माता की शिक्षा
स्वर्गीय माता की तेरह शिक्षाएं। हम प्रेम की शिक्षाओं से स्वर्गीय चरित्र सीखते हैं।
माता की शिक्षाओं में से पहली शिक्षा
"जैसे परमेश्वर हमेशा प्रेम देते हैं, वैसे प्रेम पाने से ज्यादा आशीष, प्रेम देने में है।"
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ऐसा एक पल भी नहीं जिसमें परमेश्वर हमसे प्यार नहीं करते। जब हम स्वर्ग में स्वर्गदूत थे, तब परमेश्वर ने हमेशा प्यार से हमारा लालन पालन किया। यहां तक कि जब हम स्वर्ग में गंभीर पाप करके इस पृथ्वी पर गिरा दिए गए, हमारे पापों की क्षमा करने के लिए हमारे बदले परमेश्वर ने क्रूस पर अपना बलिदान किया, जिससे उन्होंने हमारे प्रति अपना प्रेम साबित किया। इस पल भी परमेश्वर हमारे जैसे मनुष्य के रूप में पापियों की भूमि पर निवास करते हुए हमारी देखभाल कर रहे हैं। इस प्रकार, परमेश्वर हमेशा प्यार देते हैं और कहते हैं, "जैसा मैंने तुम से प्रेम रखा है, वैसा ही तुम भी एक दूसरे से प्रेम रखो"(यूह 13:34)। परमेश्वर चाहते हैं कि…
माता की शिक्षाओं में से दूसरी शिक्षा
"जब हम परमेश्वर को महिमा देते हैं, वह महिमा अंत में हमें दी जाएगी।"
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जब हम प्रचुर फल वाले एक वृक्ष को देखते हैं, तब हम केवल फल और डालियां जैसे दृश्य हिस्सों पर ध्यान केंद्रित करते हैं और जड़ों की उपेक्षा करते हैं। परन्तु, जड़ों की भूमिका अत्यंत आवश्यक है; वे जब तक वृक्ष अच्छा फल नहीं फलता तब तक पानी और पोषण प्रदान करती हैं। जड़ों के बिना, वृक्ष का अस्तित्व नहीं हो सकता। इसके अतिरिक्त, यदि जड़ें ठीक से काम न करें तो डालियां कितनी भी मोटी और प्रबल होने पर भी वृक्ष स्वयं जीवन बनाए नहीं रख सकता या फल पैदा नहीं कर सकता। इसी तरह, हर कार्य जो हमने किया, हमारी स्वयं की शक्ति और बुद्धि से की गईं उपलब्धियां जैसा लगता है, परन्तु वह परमेश्वर की सामर्थ्य से…
माता की शिक्षाओं में से तीसरी शिक्षा
"सुंदर मन में कोई घृणा नहीं होती और वह एक संपूर्ण प्रेम को जन्म देता है।"
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संसार में कोई भी संपूर्ण नहीं है क्योंकि हम सब पापी हैं। प्रत्येक में खूबियां और कमियां हैं। चाहे किसी का चरित्र कितना भी अच्छा क्यों न लगता हो, उसमें कुछ कमियां होती हैं, और चाहे किसी का चरित्र कितना भी दोषपूर्ण क्यों न लगता हो, उसमें कुछ खूबियां होती हैं। यदि हमारे मन में घृणा है तो हम दूसरों में केवल दोष पांएगे, परन्तु जब हमारे पास सुंदर मन होता है, तब हम कुछ अच्छी और सुंदर बातें खोज सकते हैं। हर परिस्थिति में सुंदर मन रखना आसान नहीं है। लेकिन, यदि हम परमेश्वर के वचन पर निर्भर रहकर हमारे भाइयों और बहनों को सुंदर मन के साथ देखें, तो हम जैसा माता की शिक्षाओं में वर्णित है वैसे…
माता की शिक्षाओं में से चौथी शिक्षा
“जैसे अब्राहम ने अपने भतीजे लूत को अच्छी वस्तुएं देने पर अधिक आशीषें प्राप्त कीं, वैसे ही जब हम अपने भाइयों और बहनों को अच्छी वस्तुएं देंगे, तब हम भी बहुतायत में आशीष प्राप्त करेंगे।”
