रही थीं, उद्धार की आशीष प्राप्त करने के लिए सिय्योन में आईं। उन स्वर्गीय परिवार वालों को देखते हुए जिनसे हम लंबे समय तक धीरज रखने के बाद आखिर में मिले थे, मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा और मैं इतनी खुश थी कि मुझे यह सच नहीं लगा। जब दूसरी व्यक्ति से मिलने का निर्धारित समय हो गया, तब उससे मिलने के लिए जिससे हम कुछ दिनों पहले मिले थे, हम बाहर पार्क में गए। और वह वहां थी और हमारा इंतजार कर रही थी। वह सिय्योन में आई और उसने आराधना मनाई। बाइबल का अध्ययन करने के बाद, वह धन्यवाद के साथ स्वर्गीय पिता और माता की संतान बनी। एक ही दिन में परमेश्वर ने हमें तीन सुंदर आत्माओं के फल प्रदान किए। मैं उस दिन को कभी भूल नहीं सकती। वह एक ऐसा दिन था जब मैं महसूस कर सकी कि उद्धार की ओर एक आत्मा की अगुवाई करना ही सच्ची खुशी है।

बहन जिससे हम पार्क में मिले थे, उसने जल्दी परमेश्वर के प्रेम और बलिदान को महसूस किया और प्रचार समारोह में भाग लेने की कोशिश की। उसने लगातार बाइबल का अध्ययन भी किया और अपने अंदर के डर को दूर किया और फिर निडरता से उपदेश प्रचार का अभ्यास करना शुरू किया। उसके माता–पिता ने उसके विश्वास के विरुद्ध जाकर उसे कुछ परेशानियां दीं, परन्तु दिन प्रतिदिन उसका विश्वास बढ़ता गया और उसने आनन्द से भरकर कठिनाइयों को पार किया।

पहले दिन जब हम उस बहन के साथ प्रचार करने निकले, हम एक दम्पति से मिले। जब हमने उन्हें बाइबल में माता परमेश्वर के बारे में वचन दिखाए, तब वे चकित हुए।

“सच में माता परमेश्वर हैं!”

बहन को ऊंची और साहस भरी आवाज से प्रचार करते हुए देखकर मैं भी प्रेरित हो गई। जैसे ही उस दम्पति ने आखिरकार पवित्र आत्मा और दुल्हिन को पहचाना जो इस युग में उद्धारकर्ता हैं, और खुशी से फसह के पर्व को स्वीकार किया जो हमें अनन्त जीवन प्रदान करता है, उन्होंने तुरन्त उद्धार की आशीष प्राप्त की। उस समय के बाद, वे सब्त के दिनों को मनाते हुए बाइबल का अध्ययन कर रहे हैं। मैं सच में आशा करती हूं कि भाई–बहनें जिन्होंने परमेश्वर की इच्छा में नया जीवन प्राप्त किया है, सुंदर विश्वास में बढ़ते जाएं और पिता और माता के असीम प्रेम को महसूस करें।

अब मैंने अपने मन से समझा है कि एक आत्मा की अगुवाई करने के लिए क्यों अधिक आंसुओं, पसीनों और बलिदान की जरूरत होती है। मैंने यह भी महसूस किया है कि मुझे अपनी शक्ति पर नहीं, बल्कि परमेश्वर की शक्ति पर निर्भर होकर अपने भाई–बहनों को उन माता के व्याकुल मन से खोजना चाहिए जो मृत्यु की जंजीरों में जकड़ी अपनी संतानों को बचा रही हैं। मैं अपने पूरे हृदय से सुसमाचार का प्रचार करूंगी ताकि मैं पिता के आने के दिन पूरे जोर से यह कह सकूं, “मैंने सात अरब लोगों को प्रचार करने का अपना मिशन पूरा किया है!”