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बाइबल Q&A
आपके मन में उठने वाले प्रश्नों का उत्तर बाइबल के द्वारा दिया जाएगा।
यीशु सर्वशक्तिमान परमेश्वर हैं, फिर भी वह क्यों मनुष्य के रूप में आए?
परमेश्वर जब भी चाहें, वह अवश्य ही मनुष्य के रूप में प्रकट हो सकते हैं। क्योंकि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास ऐसी शक्ति है कि वह शरीर रूप का धारण कर सकते हैं या उसे उतार सकते हैं। फिर क्यों परमेश्वर एक कमजोर बालक और पुत्र के रूप में स्वयं पृथ्वी…
दुनिया में ऐसे कई लोग हैं जो यीशु की इच्छा पर चलने का दावा करते हैं। तब, ऐसा क्यों है की वे यीशु के स्थापित नई वाचा को नहीं रखते?
यीशु का इस पृथ्वी पर आने का उद्देश्य मनष्यों को अनंत जीवन देना है जो अपने पापों के कारण मृत्यु के बाध्य हैं। हमें उद्धार की ओर नेतृत्व करने के लिए, यीशु ने फसह के दिन पर वई वाचा को स्थापित किया और क्रूस पर अपना लहू बहाते हुए, हमारे…
सवाल: बाइबल कहती है कि जब यीशु दूसरी बार आएंगे तो वह “महिमा” के साथ आकाश के बादलों पर आएंगे। तो मैं इस सत्य को नहीं समझ सकता कि उनको साधारण मनुष्य के रूप में आना है।
जवाब: बाइबल भविष्यवाणी करती है कि यीशु दूसरी बार आएंगे, और यह भी कि उस समय परमेश्वर की महान महिमा प्रकट होगी।(मत 24:30) तब, यीशु ने जिस “महिमा” का वर्णन किया, क्या वह शारीरिक महिमा है जो एक उज्ज्वल प्रकाश देती है? मसीह के पास जो महिमा है, वह शारीरिक महिमा नहीं है जैसे कि लोग कल्पना करते हैं। इसके बावजूद, आज संसार के लोगों ने यीशु के वचनों की सारभूत बातों को न समझते हुए शारीरिक दृष्टिकोण से आत्मिक महिमा और आशीष की व्याख्या की है और खुद ही निष्कर्ष किया है। महिमा के साथ यीशु के आने की भविष्यवाणी और उनका वास्तविक रूप जब आप यीशु के पहली बार आने की भविष्यवाणी और उसकी पूर्णता को सही तरह…
चर्च ऑफ गॉड सब्त और फसह जैसे पर्वों पर ज्यादा महत्व देता है, जो अन्य चर्च नहीं मनाते। इसका कोई विशेष कारण है?
वह परमेश्वर हैं जिन्होंने पर्वों को स्थापित करके हमें मनाने की आज्ञा दी है। परमेश्वर के द्वारा दी गई व्यवस्थाओं में से कोई भी ऐसी व्यवस्था नहीं है, जिसका हमारे उद्धार से कोई लेना–देना नहीं है और कोई मतलब नहीं है। बाइबल में दर्ज किए गए पर्व हमारे उद्धार से निकट रूप से संबंधित है। परमेश्वर के पर्वों को स्थापित करने का कारण हम सब पापी हैं जिन्होंने स्वर्ग में पाप किया और इस पृथ्वी पर नीचे गिरा दिए गए। जो कोई इस संसार में पैदा होता है, वह मृत्यु के दंड से नहीं बच सकता जो पाप की मजदूरी है। क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है, परन्तु परमेश्वर का वरदान हमारे प्रभु मसीह यीशु में अनन्त जीवन है।…
मुझे कहा गया कि पुराने नियम की व्याख्या छाया के रूप में की जाती है और नए नियम की व्याख्या उसकी असलियत के रूप में की जाती है। इस पर विश्वास करने का बाइबल का क्या आधार है?
