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निकिया की परिषद और अरियसवाद

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325 ई. में, फसह के विवाद सहित मुख्य रूप से अरियसवाद के विवाद को निपटाने के लिए निकिया की परिषद की बैठक बुलाई गई। उस विवाद के कारण इतना लहू बहाया गया कि वह इतिहास में एक अंधकार का विषय बन गया है।

अरियस का हठ

मिस्र में अलेक्जेंड्रिया के चर्च में अरियस एक प्रेसबिटर के रूप में सर्वोच्च पदधारी व्यक्ति था। उसने एक अजीब सिद्धांत पर जोर देकर सार्वजनिक आलोचना पैदा की। वह इस प्रकार है:

  1. मसीह देहधारी लोगोस(ग्रीक में λóγoς, जिसका अर्थ है, “शब्द” या “सत्य”)
  2. मसीह परिवर्तन और पीड़ा के लिए सक्षम है।
  3. इसलिए, लोगोस परिवर्तनीय है और परमेश्वर के सदृश्य नहीं है।

अरियस के हठ के अनुसार, यीशु परमेश्वर नहीं है, लेकिन सिर्फ एक जीव है, इसलिए वह अनन्त नहीं है; और जैसे पिता परमेश्वर की पहली सृष्टि पुत्र है, ठीक वैसे ही पुत्र की पहली सृष्टि पवित्र आत्मा है।

अरियस एक कुशल प्रचारक था, जिसने अपनी प्रचार क्षमता का प्रयोग करके गीतों और अल्पशब्दों में अपनी शिक्षाओं को प्रभावपूर्ण तरीके से पेश किया ताकि लोग उसे आसानी से समझ और याद रख सकें। उसकी शिक्षाएं व्यापक रूप से फैल गईं, और मछुओं की तरह आम लोग भी उसे गाते थे।

तब अलेक्जेंड्रिया के बिशप, अलेक्जेंडर ने एक परिषद आयोजित की जिसमें अरियस की निंदा की गई और उसे निर्वासित किया गया। अलेक्जेंड्रिया से निर्वासन के बाद, अरियस कुछ पूर्वी बिशपों से समर्थन मांगने के लिए फिलिस्तीन गया।

बहुत सारे ईसाई नेता और बिशप अरियस से सहमत थे, तो समस्या वास्तव में शुरू हुई। मसीह के परमेश्वरत्व पर पारंपरिक विश्वास को, जो प्रेरितों के युग से सौंपा गया था, अरियस के द्वारा चुनौती मिलने लगी। अरियस के विचार लोगों और अलेक्जेंडर के पादरियों के बीच फैल गए, और अरियसवाद पूरे विश्व में व्यापक समस्या बन गया।

निकिया की परिषद

325 ई. में, रोमन सम्राट कॉनस्टॅन्टीन, जो खुद को “चर्च का संरक्षक” कहता था, उसने सब ईसाई बिशपों को फसह और अरियसवाद के विवादों को निपटाने के लिए निकिया में बुलाया। परिषद के दौरान हुए सभी खर्च सम्राट के घराने से दिए गए।

उस समय, एक व्यक्ति था जो विरोधी पक्ष में बैठा। उसका नाम अथानासिउस था, जो अलेक्जेंड्रिया वासी एक यूनानी था। अथानासिउस ने इस बात पर जोर देकर कि मसीह परमेश्वर के सदृश्य है, अरियस के सिद्धांत का बहुत ज्यादा विरोध किया।

निकिया की परिषद में उपस्थित हुए 300 से अधिक बिशपों में से बीस बिशप अरियस के समर्थक थे। सम्राट कॉनस्टॅन्टीन ने उन्हें एक “धर्म-मत” बनाने की आज्ञा दी जिसका अनुसरण और पालन ईसाई धर्म को करना पड़ा; इस सिद्धांत को “निकिया का धर्म-मत” बुलाया गया, जिसने घोषित किया कि परमेश्वर और यीशु मसीह के गुण एक जैसे ही हैं। कॉनस्टॅन्टीन ने सभी बिशपों को उस धर्म-मत पर हस्ताक्षर करने की आज्ञा दी, और उसने धमकी दी कि जो भी हस्ताक्षर नहीं करेगा उसे विधर्मी घोषित किया जाएगा और निर्वासित किया जाएगा। निकिया की परिषद में, अरियसवाद की निंदा की गई, और अरियस को लीबिया के दो बिशप, यानी थेओनास और सेकुन्डस के साथ, जिन्होंने उस धर्म-मत पर हस्ताक्षर करने से इनकार किया था, इलीरिया में निर्वासित किया गया।

