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सुसमाचार के सैनिक

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बाइबल में युद्ध का इतिहास बहुत बार लिखा गया है। युद्ध की हार–जीत इस पर निर्भर करती थी कि परमेश्वर इस्राएलियों के साथ था या नहीं। बाइबल में ऐसा उल्लेख क्यों किया गया है? यह हमें इसकी शिक्षा देता है कि हमें किस विश्वास और रवैए से आत्मिक युद्ध करना चाहिए।

परमेश्वर ने सुसमाचार के सैनिक के रूप में हमें बुलाया है। आइए हम जांच करें कि सुसमाचार के सैनिक के लिए किस मानसिक रवैए और तैयारी की आवश्यकता है, और इस समय सुसमाचार के सैनिक के रूप में शस्त्र–सज्जित करें।

सैनिक के चुनाव के लिए परमेश्वर का मानदण्ड

हमें गिदोन के समय के इतिहास में यह दृश्य मिलता है जिसमें परमेश्वर ने सैनिकों को चुना। इस्राएली मिद्यान के अधीन होकर गुलामी में रहते थे। उन्हें छुड़ाने के लिए, परमेश्वर ने गिदोन को बुलाया और सैनिकों का चयन किया। उस समय 32,000 पुरुषों ने सैनिक होना चाहा, पर सिर्फ 300 पुरुष ही चुने गए।

“… तब यहोवा ने गिदोन से कहा, “जो लोग तेरे साथ हैं वे मेरी दृष्टि में इतने अधिक हैं कि मैं मिद्यानियों को उनके हाथ में नहीं करूंगा। ऐसा न हो कि इस्राएल घमण्ड करके कहे, ‘मैंने अपनी ही शक्ति से छुटकारा पाया है।” इसलिए अब तू जाकर लोगों के सुनते हुए यह घोषणा कर, ‘जो कोई डर के मारे कांपता हो वह गिलाद पहाड़ से लौटकर चला जाए”।” अत: बाइस हज़ार लोग लौट गए, परन्तु दस हज़ार रह गए। तब यहोवा ने गिदोन से कहा, “अब भी लोग बहुत अधिक हैं, उन्हें सोते के पास नीचे ले चल, वहां मैं उन्हें तेरे लिए परखूँगा। … जिन्होंने मुंह में हाथ लगा कर चपड़ चपड़ करते हुए पानी पीया वे गिनती में तीन सौ निकले। परन्तु शेष लोगों ने पानी पीने के लिए घुटने टेके थे। और यहोवा ने गिदोन से कहा, “मैं इन तीन सौ चपड़ चपड़ करके पीने वालों के द्वारा तुम्हें छुड़ाऊँगा और मिद्यानियों को तुम्हारे हाथ में कर दूँगा। इसलिए शेष लोग अपने अपने घर को लौट जाएं।”…” न्या 7:1–8

उस समय मिद्यान के सैनिक, जिन्होंने इस्राएल से मुकाबला किया, 135,000 थे।(न्या 8:10) वे इतनी बड़ी संख्या में थे कि टिड्डी–दल से प्रतीत होते थे। ऐसा प्रतीत हुआ कि उन लोगों के पास इतने ऊंट थे, जितने समुद्र के किनारे बालू के कण।(न्या 7:12) परमेश्वर के 32,000 पुरुषों को कम करने से पहले भी, वे बहुत ही बड़ी सख्या में थे।

फिर भी परमेश्वर ने डर के मारे कांप रहे 22,000 पुरुषों को वापस लौटा दिया, क्योंकि परमेश्वर ने जाना कि अधिक व्यक्तियों के कारण इस्राएली अपनी शक्ति का घमण्ड करेंगे। परमेश्वर ने उन्हें ऐसी परिस्थिति दी, जिससे वे कभी जीत नहीं सकते थे, ताकि वे जान लें कि वे मनुष्य के युद्ध–कौशल या बहादुरी से नहीं, पर केवल परमेश्वर की सामर्थ्य से जीत सकते हैं।

