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हमें किस प्रकार के शब्द बोलने चाहिए? (2)

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हम यह देखना जारी रखेंगे कि परमेश्वर क्या चाहते हैं कि हम किस प्रकार के शब्दों का उपयोग करें।

1. धन्यवाद के शब्द

जैसा पवित्र लोगों के योग्य है, वैसा तुम में व्यभिचार और किसी प्रकार के अशुद्ध काम या लोभ की चर्चा तक न हो; और न निर्लज्जता, न मूढ़ता की बातचीत की, न ठट्ठे की; क्योंकि ये बातें शोभा नहीं देतीं, वरन् धन्यवाद ही सुना जाए। इफ 5:3-4

बाइबल हमें सिखाती है कि हमें धन्यवाद के शब्द बोलने चाहिए। परमेश्वर स्वयं हमारी आत्माओं के लिए इस पृथ्वी पर आए जिनके लिए पापों के कारण मरना नियुक्त किया गया था, और उन्होंने हमारे सभी पापों को उठाकर हमें बचाया। परमेश्वर आनंद से भरे स्वर्ग में हमारी अगुवाई कर रहे हैं, जहां न मृत्यु और न ही कोई पीड़ा है। इस उद्धार के अनुग्रह के बारे में सोचते हुए, हमें अपने दैनिक जीवन में हमेशा धन्यवाद के शब्द बोलने चाहिए।

2. स्थिति के अनुसार उचित शब्द बोलना

सज्जन उत्तर देने से आनन्दित होता है, और अवसर पर कहा हुआ वचन क्या ही भला होता है! नीत 15:23

जैसे चांदी की टोकरियों में सोने के सेब हों, वैसा ही ठीक समय पर कहा हुआ वचन होता है। नीत 25:11

परमेश्वर ने कहा कि उचित समय पर कहा हुआ शब्द सुंदर है। वह हमें यह भी सिखाते हैं कि जैसे चांदी की टोकरियों में सोने के सेब होते हैं वैसे ठीक समय पर कहा हुआ शब्द मूल्यवान होते हैं। उन्होंने स्थिति के अनुसार उचित शब्द बोलने के महत्व पर जोर दिया। चाहे यह शब्द मौलिक रूप से सही लग सकता है, लेकिन अनुचित समय पर शब्द बोलना दूसरों की भावनाओं को ठेस पहुंचा सकता है और झगड़े का कारण बन सकता है। आइए हम बुद्धिमान संतान बनें जो स्थिति के अनुसार उचित शब्द बोलकर अपने आसपास के लोगों को खुशी प्रदान करती हैं और परमेश्वर को महिमा देती हैं।

3. परमेश्वर को महिमा देने वाले शब्द

धीरज और शान्ति का दाता परमेश्वर तुम्हें यह वरदान दे कि मसीह यीशु के अनुसार आपस में एक मन रहो। ताकि तुम एक मन और एक स्वर में हमारे प्रभु यीशु मसीह के पिता परमेश्वर की स्तुति करो। रो 15:5-6

हमें हमेशा परमेश्वर को महिमा और प्रशंसा देनी चाहिए। हमारी सभी उपलब्धियों के बीच, कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे हमने अपनी सामर्थ्य से हासिल किया है। हम सभी चीजें करने में इसलिए सक्षम थे क्योंकि परमेश्वर ने हमें स्थिति और वातावरण प्रदान किया और हमारी मदद की। इसलिए हमें परमेश्वर को धन्यवाद और महिमा देनी चाहिए, जो हमेशा हमारी मदद करते हैं। हमें आशीषों को प्राप्त करने के लिए भी परमेश्वर को महिमा देनी चाहिए। माता की शिक्षाओं में, दूसरी शिक्षा यह है, “जब हम परमेश्वर को महिमा देते हैं, महिमा हमारे पास लौट आती है।” हमारे लिए यह आवश्यक है कि हम परमेश्वर को महिमा दें, लेकिन, परमेश्वर ने कहा कि वह महिमा हमारे पास लौटाएंगे। हमें कितना आभारी होना चाहिए? हमें परमेश्वर की इस शिक्षा को याद रखना चाहिए और ऐसी स्वर्गीय संतान बननी चाहिए जो हमेशा परमेश्वर को महिमा देने वाले शब्द बोलकर परमेश्वर की आशीष प्राप्त करती हैं।

पुनर्विचार के लिए प्रश्न
1. हमें परमेश्वर को धन्यवाद के शब्द क्यों बोलने चाहिए?
2. परमेश्वर ने यह क्यों कहा कि हमें स्थिति के अनुसार उचित शब्द बोलने
चाहिए?
3. माता की शिक्षाओं में, दूसरी शिक्षा क्या है?