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परमेश्वर ने अब्राहम से कहा कि वह अपने भतीजे लूत के साथ कनान देश में जाए जैसे-जैसे उनकी भेड़-बकरियां और परिवारों की संख्या बढ़ती गई, जहां वे रहते थे वह भूमि दोनों के लिए बहुत छोटी हो गई। तब उनके चरवाहों के बीच मतभेद बढ़ता गया। अब्राहम ने लूत को सुझाव दिया कि वह अलग हो जाए ताकि उनके चरवाहे एक दूसरे से न लड़े। यद्यपि अब्राहम लूत से पहले अच्छी भूमि चुन सकता था, लेकिन उसने लूत को पहले अपनी भूमि चुनने की अनुमति दी, और फिर अब्राहम को वह भूमि मिली जिसे लूत ने नहीं चुना। अब्राम और लूत की भेड़–बकरी और गाय–बैल के चरवाहों में झगड़ा हुआ। उस समय कनानी और परिज्जी लोग उस देश में रहते…
माता की शिक्षाओं में से पांचवीं शिक्षा
“अपेक्षाएं पूरी न होने पर महसूस होनेवाली निराशा, घमंड है।”
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जब किसी व्यक्ति को मिलने वाला व्यवहार या सेवा उसकी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं होती, तब वह निराश महसूस करता है। निराशा की ऐसी भावना उस मन से उत्पन्न होती है जो चाहता है कि दूसरे लोग उसे स्वीकार करें या उसकी सेवा करें, और यह एक अभिमानी मन होता है। हम पापी हैं जिन्होंने स्वर्ग में गंभीर पाप किए और पृथ्वी पर गिरा दिए गए। इसलिए हमें कभी भी अभिमानी नहीं होना चाहिए क्योंकि पापियों को न तो स्वीकार किए जाने का अधिकार है और न ही सेवा प्राप्त करने का। जब हम इस संसार की व्यवस्थाओं को देखते हैं, तो गंभीर अपराध करने वाले अपराधियों को जेल में बंद कर दिया जाता है और उनके सभी अधिकारों और…
माता की शिक्षाओं में से छठी शिक्षा
“भले ही दूसरे काम न करें, आइए हम शिकायत किए बिना ईमानदारी से काम करें। जब हम एक स्वामी के मन से काम करते हैं, तब हम आनंद और शांति से काम कर सकते हैं।”
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हम अक्सर ऐसी स्थिति का सामना करते हैं जब हमें अकेले काम करना पड़ता है, जबकि दूसरे काम नहीं कर रहे होते। हम सोच सकते हैं, “वह काम क्यों नहीं कर रहा है?” या “मैं अकेले ही क्यों काम कर रहा हूं?” लेकिन, परमेश्वर ने हमें सिखाया है कि जब हमारे पास स्वामित्व की भावना होती है, तब हम खुशी के साथ काम कर सकते हैं। आइए हम एक स्वामी और उसके सेवकों के बारे में सोचें। सेवक कटनी की ज्यादा परवाह नहीं करते और केवल न्यूनतम प्रयास करते हैं। वे केवल तब मेहनत करने का दिखावा करते हैं जब उनका स्वामी देख रहा होता है, क्योंकि उन्हें अपने काम करने के समय के आधार पर मजदूरी मिलती है। लेकिन,…
माता की शिक्षाओं में से सातवीं शिक्षा
“शिकायत भरे हृदय से घमंड का जन्म होता है। जब हम हमेशा कृतज्ञता भरे हृदय से परमेश्वर की सेवा करेंगे, तब शिकायत और घमंड गायब हो जाएंगे, और हृदय नम्रता से भर जाएगा।”