यह कहते हुए कि ‘मैंने ही किया है”, गर्व करने वाला भी और डर के मारे कांपने वाला भी, परमेश्वर की दृष्टि में अयोग्य थे। क्योंकि वे ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते थे। वे उस परमेश्वर पर, जो सभी कार्यों का संचालन करता है, भरोसा नहीं रख पाते थे, और मनुष्य की शक्ति को परमेश्वर की शक्ति से और बड़ा मानते थे। इसी कारण वे परमेश्वर के सैनिक होने में अयोग्य ठहराए गए।

बाकी 10,000 पुरुषों के लिए भी परमेश्वर ने यह कहते हुए कि ‘अब भी लोग बहुत अधिक हैं”, दुबारा उनका इनकार किया। अंतत: परमेश्वर ने केवल 300 पुरुषों को चुन लिया जिन्होंने पानी पीने के लिए घुटने न टेके थे।

जब परमेश्वर अपने सैनिकों का चयन करता है, वह सबसे पहले लोगों के हृदय को जांचता है, और फिर उनके रवैए को देखता है। घमण्ड करने वाला, डरने वाला और किसी दिन घुटने टेकने वाला, सबको परमेश्वर ने लौटा दिया, और उसने ऐसे 300 पुरुषों को चुना जो अन्त तक घुटने न टेकेंगे। अंतत: परमेश्वर ने उनके द्वारा इस्राएलियों को मिद्यानियों के हाथ से छुड़ाया।

क्योंकि परमेश्वर उनके साथ था, विजय पहले से निश्चित थी। परमेश्वर के वचन के अनुसार, जब 300 सैनिकों ने हाथ में मशालें लिए हुए केवल तुरहियों को बजाया, तो मिद्यानी लोगों ने परस्पर एक दूसरे को तलवारों से मारा, जिसके द्वारा वे सब अपने आप नाश हो गए।(न्या 7:9–22)

दुख और विजय जो सुसमाचार के सैनिकों के लिए पहले से निश्चित की गई है

जब हम उस मानदण्ड को देखें जिससे परमेश्वर ने गिदोन के सैनिकों को चुना, तब हम जान सकेंगे कि हम सुसमाचार के सैनिक कैसे बन सकते हैं जिससे परमेश्वर प्रसन्न होता है। जो शर्त परमेश्वर ने सैनिकों से चाही, वह युद्ध–कौशल या ज्ञान नहीं, परन्तु परमेश्वर पर भरोसा करने और परमेश्वर की स्तुति करने का मन, और किसी भी स्थिति में भी घुटने न टकने का रवैया था।

हमें भी ऐसा रवैया रखना चाहिए। हम विश्वास के द्वारा मसीह का पालन करने वाले, सुसमाचार के सैनिक हैं। आगे चलकर प्रचार करने में जुटने वाले, पीछे रह कर उनका सहयोग करने वाले, सुसमाचार के प्रचार के लिए प्रार्थना करने वाले…सभी लोग, जो चाहते हैं कि प्रचार में भारी सफलता मिले और साथ में मेहनत करते हैं, सुसमाचार के सैनिक हैं।

“वे मेमने के साथ युद्ध करेंगे और मेमना उन पर विजयी होगा, क्योंकि वह प्रभुओं का प्रभु और राजाओं का राजा है, और जो उसके साथ हैं वे बुलाए हुए, चुने हुए आदि विश्वासी लोग हैं।” प्रक 17:14

परमेश्वर से बुलाए हुए और चुने हुए विश्वासी लोग हैं। सुसमाचार के ऐसे सैनिकों की विजय पहले से, निश्चित हुई है। परन्तु सैनिकों को युद्ध करने के दौरान, कष्ट और दुख को झेलना पड़ता है। जब वे कष्टों पर विजय पाएं, तब वे सुसमाचार के सैनिकों के लिए तैयार हुए धार्मिकता के मुकुट पाएंगे।