बाइबल गवाही देती है कि पुराने नियम की व्यवस्था “आनेवाली अच्छी वस्तुओं की छाया है”(इब्र 10:1)। बाइबल में यह भी कहा गया है कि परमेश्वर ने प्राचीनकाल से उस बात को बताया है जो अब तक नहीं हुई है(यश 46:10), और जो अब हो रहा है वह पहले भी हो चुका है(सभ 3:15)। ये सभी वचन दिखाते हैं कि पुराने नियम के युग में परमेश्वर ने प्रतिरूप और छाया के द्वारा पहले ही यह जानने दिया है कि वह बाद में क्या पूरा करेंगे। पुराने नियम में मलिकिसिदक और नए नियम में यीशु आइए हम कुछ उदाहरणों के द्वारा इस तथ्य की पुष्टि करें कि पुराना नियम छाया है और नया नियम उसकी असलियत है। सबसे पहले आइए हम एक…
बाइबल में हम अक्सर “मुहर” शब्द देख सकते हैं। तब मुहर क्या है और इसका हमारे साथ क्या संबंध है?
“मुहर” एक छाप है जिस पर एक व्यक्ति या संगठन का नाम उत्कीर्ण है और जिसका पहचान के प्रमाणीकरण के उद्देश्य के लिए उपयोग किया जाता है। परमेश्वर की मुहर का मतलब परमेश्वर की छाप है। सभी युगों में परमेश्वर उन पर अपनी मुहर लगाते हैं जो धर्मी माने जाते हैं। परमेश्वर की इस इच्छा के अनुसार प्रेरित होने की छाप भी है और विश्वास की धार्मिकता की छाप भी है। पवित्र आत्मा भी बयाने के रूप में एक छाप है (1कुर 9:2, रो 4:11, 2कुर 1:22)। परमेश्वर का मुहर लगाने का कार्य इस युग में भी घटित होता है। लेकिन यह पहले की तुलना में अलग है। परमेश्वर की मुहर जो हमें प्राप्त करनी चाहिए, वह छुटकारे का चिन्ह…
हर धर्म में कुछ भोजन हैं जिन्हें खाना निषिद्ध है। मैंने सीखा है कि ईसाई धर्म में भी कुछ निषिद्ध भोजन हैं। लेकिन हर चर्च में निषिद्ध भोजन अलग–अलग होते हैं। उनमें से कौन सा सही है और बाइबल में भोजन को निषिद्ध करने का मानक क्या है?
कुछ भोजन हैं जो परमेश्वर ने अपने लोगों को खाने से मना किया है। भोजन से संबंधित नियम सृष्टि के समय से लेकर नए नियम के समय तक मौजूद है, लेकिन हमें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि भोजन के बारे में परमेश्वर ने हर युग में अपने लोगों को अलग–अलग नियम दिए हैं। आज बहुत से चर्चों के पास भोजन के बारे में अपने–अपने नियम होते हैं और वे अपने नियमों का पालन करने पर जोर देते हैं। उनमें से ज्यादातर कहते हैं कि उनके भोजन के नियम बाइबल पर आधारित हैं, लेकिन वे ऐसा इसलिए दावा करते हैं क्योंकि वे समय पर ध्यान न देने की गलती करते हैं। पुराने समय में यद्यपि किसी भी प्रकार के…
आज ईसाई धर्म एक सबसे बड़ा धार्मिक समूह है जिसको मानने वालों की संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा है। लेकिन मुझे कहा गया कि प्रथम चर्च के युग में ईसाइयों के ऊपर अत्यंत अत्याचार हुआ था। उन पर क्यों अत्याचार किया गया था? और वे कैसे अत्यंत अत्याचार के बीच अपना विश्वास कायम रख सके थे?