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शिकायत का मतलब है, हमारे हृदय में असंतोष होना। जो लोग संतोष करना नहीं जानते, वे शिकायत करने लगते हैं। चाहे परमेश्वर कितनी भीअनुकूल परिस्थितियां तैयार करें, वे परमेश्वर को धन्यवाद देने के बजाय हमेशा पहले नकारात्मक पहलुओं को देखते हैं। माता ने कहा, “शिकायत भरे हृदय से घमंड का जन्म होता है।” हम शिकायत तब करते हैं जब हम सोचते हैं, ‘यह तरीका सही नहीं है,’ ‘मेरा तरीका उससे बहुत बेहतर है,’ या ‘उसे मेरे साथ ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए।’ इन शिकायतों से, हमारे मन में अहंकार पैदा होता है और हम सोचने लगते हैं, ‘मैं सब से बेहतर हूं।’ चूंकि अहंकार हमारी आत्मा को विनाश की ओर ले जाता है, इसलिए हमें किसी भी परिस्थिति में शिकायत…
माता की शिक्षाओं में से आठवीं शिक्षा
“जब हम अपने भाइयों और बहनों की प्रशंसा करें, वह प्रशंसा हमारे पास लौट आएगी।”
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शब्दों में बड़ी शक्ति होती है और वे गूंज की तरह होते हैं। जब हम दूसरों की प्रशंसा करते हैं, तो वह प्रशंसा हमारे पास लौट आती है। जब हम दूसरों को दोष देते हैं, तो वे भी हमें दोष देते हैं। इसी कारण माता ने हमें सिखाया, “जब हम अपने भाइयों और बहनों की प्रशंसा करें, वह प्रशंसा हमारे पास लौट आएगी।” जब हम इस शिक्षा को याद रखते हैं और छोटी-छोटी बातों में भी एक दूसरे की प्रशंसा करते हैं और एक-दूसरे को प्रोत्साहित करते हैं, तो वह प्रशंसा और प्रोत्साहन हमारे पास लौट आएगा। इसके अलावा, परमेश्वर, जो सब कुछ याद रखते हैं, हमारी प्रशंसा करेंगे और हमें आशीष देंगे। “इस कारण जो कुछ तुम चाहते हो…
माता की शिक्षाओं में से नौवीं शिक्षा
“जिस प्रकार समुद्र सारी गंदगियों को ले लेता है और उसे साफ करता है, हमारा मन खुला और इतना सुंदर होना चाहिए जिससे हम अपने भाइयों और बहनों की गलतियों को ढंक सकें।”
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स्वर्गीय माता ने हमें बताया है कि समुद्र के समान विशाल मन एक सुंदर मन है। समुद्र के समान विशाल मन भाइयों और बहनों की गलतियों को ढक लेता है। वह आसानी से क्रोधित नहीं होता, बल्कि विनम्रता और दयालुता के साथ दूसरों को समझता है और सहन करता है। स्वर्गीय माता ऐसे मन को सुंदर मानती हैं। तो हम समुद्र के समान विशाल मन कैसे रख सकते हैं? यह हमारे गंभीर पापों को क्षमा करने वाले परमेश्वर के बारे में सोचने से संभव होता है। हम ऐसे पापी हैं जो स्वर्ग में अक्षम्य पाप करके इस पृथ्वी पर आ गए। हालांकि, परमेश्वर हमारे पापों के लिए प्रायश्चित का बलिदान बने और उन्होंने हमें क्षमा कर दिया। जब हम परमेश्वर…
माता की शिक्षाओं में से दसवीं शिक्षा
“जो भी मेमने के द्वारा मार्गदर्शन चाहता है, उसे मेमने से भी छोटा मेमना बनना चाहिए।”
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स्वर्गीय माता ने कहा कि जो कोई मेमने के द्वारा मागदर्शन चाहता है, उसे मेमने से भी छोटा मेमना बनना चाहिए। ऐसा इसलिए है क्योंकि यदि हम मेमने से छोटे नहीं बनते, तो हम जहां कहीं मेम्ना हमारा मार्गदर्शन करता है, वहां हम उसका पालन नहीं कर सकते।जब तक हम मेमने से बड़े रहेंगे, हम कुछ समय के लिए मेमने का पालन कर सकते हैं, जब तक उसका मार्गदर्शन हमारे विचारों के अनुरूप रहेगा। लेकिन, जब उसका नेतृत्व हमारे विचारों के अनुरूप नहीं रहेगा, तब हम अपने अनुसार कार्य करना शुरू कर देंगे। हमें अपने विचारों को दूर करके छोटे मेमने बनना होगा और जहां भी मेम्ना हमें मार्गदर्शन करे, वहां उसका अनुसरण करना होगा। परमेश्वर, जो मेमना हैं, उनके…