“मसीह यीशु के अच्छे योद्धा के समान मेरे साथ दुख उठा। कोई भी योद्धा जो लड़ाई पर जाता है अपने आप को प्रतिदिन की झंझटों में इसलिए नहीं फंसाता कि वह अपने भरती करने वाले को प्रसन्न करे। इसी प्रकार जब अखाड़े में जाने वाला पहलवान यदि विधि के अनुसार न लड़े तो वह पुरस्कार नहीं पाता…।” 2तीम 2:3–9

“कि वचन का प्रचार कर, समय और असमय तैयार रह… तू सब बातों में संयमी रह, कष्ट उठा, सुसमाचार प्रचार का काम कर, और अपनी सेवा पूरी कर… मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूं, मैंने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैंने विश्वास की रक्षा की है। भविष्य में मेरे लिए धार्मिकता का मुकुट रखा हुआ है, जिसे प्रभु जो धार्मिकता से न्याय करने वाला है उस दिन मुझे प्रदान करेगा…” 2तीम 4:2–8

मसीह के अच्छे सैनिक मसीह के साथ दुख उठाते हैं। वे अपने आपको सांसारिक जीवन के जंजाल में फंसा कर सुसमाचार के काम को पीछे नहीं छोड़ते। किसी भी परीक्षा में वे कभी घुटने नहीं टेकते हैं.। चाहे कोई भी मुश्किल और कोई भी बाधाएं सामने आती हों, वे केवल यह सोचते हैं कि आत्मिक युद्ध पर कैसे विजय पाएं और परमेश्वर को, जिसने सैनिकों के रूप में बुलाया है, कैसे और ज्यादा महिमा दे सकें।

हम मसीह के अच्छे सैनिक हैं, तो हमें दुख को भली भांति झेलना चाहिए। किसी भी दुख में कभी घुटने न टेकने का रवैया सुसमाचार के सैनिकों के लिए आवश्यक मांग है।

आत्मिक महायुद्ध

हम शैतान के साथ आत्मिक युद्ध कर रहे हैं। प्रेरित यूहन्ना ने प्रकाशन के द्वारा वह दृश्य देखा जिसमें शैतान क्रोधित होकर पवित्र लोगों के साथ युद्ध करने निकल गया है।

“और अजगर(शैतान) स्त्री पर क्रोधित हुआ, और उसकी शेष सन्तान से जो परमेश्वर की आज्ञा मानती है, और यीशु की गवाही पर स्थिर है, युद्ध करने निकला। और वह समुद्र की बालू पर जा खड़ा हुआ।” प्रक 12:17

“अत: प्रभु और उसके सामर्थ्य की शक्ति में बलवान बनो। परमेश्वर के सम्पूर्ण अस्त्र–शस्त्र धारण करो जिस से तुम शैतान की युक्तियों का दृढ़तापूर्वक सामना कर सको। हमारा संघर्ष तो मांस और लहू से नहीं वरन् प्रधानों, अधिकारियों, अन्धकार की सांसारिक शक्तियों तथा दुष्टता की उन आत्मिक सेनाओं से है जो आकाश में हैं।” इफ 6:10–12

परमेश्वर से बुलाए गए सुसमाचार के सैनिक, उस आत्मिक महायुद्ध में शामिल होते हैं जो स्वर्ग से शुरू होकर इस धरती पर समाप्त होगा। बाइबल ने भविष्यवाणी की है कि शैतान समुद्र की बालू जैसे बहुत अधिक लोगों पर शासन करेगा और पवित्र लोगों से, जो परमेश्वर की आज्ञा मानते हैं और उस पर विश्वास रखते हैं, युद्ध करने निकलेगा। शैतान की संख्या की तुलना में, परमेश्वर के सैनिकों की संख्या बहुत थोड़ी है। तो भी, परमेश्वर को कोई नहीं रोक सकता, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि हमारे पास बहुत से सैनिक हैं या थोड़े से सैनिक।

