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माता की शिक्षाओं में से पांचवीं शिक्षा

“अपेक्षाएं पूरी न होने पर महसूस होनेवाली निराशा, घमंड है।”

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जब किसी व्यक्ति को मिलने वाला व्यवहार या सेवा उसकी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं होती, तब वह निराश महसूस करता है। निराशा की ऐसी भावना उस मन से उत्पन्न होती है जो चाहता है कि दूसरे लोग उसे स्वीकार करें या उसकी सेवा करें, और यह एक अभिमानी मन होता है।

हम पापी हैं जिन्होंने स्वर्ग में गंभीर पाप किए और पृथ्वी पर गिरा दिए गए। इसलिए हमें कभी भी अभिमानी नहीं होना चाहिए क्योंकि पापियों को न तो स्वीकार किए जाने का अधिकार है और न ही सेवा प्राप्त करने का। जब हम इस संसार की व्यवस्थाओं को देखते हैं, तो गंभीर अपराध करने वाले अपराधियों को जेल में बंद कर दिया जाता है और उनके सभी अधिकारों और स्वतंत्रताओं को छीन लिया जाता है।

लेकिन, कभी-कभी हम भूल जाते हैं कि हम आत्मिक पापी हैं। जब हम यह भूल जाते हैं, तो हमारा मन घमंडी हो जाता है और सेवा पाने की चाह रखता है। जब दूसरे हमें स्वीकार नहीं करते या हमारी सेवा नहीं करते, तो हम निराश हो जाते हैं, कुड़कुड़ाने लगते हैं और शिकायत करने लगते हैं। यदि यह जारी रहता है, तो हम धन्यवादी मन खो देते हैं और उद्धार से दूर हो जाते हैं।

इसलिए, यदि हम उद्धार प्राप्त करना चाहते हैं, तो जब भी हम घमंडी या निराश महसूस करते हैं, तो हमें खुद को याद दिलाना चाहिए कि हम पापी हैं और हमें उद्धार देने के लिए परमेश्वर को धन्यवाद देने का प्रयास करना चाहिए।

हमें परमेश्वर के बारे में भी सोचना चाहिए जो नम्रता के साथ बलिदान के मार्ग पर चले। परमेश्वर को सम्मानित और ऊंचा किया जाना चाहिए, लेकिन उन्होंने हमारे उद्धार के लिए खुद को दीन किया और बलिदान का जीवन जिया। आराधना और स्तुति पाने के बजाय उन्हें उपहास और तिरस्कार मिला।

तो फिर, हम सेवा पाने की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं? हम अपने भाइयों और बहनों के व्यवहार से कैसे निराश महसूस कर सकते हैं? हमें परमेश्वर के बारे में सोचना चाहिए, जिन्होंने निम्नतम पद से दूसरों की सेवा की, और परमेश्वर की शिक्षाओं के अनुसार नम्र मन रखने का प्रयास करना चाहिए। तब हमारी निराशा दूर हो जाएगी और हम परमेश्वर को धन्यवाद और स्तुति दे सकेंगे।

पुनर्विचार के लिए प्रश्न
​माता की शिक्षाओं में से पांचवीं शिक्षा क्या है?
आइए हम निराशा पर काबू पाने के तरीकों के बारे में बात करें।