अरियसवादियों की वापसी

दो वर्षों के बाद, अरियस ने घोषित किया कि उसने पश्चाताप किया है। तब वह और बिशप जिन्हें उसके साथ बहिष्कृत किया गया था, चर्च वापस आए। निर्वासन से लौटने के बाद, उन्होंने अपने सिद्धांत को सिखाकर, चुपके से अपने प्रभाव का विस्तार किया, और उन्होंने अपने विरोधियों पर जवाबी कार्यवाही करना शुरू किया।

अनैतिकता और सम्राट कॉनस्टॅन्टीन की मां हेलेना का अपमान करने के लिए, उन्होंने अपने विरोधियों पर मुकदमा चलाया। उसके बाद, उन्होंने अलेक्जेंड्रिया के बिशप अथानासिउस पर भी हमला किया और उसे निर्वासित किया।

सम्राट जिसने अरियसवाद को समर्थन दिया

336 ई. में अरियस की मृत्यु हो गई, और उसके अगले वर्ष में कॉनस्टॅन्टीन का निधन हुआ। अरियस के अनुयायियों ने अरियस के सिद्धांत का प्रचार किया और धीरे-धीरे अपना प्रभाव बढ़ाया। उस समय, रोमन साम्राज्य कॉनस्टॅन्टीन के तीन पुत्रों के द्वारा शासित किया जाता था: कॉनस्टॅन्टीन द्वितीय(पश्चिम), कॉनस्टन्स(मध्य), और कॉनस्टंटीयुस(पूर्व)। चूंकि कॉनस्टॅन्टीन द्वितीय ने निकिया के सिद्धांत को समर्थन दिया, तो उसने अथानासिउस को निर्वासन से वापस बुलाया। कॉनस्टन्स ने भी निकिया और अथानासिउस को समर्थन दिया, लेकिन कॉनस्टंटीयुस अलग था; उसने अरियस के लोगों को समर्थन दिया क्योंकि वह साम्राज्य के पूर्वी भाग का शासक था, जो अरियसवाद से काफी प्रभावित हुआ था।

थोड़े समय के बाद, कॉनस्टॅन्टीन द्वितीय मर गया, जिसके कारण पश्चिमी साम्राज्य में एकमात्र शासक कॉनस्टन्स रह गया। दस साल के बाद, कॉनस्टन्स की हत्या कर दी गई, और पूरा रोमन साम्राज्य कॉनस्टंटीयुस जिसने पूर्व में शासन किया था, के अंतर्गत एक हो गया। पहले से ही कॉनस्टंटीयुस अरियसवादियों का समर्थक था। इसलिए पूरा साम्राज्य अरियसवादी-सम्राट के शासन के अधीन आ गया, जिसने सभी बिशपों पर वह अरियस-मत स्वीकार करने के लिए दबाव डाला जो कहता था कि पुत्र बिल्कुल भी पिता के सदृश्य नहीं है। रोम के बिशप, लिबेरियुस ने भी निर्वासित होने से पहले इस नए मत को स्वीकार किया।