जब सभी इस्राएली सैनिक डर के मारे थरथरा उठे, दाऊद ने अकेले बहुत लंबे–चौड़े गोलियत को मार डाला। क्योंकि उसने केवल सर्वशक्तिमान परमेश्वर पर भरोसा किया।(1शम 17:45) परमेश्वर ऐसे विश्वास के सैनिक चाहता है।

गिदोन के 300 सैनिक टिड्डी–दल जैसे शत्रुओं की बड़ी संख्या को देखकर भी नहीं डरे। उन्होंने दिल से केवल इस पर विश्वास किया कि परमेश्वर उनके साथ है, और किसी भी स्थिति में भी घुटने न टके। उनके जैसे, हमें भी, केवल परमेश्वर पर भरोसा करने का मन, और केवल परमेश्वर की स्तुति करने का मन, और किसी भी परिस्थिति में शत्रुओं के सामने घुटने न टेकने का रवैया रखना चाहिए।

“परमेश्वर ने अपनी प्रजा को त्याग नहीं दिया, जिसका उसे पूर्व ज्ञान था। क्या तुम नहीं जानते कि पवित्रशास्त्र एलिय्याह के विषय में क्या कहता है, कि वह परमेश्वर से इस्राएल के विरुद्ध कैसी विनती करता है? “हे प्रभु, उन्होंने तेरे नबियों को घात किया है, उन्होंने तेरी वेदियों को ढा दिया है। मैं ही अकेला बच गया हूं, और वे मेरे भी प्राण के खोजी हैं।” परन्तु परमेश्वर का प्रत्युत्तर क्या था? “मैंने अपने लिए सात हजा.र पुरुषों को रख छोड़ा है, जिन्होंने बाअल के सम्मुख घुटने नहीं टेके।” ठीक उसी तरह वर्तमान समय में भी परमेश्वर के अनुग्रहमय चुनाव के अनुसार कुछ लोग शेष हैं।” रो 11:2–5

शेष लोग जो परमेश्वर से चुने हुए हैं, वे बाअल के सम्मुख घुटने नहीं टेकते। इसलिए आइए हम ऐसे कायर न बनें जो भयानक स्थिति में घुटने टेक कर संसार से समझौता करते हैं, पर ऐसे साहसी सैनिक बनें जिनसे परमेश्वर प्रसन्न होता है, और जो विश्वास के द्वारा सब पर विजयी होते हुए अन्त तक केवल परमेश्वर पर भरोसा करते हैं।

परमेश्वर के समस्त अस्त्र–शस्त्र धारण करो

हमारे शत्रु हैं, शैतान और उसके अधीन रही दुष्टात्माएं। अदृश्य शत्रुओं का सामना करने के लिए हमें आत्मिक रूप से संयमी और सचेत रहना चाहिए।

“संयमी और सचेत रहो। तुम्हारा शत्रु शैतान गर्जने वाले सिंह की भांति इस ताक में रहता है कि किसको फाड़ खाए। विश्वास में दृढ़ रहकर उसका विरोध करो, और यह जान लो कि तुम्हारे भाई जो संसार में हैं इसी प्रकार की यातना सह रहे हैं।” 1पत 5:8–9

कहावत है, ‘शत्रु को जानो और स्वयं को जानो, तो विजयी होगे”। इस तरह, हमेशा सावधान रहकर हमें शैतान की गतिविधि पर नजर रखनी चाहिए, और स्वयं अपने लिए भी सावधानी बरतनी चाहिए। सुसमाचार के सैनिकों को सबसे पहले, स्वयं पर जांच करना चाहिए कि पूरे अस्त्र–शस्त्र को धारण किया है या नहीं।