माता की शिक्षाओं में से ग्यारहवीं शिक्षा
“महान पात्र बनने की प्रक्रिया में बलिदान की आवश्यकता है।”
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परमेश्वर ने हमारी तुलना पात्रों से की है। हम छोटे पात्र में ज्यादा फल नहीं रख सकते। इसी तरह, भले ही हम कितनी भी आशीषें प्राप्त करना चाहें और महान सुसमाचार सेवकों के रूप में सेवा करना चाहें, यदि हम छोटे पात्र हैं तो हम ऐसी आशीषों को प्राप्त नहीं कर सकते। केवल जब हम बड़ा पात्र हों तब हम बहुत सी आत्माओं को गले लगा सकते हैं और पवित्र आत्मा की महान आशीषें प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन, पात्रों के चौड़े और गहरे बनने की प्रक्रिया में बहुत अधिक पीड़ा और निर्मल होने की आवश्यकता होती है। सिय्योन में बहुत सी आत्माएं हैं; उन आत्माओं को सहन करने और गले लगाने के लिए बलिदान की आवश्यकता होती है। कुछ…
माता की शिक्षाओं में से बारहवीं शिक्षा
“परमेश्वर भी अपनी सेवा करवाने नहीं, परतु सेवा करने के लिए आए। जब हम अपनी सेवा करवाने की चाह रखे बिना, एक दूसरे की सेवा करें, तब परमेश्वर प्रसन्न होंगे।”
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हमारे परमेश्वर ने स्वयं हमें यह दिखाकर कि हमें क्या करना चाहिए, विश्वास का उदाहरण दिखाया। उनमें से एक उदाहरण दूसरों की सेवा करना है। परमेश्वर सबसे सम्मानित और पवित्र हैं, जो पूरे ब्रह्मांड में सभी प्राणियों द्वारा सेवा प्राप्त करने के योग्य हैं। फिर भी, उन्होंने हमारी सेवा की। हमें परमेश्वर के उदाहरण का अनुसरण करते हुए अपने भाइयों और बहनों की सेवा करनी चाहिए। उनमें यह वाद–विवाद भी हुआ कि उन में से कौन बड़ा समझा जाता है। उसने उनसे कहा, “अन्यजातियों के राजा उन पर प्रभुता करते हैं; और जो उन पर अधिकार रखते हैं, वे उपकारक कहलाते हैं। परन्तु तुम ऐसे न होना; वरन् जो तुम में बड़ा है, वह छोटे के समान और जो प्रधान…
माता की शिक्षाओं में से तेरहवीं शिक्षा
“हमें वर्तमान समय के कष्टों को इसलिए धैर्य से सहना चाहिए क्योंकि स्वर्ग का राज्य हमारा होगा।”
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विश्वास का जीवन जीते समय, हम कठिन और कष्टदायक क्षणों का सामना करते हैं। कभी-कभी हम सत्य के लिए सताए जाते हैं या शैतान द्वारा परखे जाते हैं; हम सिय्योन में भाइयों और बहनों के साथ कठिनाइयों का सामना करते हैं; या हम अपने दैनिक जीवन में समस्याओं का सामना करते हैं। प्रत्येक सदस्य दुःख और कठिनाई सहते हुए विश्वास के मार्ग पर चलता है। परमेश्वर ने हमें आने वाले स्वर्ग के बारे में सोचकर सभी दुखों को सहने के लिए कहा है। परमेश्वर स्वर्ग में हमारे लिए अकल्पनीय आशीष तैयार कर रहे हैं। वहां कोई शोक, पीड़ा या विलाप नहीं होगा। वहां केवल अनन्त आनंद और खुशी होगी। भले ही पृथ्वी पर हमारा जीवन कठिन हो और पीड़ाओं से…