सम्राट जूलियन, विधर्म का अनुयायी

कुछ समय के बाद, रोमन सैनिकों ने, जो पेरिस के नजदीक तैनात किए गए थे, सम्राट कॉनस्टंटीयुस के आदेश का पालन नहीं किया और उसके खिलाफ विद्रोह किया, और उन्होंने अपने नेता जूलियन को सम्राट घोषित किया। हालांकि, दोनों के बीच युद्ध होने से पहले कॉनस्टंटीयुस की मृत्यु हुई। तो जूलियन रोमन का सम्राट बन गया। वह कॉनस्टॅन्टीन का भतीजा था, लेकिन उसे ईसाई धर्म में विश्वास नहीं था। इसके बजाय, उसने अपने आपको एल्यूसस के धर्म के लिए समर्पित किया था और पुराने बुतपरस्त धर्म को पुनस्र्थापित करने की कोशिश की। उसने पोंतिफेक्स मेक्सिमस होने के नाते अपने अधिकार के तहत अन्य देवताओं को बलिदान भी चढ़ाया। पोंतिफेक्स मेक्सिमस(प्राचीन रोमन धर्म में सर्वोच्च महायाजक – देवताओं और लोगों के बीच मध्यस्थ; बहुत समय पहले, रोमन सम्राट सूर्य देवता के महायाजक के रूप में कार्य किया करते थे; और ईसाई धर्म के मामलों में दखल देने के लिए, कॉनस्टॅन्टीन और उसके पुत्रों ने भी पोंतिफेक्स मेक्सिमस के रूप में अपने अधिकार का उपयोग किया।)

जूलियन ने सभी धर्मों को एक समान मानने की नीति को अपनाया। तब बुतपरस्त धर्म को पुनर्जीवित किया गया, और उसके अनुयायियों की संख्या बढ़ने लगी। उसने कॉनस्टन्स द्वारा निर्वासित किए गए सभी बिशपों को वापस बुलाया ताकि ईसाई धर्म में विघटन बढ़ जाए; उसका अन्तिम लक्ष्य ईसाई धर्म को उखाड़ फेंकना था। हालांकि, इसे समझते हुए, अफ्रीका को छोड़ सभी क्षेत्रों के बिशप जूलियन और बुतपरस्ती के खिलाफ एकत्र किए गए।

रोमन साम्राज्य का विघटन और अरियसवादी राष्ट्रों का पतन

जब जूलियन की मृत्यु हुई, तब जोवियन ने, जो एक ईसाई था, उसकी गद्दी संभाली। उसके सभी उत्तराधिकारी भी ईसाई थे और वे निकिया के धर्म-मत और अरियसवाद दोनों के प्रति उदार थे। हालांकि, 5वीं शताब्दी के मध्य में, जैसे जर्मन जातियां उत्तर से नीचे आईं, रोमन साम्राज्य गिरने लगा; उन्होंने रोमन साम्राज्य पर आक्रमण किया और उसके क्षेत्र को विभाजित किया और उस पर कब्जा किया। उस समय, बहुत ईसाई नेताओं को बंदी बनाया गया, और उन्होंने जर्मन जातियों को ईसाई बनाया। कुछ ईसाई उन्हें ईसाई बनाने के लिए स्वेच्छा से उनके बीच भी गए। अरियसवाद के अनुयायियों ने अरियस-ईसाई मत को हेरूली, वैंडल, और ऑस्ट्रोगोथ्स में फैलाया। हालांकि, ये तीन जातियां एक के बाद एक पोप के द्वारा नष्ट किए गए।

निकिया के धर्म-मत का प्रभाव और अरियसवाद

बाद में, निकिया के धर्म-मत को वैध ठहराया गया। रोमन कैथोलिक चर्च के द्वारा जिसने अंधकार के युग का नेतृत्व किया और बहुत से प्रोटेस्टैंट चर्चों के द्वारा जो धर्म-सुधार के बाद प्रकट हुए, इस निकिया के “त्रिमूर्तिवादी” को ईसाई धर्म के बुनियादी सिद्धान्त के रूप में अपनाया गया था। हालांकि, अब भी यहोवा के साक्षी जैसे कुछ संप्रदाय हैं, जो मसीह के परमेश्वरत्व का इनकार करते हैं और दावा करते हैं कि पिता परमेश्वर और पुत्र परमेश्वर एक जैसे नहीं हैं। उन्हें “आधुनिक काल के अरियसवादी” कहा जा सकता है।