सैनिक सैन्य वरदी पहने बिना, हथियार के बिना, युद्ध–स्थल में कभी नहीं जाता। सिर से पैर तक, पूरी तरह से स्वयं को शस्त्रों से सजा कर युद्ध–स्थल मे जाता है। परमेश्वर ने सुसमाचार के सैनिकों को आज्ञा दी है कि परमेश्वर के समस्त अस्त्र–शस्त्र धारण करो।

“… परमेश्वर के समस्त अस्त्र–शस्त्र धारण करो, जिस से तुम बुरे दिन में सामना कर सको और सब कुछ पूरा करके स्थिर रह सको। अत: सत्य से अपनी कमर कस कर और धार्मिकता की झिलम पहिन कर, तथा पैरों में मेल के सुसमाचार की तैयारी के जूते पहिन कर स्थिर रहो। इनके अतिरिक्त, विश्वास की ढाल लिए रहो जिस से तुम उस दुष्ट के समस्त अग्नि–बाणों को बुझा सको। और उद्धार का टोप तथा आत्मा की तलवार, जो परमेश्वर का वचन है, ले लो। प्रत्येक विनती और निवेदन सहित पवित्र आत्मा में निरन्तर प्रार्थना करते रहो…।” इफ 6:13–20

परमेश्वर ने कहा है कि हमें सत्य से अपनी कमर कसना चाहिए और धार्मिकता की झिलम पहिनना है, तथा पैरों में मेल के सुसमाचार की तैयारी के जूते पहिन कर स्थिर रहना है। और कहा है कि हम उद्धार का टोप पहिनें कि हमारा मस्तिष्क हमेशा उद्धार के विषय में सोच सके, और एक हाथ में विश्वास की ढाल और दूसरे हाथ में आत्मा की तलवार लें जो परमेश्वर का वचन है।

आत्मिक सैनिकों के रूप में, हमें इन सब की तैयारी करनी चाहिए। उनमें से वचन की तलवार शत्रु पर आक्रमण करने का शस्त्र है, और उसके अलावा दूसरे सब शस्त्र खुद की रक्षा करने के लिए हैं। हम विश्वास की ढाल से शैतान के समस्त अग्नि–बाणों को सह सकते हैं, और वचन की तेज़ तलवार को चला कर शैतान को हरा सकते हैं।

जीवन के वचन की तलवार, नई वाचा

यदि हम वचन की तलवार का प्रयोग न करें, तो शैतान से निकलते विषमय बाणों के द्वारा घायल हो जाएंगे। शैतान घातक आत्मा है जिसके पास मृत्यु और अधोलोक का अधिकार है। इसी कारण वह एक आत्मा तक और ज्यादा मारने के लिए झूठी बात, जो उसका मुख्य शस्त्र है, और हर प्रकार का षड्यंत्र रचता है। स्वयं की रक्षा के लिए सर्वोत्तम उपाय ही आक्रमण करना है। शैतान को हटाने के लिए, सब से पहले हमें वचन की तलवार का प्रयोग करना चाहिए।

परमेश्वर का वचन तो जीवित, प्रबल है और किसी भी दोधारी तलवार से तेज़ है। वह वचन एक शक्तिशाली शस्त्र है जो प्राण और आत्मा, जोड़ों और गूदे तक में गहरा बेध जाता है।(इब्र 4:12) हम इस वचन की तलवार को चलाने के द्वारा ही विजय पा सकेंगे। हमें जीवन के वचन की तलवार देने के लिए, जो पाप और मृत्यु को हटाती है, परमेश्वर इस धरती पर आया।

“यीशु ने उनसे कहा, “मैं तुमसे सच सच कहता हूं, जब तक तुम मनुष्य के पुत्र का मांस न खाओ और उसका लहू न पियो, तुम में जीवन नहीं। जो मेरा मांस खाता और मेरा लहू पीता है, अनन्त जीवन उसका है, और मैं अन्तिम दिन में उसे जिला उठाऊंगा। मेरा मांस तो सच्चा भोजन है और मेरा लहू सच्ची पीने की वस्तु है।” यूह 6:53–55