सबसे पहले हमें जानना चाहिए कि चाहे कोई भी युग हो, क्लेश और यातनाएं हमेशा परमेश्वर के लोगों के ऊपर आते हैं जो स्वर्ग की आशा रखते हुए ईमानदार जिंदगी जीते हैं(रो 8:17)। 2,000 वर्ष पहले निहित स्वार्थ वाले यहूदी धर्म और इस्राएल पर शासन करने वाले रोम जैसी दुनिया की शक्तियों का उपयोग करके शैतान ईसाई चर्च को सताता था जो सत्य का पालन करता था। लेकिन प्रथम चर्च के लोगों ने यीशु के स्वर्गारोहण के बाद पिन्तेकुस्त के दिन उण्डेले गए पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से युक्त होकर साहसपूर्वक सुसमाचार का प्रचार करना शुरू किया। जिस तरह गन्धरस जितना ज्यादा कट जाता है वह उतना ही सुगंध बिखेरता है, उसी तरह जितना अधिक ईसाइयों पर अत्याचार तीव्र होता…
पापों की क्षमा और उद्धार के बीच में क्या अंतर है?
पापों की क्षमा और उद्धार का अर्थ एक ही है। हम अपने मूल को महसूस करने के बाद इसे आसानी से समझ सकते हैं। उद्धार जिसकी हमें जरूरत है, वह पापों की क्षमा है “उद्धार” शब्द का अर्थ है, किसी को कठिनाई या खतरे से बचाना। बीमारी से पीड़ित किसी व्यक्ति को चंगा होने में मदद करना या फिर उस व्यक्ति को बचाना जिसकी जान को खतरा है, एक प्रकार का उद्धार है। लेकिन उद्धार जो परमेश्वर हमें प्रदान करते हैं, वह शरीर का नहीं, बल्कि आत्मा का उद्धार है, और हमारी आत्माओं का उद्धार ही हमारे विश्वास का प्रतिफल है। उससे तुम बिन देखे प्रेम रखते हो, और अब तो उस पर बिन देखे भी विश्वास करके ऐसे आनन्दित…
क्या सच में आत्मा का अस्तित्व है?
आत्मा धर्म के दायरे से परे लंबे अरसे से लोगों के बीच में चर्चा और बहस का विषय रही है। हाल ही में एक प्रसिद्ध ब्रिटिश भौतिक वैज्ञानिक ने कहा, “मौत के बाद की दुनिया सिर्फ उन लोगों के द्वारा रचित एक परी की कहानी है जो मृत्यु से डरते हैं,” और उसका यह बयान भी विवाद का विषय बन गया। जो सोचते हैं कि मृत्यु के बाद सब कुछ समाप्त हो जाता है, उन लोगों के लिए आत्मा और कुछ नहीं बल्कि मनुष्यों की कल्पना से बनाई गई चीज है। सिर्फ नास्तिक ही नहीं, बल्कि आस्तिक भी जो परमेश्वर पर विश्वास करने का दावा करते हैं, यह जोर देते हैं कि आत्मा नहीं होती। जैसे 2,000 वर्ष पहले सदूकियों…
यीशु ने क्रूस पर निश्चित रूप से कहा, “पूरा हुआ।” अगर ऐसा हो, तो हमें अब से सब्त का दिन और फसह का पर्व जैसे किसी भी नियम का पालन करने की जरूरत नहीं है, है न?
यीशु ने क्रूस पर मृत्यु होने से पहले कहा, “पूरा हुआ।”(यूहन्ना 19:30) क्या इस शब्द का अर्थ यह होता है कि हमें कुछ भी करने की जरूरत नहीं है? यीशु के शब्द का अर्थ होता है कि वह कार्य पूरा हुआ, जो “हमें” नहीं, लेकिन “यीशु” को प्रथम आगमन के समय पृथ्वी पर पूरा करना चाहिए था। अगर हम इस पर अध्ययन करें कि यीशु ने क्या पूरा किया, तो हम समझ सकते हैं कि परमेश्वर के लोगों को और अधिक पवित्रता से सब्त और फसह जैसे परमेश्वर के नियमों का पालन करना चाहिए। बहुतों की छुड़ौती के लिए यीशु बलिदान हो गए जो यीशु को इस पृथ्वी पर करने चाहिए थे, उन महत्वपूर्ण कार्यों में से एक यह था…
पुराने नियम में एक बार भी “यीशु” नाम नहीं पाया गया है। तब, यीशु के चेले कैसे उन्हें मसीह के रूप में पहचान पाए और उन पर विश्वास कर सके?