निकिया के धर्म-मत की सीमाएं

निकिया की परिषद ने यह घोषित करते हुए कि पुत्र और पिता एक हैं, अरियसवाद को खारिज किया और निकिया के धर्म-मत को अपनाया। लेकिन यह मत “त्रिएक” के सत्य के सारभूत तत्त्व पर नहीं पहुंचा। “पिता के साथ एकरूप” या “पिता के इकलौते पुत्र” के रूप में यीशु मसीह का वर्णन करके, निकिया के धर्म-मत ने यह धारणा प्रस्तुत की कि “पिता परमेश्वर पुत्र परमेश्वर है,” लेकिन यह धारणा बहुत ही अस्पष्ट है। यही कारण है कि आज बहुत से ईसाई और धर्मशास्त्री भी, जो त्रिएक पर विश्वास करने का दावा करते हैं, भले ही मानते हैं कि “यीशु परमेश्वर का पुत्र है,” लेकिन वे आसानी से स्वीकार नहीं करते कि “यीशु मसीह स्वयं परमेश्वर है।”

इसलिए कुछ चर्च अजीब सिद्धांतों का प्रचार करते हैं, जैसे कि “पुत्र परमेश्वर को पिता परमेश्वर के समान माना जाता है क्योंकि पुत्र ने वही कार्य किया जो पिता करता है।”

बाइबल के ज्ञान की कमी ने अरियस की शिक्षाओं के समान बहुत सारे झूठे सिद्धांतों को पैदा किया है, जो मसीह के मनुष्यत्व पर जोर देते हैं। जिसके परिणामस्वरूप वे अपने तरीकों से बाइबल की व्याख्या करके लोगों को मसीह के परमेश्वरत्व की निन्दा करवाते हैं।

इसके अलावा, निकिया के धर्म-मत में पवित्र आत्मा के बारे में कोई स्पष्ट बयान नहीं है। इसलिए निकिया की परिषद के बाद, ईसाई चर्चों के धार्मिक सिद्धांतों में “त्रिएक” नाममात्र होते हुए सारहीन है। इसलिए वे बाइबल के सार को महसूस नहीं करते और बाइबल में इस तथ्य की समझ तक पहुंचने में नाकाम हो जाते हैं कि “पिता परमेश्वर पवित्र आत्मा परमेश्वर है,” और “पुत्र परमेश्वर पवित्र आत्मा परमेश्वर है।”

त्रिएक, बाइबल का सत्य

त्रिएक ऐसा सिद्धांत नहीं है जिसे धार्मिक सिद्धांत के रूप में स्वीकार या इनकार किया जा सकता है, लेकिन यह बाइबल का सत्य है जिस पर प्रथम चर्च के समय से जोर दिया जा रहा है। सत्य वह है जिसे परमेश्वर ने हमें स्वयं सिखाया है(मी 4:1-2) और सत्य वह चीज नहीं जिसे धार्मिक परिषद या धर्मशास्त्रियों के विवाद से सिखाया जा सकता है।

शैतान कभी नहीं चाहता कि हम परमेश्वर का ज्ञान रखें। चूंकि वह जानता है कि परमेश्वर के लोग परमेश्वर के ज्ञान के न होने से नष्ट हो जाएंगे(हो 4:1-6), इसलिए उसने मसीह के विरोधी की आत्मा को पूरे संसार में भेज दिया है। जो उससे भरमाए जाते हैं वे त्रिएक का इनकार करते हैं, या भले ही वे अपने होठों से त्रिएक को स्वीकारते हैं, फिर भी वे अपने हृदयों से उसका इनकार करते हैं। उनका विश्वास दुविधा से ग्रस्त है।

जब तक सत्य का आत्मा नहीं आता, हम कैसे चीजों का न्याय कर सकते हैं(1कुर 4:5)? चूंकि वह आए और उन्होंने अन्धकार की छिपी बातें ज्योति में दिखाईं, इसलिए हम अभी परमेश्वर के ज्ञान के पास आए हैं और हम मृत्यु से पार होकर जीवन में पहुंचे हैं।

“वे सब परमेश्वर की ओर से सिखाए हुए होंगे(यूह 6:45)।” परमेश्वर की इस प्रतिज्ञा के अनुसार, हम सत्य के वचनों को समझ सके हैं। परमेश्वर को धन्यवाद देते हुए जो युग के अन्त तक पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के रूप में हमेशा हमारे साथ हैं, हमें हमेशा संसार के लोगों को परमेश्वर का सही ज्ञान बताकर, उनकी उद्धार के मार्ग पर अगुवाई करने के लिए अपनी पूरी शक्ति लगानी चाहिए।