हम सुसमाचार के सैनिकों का कर्तव्य यह है कि मसीह का मांस खिला कर और लहू पिला कर आत्मा को बचाना। जब हम वचन की तलवार को, जो हमने परमेश्वर से पाई है, चलाते हैं, शैतान दूर हट जाएगा, और शैतान के अधीन रही आत्माएं स्वतन्त्र होकर जीवन पाएंगी। जीवन की नई वाचा का सत्य जितना सुनाया जाता है, शैतान की शक्ति आत्मिक दुनिया में उतनी कमजोर हो जाती है। पूरे विश्व से बहुत लोग जीवन के रास्ते की तरफ़ दौड़ते आ रहे हैं। यह प्रमाणित करता है कि अब शैतान की शक्ति गिर रही है।

जो जय प्राप्त करे, वह जीवन का मुकुट पाएगा

हमें संसार में सभी लोगों को जीवन की नई वाचा का सत्य सुनाना चाहिए, ताकि वे इसे महसूस करके जीवन के मार्ग की ओर आ सकें। सुसमाचार का प्रचार करते समय, हमें न तो डरना है और न ही अपने कौशल पर भरोसा करना है। क्योंकि उद्धार तो परमेश्वर का अनुग्रह और वरदान है।(इफ 2:8–9)

जिस प्रकार गिदोन के सैनिकों ने परमेश्वर के उपाय के द्वारा विजय पाई, उसी प्रकार जब हम परमेश्वर की शक्ति पर भरोसा करें, तब हम आत्मिक युद्ध पर विजयी हो सकेंगे।

आत्मिक दुनिया के महायुद्ध में विजय का परिणाम है, एक आत्मा का उद्धार पाना। इसके लिए, हमें परमेश्वर को अधिक प्रार्थना करनी चाहिए और बुद्धि व ज्ञान को, जो हमने परमेश्वर से पाया है, लागू करना चाहिए, तथा इस पर हमें प्रेम बढ़ा कर बलिदान करना चाहिए। इसी कारण से प्रेरित पौलुस ने कहा है कि एक आत्मा को बचाने के लिए वह प्रसव का दुख उठा रहा है।

शैतान भी आत्मिक युद्ध में पराजित न होने के लिए, हर प्रकार के दोष, झूठ आदि का दुष्ट उपाय बना कर, हमारी निन्दा कर रहा है। जितनी ऊंची दीवार शैतान बनाए कि लोग परमेश्वर की आवाज़ न सुन सकें, तो हम उतनी ऊंची आवाज़ से पुकारेंगे कि लोग स्वर्गीय पिता और माता की आवाज़ सुन कर लौट आ सकें। जब लोगों के विचार पर डाले गए शैतान के घूंघट को निकाला जाएगा, और जीवन का वचन सुनाया जाएगा, तब हम सुसमाचार के सैनिकों के रूप में विजय पाएंगे।

परमेश्वर ने उन लोगों को जीवन का मुकुट देने का वादा किया है जो शैतान के हर प्रकार की निन्दा और प्रलोभन को दूर करते हैं और केवल परमेश्वर पर भरोसा करते हुए स्वर्ग की ओर जाते हैं।

गिदोन के सैनिकों के जैसे, आइए हम संसार के सामने घुटने न टेकें, और अन्त तक पिता और माता पर भरोसा करते हुए उनके वचन को अपना लक्ष्य बना कर आगे बढ़ेंं। हमारा परिश्रम थोड़ी देर के लिए है, लेकिन हमारी महिमा अनन्तकाल तक रहेगी। मैं आप सुसमाचार के सैनिकों से निवेदान करता हूं कि स्वर्ग की आशा न छोड़ें, और स्वर्गीय पिता और माता को हमेशा महिमा दें, और उनके नाम पर भरोसा करके जय पाएं।