पुराने नियम में एक भी ऐसा वचन नहीं था कि आनेवाले मसीह का नाम “यीशु” है। यदि “यीशु” नाम की भविष्यवाणी की भी गई होती, हम इस बात से सहमत नहीं हो सकते कि एक मनुष्य मसीह है क्योंकि उसका नाम यीशु है; यह इसलिए है, क्योंकि “यीशु” नाम यहूदियों के बीच आम था।(कुल 4:11) इस कारण, यीशु का नाम एक निश्चित आधार नहीं है जिसके माध्यम से हम विश्वास कर सकते हैं कि यीशु मसीह हैं। सबसे ठोस सबूत वे कार्य हैं जिन्हें यीशु ने मसीह के बारे में पुराने नियम की भविष्यवाणियों के अनुसार पूरा किया। इसके लिए, यीशु ने कहा कि वह “बाइबल(पवित्रशास्त्र)” ही है जो मसीह की गवाही देती है। तुम पवित्रशास्त्र में ढूंढ़ते हो, क्योंकि…
हम पवित्र आत्मा को “परमेश्वर” कहते हैं, और हम यह भी कहते हैं कि हम पर्व के दौरान पवित्र आत्मा पाते हैं। हम कैसे पवित्र आत्मा की परिभाषा कर सकते हैं?
बाइबल में कई उदाहरण हैं कि एक ही शब्द का अलग–अलग अर्थों में इस्तेमाल होता है। उदाहरण के लिए, जब हम नए नियम में शब्द “व्यवस्था” को देखते हैं, व्यवस्था मूल रूप में दस आज्ञाओं को, जो मूसा के समय में दी गई थीं, या उनसे संबंधित विस्तृत व्याख्याओं को संकेत करती है।(रो 7:7; याक 2:11; यूह 8:5, 17) लेकिन, कभी–कभी वह व्यवस्थाओं सहित पंचग्रंथ या संपूर्ण पुराने नियम को भी संकेत करती है।(गल 4:21; लूक 24:44; यूह 12:34) बेशक, वे एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, लेकिन विस्तार से कहा जाए तो उनके अर्थ अलग होते हैं। शब्द “पवित्र आत्मा” के साथ भी ऐसा ही है। मूल रूप से, पवित्र आत्मा उन परमेश्वर को संकेत करता है जिनके पास…
आज चर्च यीशु मसीह पर विश्वास करते हैं। लेकिन 2,000 वर्ष पहले जब यीशु आए, तब क्यों लोगों ने यीशु पर विश्वास नहीं किया और उन्हें क्रूस पर चढ़ा दिया?
इसके अनेक कारण थे; 2,000 वर्ष पहले यहूदियों के यीशु को अस्वीकार करने के प्रमुख कारणों में सबसे बड़ा कारण यह था कि उन्होंने बाइबल की भविष्यवाणियों पर विश्वास नहीं किया(यूह 5:46–47)। यीशु ने कहा कि वह जो उनके मसीह होने की गवाही देता है, बाइबल है। और जिस दिन उनका पुनरुत्थान हुआ, उस दिन भी उन्होंने अपने चेलों को, जिन्हें यकीन नहीं था कि वह मसीह हैं, बाइबल के द्वारा अपने बारे में गवाही देकर उनके हृदयों में दृढ़ विश्वास प्रदान किया(यूह 5:39; लूक 24:25–27, 32)। इसी कारण प्रेरितों ने भी बाइबल के द्वारा गवाही दी कि यीशु मसीह हैं(प्रे 17:2)। यहूदी लोग बाइबल की भविष्यवाणियों को न तो जानते थे और न ही उन पर विश्वास करते थे।…
सभी चर्च सुसमाचार का प्रचार करने का दावा करते हैं, लेकिन सुसमाचार का अर्थ अस्पष्ट है। सुसमाचार क्या है?
लगभग दो हजार साल पहले, यीशु पृथ्वी पर आए और हमें बचाने के लिए स्वर्ग के राज्य का सुसमाचार प्रचार किया। चूंकि वह यीशु थे जिन्होंने राज्य के सुसमाचार का प्रचार किया, सुसमाचार का अर्थ वे सभी शिक्षाएं हैं जिसे यीशु ने हमें स्वर्ग के राज्य की ओर नेतृत्व करने के लिए दिया। और राज्य का यह सुसमाचार सारे जगत में प्रचार किया जाएगा, कि सब जातियों पर गवाही हो, तब अन्त आ जाएगा।मत 24:14 यीशु ने उनके पास आकर कहा, “स्वर्ग और पृथ्वी का सारा अधिकार मुझे दिया गया है। इसलिये तुम जाओ, सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ; और उन्हें पिता, और पुत्र, और पवित्र आत्मा के नाम से बपतिस्मा दो, और उन्हें सब बातें जो मैं…
बाइबल में, एक दृश्य है जहां यीशु ने लोगों को यह कहते हुए डांटा, “तुम व्यर्थ मेरी उपासना करते हो।” जब वे परमेश्वर की पूजा करते थे, क्यों यीशु ने कहा कि उनकी उपासना व्यर्थ है?
ऐसा सोचना आसान है कि यदि हम सिर्फ परमेश्वर की पूजा करें तो आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। हालांकि, बाइबल की शिक्षा अलग है। यीशु ने कहा कि भले ही भविष्यद्वकता उन पर उद्धारकर्ता के रूप में विश्वास करते हैं और उनके नाम से बहुत सी चीजें करते हैं, वे स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के लिए असमर्थ होंगे।(मत 7:21–23) लोग जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, परमेश्वर की उपासना करने के लिए उनकी आराधना करते हैं। यदि वे भविष्यद्वकता या अगुवे हैं, उन्होंने अनगिनत बार परमेश्वर की आराधना की होगी। फिर भी, वे स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकते, इसलिए उनकी आराधनाएं व्यर्थ होती हैं। 2,000 वर्ष पूर्व, इसी कारण धार्मिक नेताओं ने व्यर्थ परमेश्वर की आराधना…
चर्च ऑफ गॉड सिय्योन कहलाता है। क्या इसका कोई कारण है?
उस चर्च का नाम जिसे मसीह ने 2,000 वर्ष पहले इस धरती पर स्थापित किया, चर्च ऑफ गॉड है।(1कुर 1:2; 11:22; गल 1:13) चर्च ऑफ गॉड सिय्योन भी कहलाता है।(इब्र 12:22; प्रक 14:1) जब हम पता लगाते हैं कि सिय्योन किस प्रकार का स्थान है, हम समझ सकते हैं कि क्यों हम चर्च ऑफ गॉड को सिय्योन कहते हैं। सिय्योन यरूशलेम में एक छोटे से पहाड़ का नाम था। परमेश्वर के वाचा के संदूक को वहां रखे जाने के बाद, “सिय्योन” शब्द केवल यरूशलेम नहीं, पर इस्राएल को भी सूचित करने के लिए इस्तेमाल किया गया था।(1रा 8:1) क्यों चर्च ऑफ गॉड सिय्योन कहलाता है, इसका कारण समझने के लिए, हमें पहले राजा दाऊद और यीशु के बीच संबंध को…